Thursday, 28 September 2017

देवी पूजा के नाम पर यहां लड़कियों के साथ होता है ऐसा सलूक


READ MORE

दक्षिण भारत के मंदिरों में लड़कियों को देवी के रूप में पूजने वाली ‘देवदासी प्रथा’ अभी भी चल रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस प्रथा को घिनौना करार दिया है.सोमवार को प्रकाशित एनएचआरसी की रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है. एनएचआरसी ने कहा, “दक्षिण भारत के मंदिरों में लड़कियों को दुल्हन के कपड़ों में सजाकर बैठाया जाता है, बाद में उनके कपड़े उतरवा लिए जाते हैं, ये प्रतिबंधित देवदासी प्रथा का ही एक रूप है.”


बता दें कि दक्षिण भारत के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में और पश्चिम भारत में ऐसी प्रथा प्रचलित है. तमिलनाडु के मदुरै में नवरात्र के समय देवियों के रूप में उन लड़कियों की पूजा करने की परंपरा है, जिन्हें अभी तक पीरिएड्स न आए हो.


इससे मिलती जुलती कन्या पूजन की प्रथा उत्तर भारत में भी होती है. लेकिन, मदुरै में इस रस्म को निभाने का तरीका बहुत खराब है. यहां लड़कियों को धर्म के नाम पर सेक्स के लिए समर्पित कर दिया जाता है. इस प्रथा को 1988 में गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है.एनएचआरसी ने एक बयान में कहा,”यहां की लड़कियों को परिवार के साथ रहने और शिक्षा हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाती है. उन्हें जबरन मंदिरों में रहने के लिए भेज दिया जाता है. इन्हें सार्वजनिक संपत्ति समझी जाती है. ऐसा माना जाता है कि इनका यौन शोषण करने की सबको छूट है.”


मदुरै के मंदिर में भी सात लड़कियों को देवी की तरह मंदिर में बैठाया गया. सातों बच्चियों को कमर से ऊपर कोई कपड़ा नहीं पहनाया गया था. इन्हें 15 दिन तक पुरुष पुजारी के साथ इसी हाल
में रहना होता है.


कमर से ऊपर गहने पहनाकर सार्वजनिक रूप से बैठाने के पीछे लोगों का तर्क है कि बच्चियों को देवी प्रतिमा की तरह सजाया गया है. ये रिवाज तमिलनाडु के 60 गांवों में अभी भी जारी है.


एनएचआरसी की रिपोर्ट में तमिलनाडु में 15 दिनों तक चलने वाले त्यौहार का जिक्र किया गया है. जिसमें स्थानीय देवी की धूमधाम से पूजा की जाती है. इसके बाद समुदाय की ओर से चुनी गईं सात लड़कियों को मंदिर में रहने के लिए कहा जाता है. मंगलवार को इस त्यौहार का समापन हुआ.


हालांकि, तमिलनाडु सरकार ने इस प्रथा के रूप में लड़कियों के यौन शोषण के आरोपों से इनकार किया है. मदुरै के डीएम के वीरा राव ने कहा कि चाइल्ड प्रोटेक्शन टीम ने मंदिर का दौरा किया है. वहां लड़कियों की देखभाल के लिए उनके माता-पिता हैं.


मदुरै के डीएम के मुताबिक, “ये 200 साल पुराना रिवाज है. इलाके के कई गांवों के मंदिरों में ये प्रथा प्रचलित है. अब तक हमें इस प्रथा के खिलाफ कोई शिकायत नहीं मिली है. हालांकि, हमने मंदिर प्रशासन से लड़कियों को शॉल से ढकने को कहा है.”


तमिलनाडु की ये घटना इलाके में काफी समय से चली आ रही कुप्रथाओं का अवशेष है. लंबे समय तक त्रावणकोर रियासत में दलित और गैर-ब्राह्मण महिलाएं घर से बाहर निकलने पर कमर से ऊपर कपड़े नहीं पहन सकती थीं. कथित उच्च कुलों की महिलाओं को भी मंदिरों में पुरोहित या राजा के सामने जाने पर अपने कपड़े उतारने पड़ते थे.


ये भी पढ़ें:  भगत सिंह को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए उनके वंशज जाएंगे कोर्ट


VIDEO: दुर्गा मां को पहनाई 22 kg सोने की साड़ी, कीमत 6.5 करोड़ रुपए


Article source: http://www.jagran.com/bihar/muzaffarpur-14158171.html

No comments:

Post a Comment