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दिल्ली के पास स्थित औद्योगिक नगर फरीदाबाद के एनआईटी रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर एनएच-4 में रावण का भव्य मंदिर बनाने का काम चल रहा है. छोटे मंदिर में पूजा हो रही है. प्रवचन चल रहा है. मंदिर में संत कबीर, महर्षि वाल्मीकि और रावण की फोटो लगी है.फूल-माला चढ़ाई गई है. भजन-कीर्तन में लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने की अपील की जा रही है. यह काम यहां शाम को हर रोज होता है. जब हम रावण का पुतला दहन करेंगे तो भजन-कीर्तन करने वाले लोग यहां शोक मनाएंगे. यह किसी एक शहर की बात नहीं है. बल्कि कई शहरों में लंकापति रावण के अनुयायियों की संख्या बढ़ रही है.
ये लोग अपने बच्चों के नाम भी इसी तरह के रख रहे हैं. आज दशहरा है. लोग रावण और उसके कुनबे के पुतलों का दहन करके खुशियां मनाएंगे, लेकिन एक तबका शोक में डूबा हुआ है, क्योंकि रावण को उसने अपना अराध्य माना हुआ है.
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देश में रावण को मानने वाले लाखों लोग हैं. आदि धर्म समाज नाम का संगठन लोगों को लंकेश का अनुयायी बनाने के काम में जुटा है. इस समाज के प्रमुख पंजाब निवासी दर्शन रत्न रावण हैं. इस समय 19 राज्यों में लंकेश के लाखों अनुयायी हैं. ज्यादातर लोग वाल्मीकि समाज से हैं.
रावण के मंदिर में लगी फोटोये लोग अपने बच्चों के नाम चांडाल, राक्षस, मकराक्ष, दानव, रावण, कुंभकर्ण, बर्बरीक और मंदोदरी आदि रखते हैं. जिस रावण को हम बुराई का प्रतीक मानते हैं, उसकी अच्छाईयों में इन लोगों ने अपना हीरो खोजा है.
समाज के प्रचारक अंबाला निवासी बीके चांडाल कहते हैं कि
‘रामायण में रावण के चरित्र का गलत चित्रण किया गया है, जबकि उसने सीता जी को अपने घर से अलग अशोक वाटिका में रखा. पराए मर्द की नजर न पड़े इसलिए सुरक्षा के लिए महिलाओं की सेना लगाई.’
इन नामों से स्कूलों में एडमिशन कराना चुनौती
रावण की अच्छाइयों का प्रचार-प्रसार करने वाले अनिल चांडाल कहते हैं कि ‘मुख्य धारा से विपरीत चलना काफी कठिन होता है. समाज में रावण की इमेज खराब कर दी गई है. आठ-नौ दिन की रामलीला के बाद जब दशहरा पर रावण जलाया जाता है तब हमें दुख होता है कि इतने महान व्यक्ति के साथ हम क्या सलूक कर रहे हैं.’
‘जब बच्चों का स्कूलों में एडमिशन करवाने जाते हैं तो वहां पर टीचरों और प्रिंसिपल को समझाना मुश्किल हो जाता है. काफी समय लगता है उन्हें पूरा मामला बताने में कि ऐसे नाम क्यों रखे गए हैं. हम रावण को मानते हैं इसलिए बच्चों के नाम भी उसी संस्कृति से लिए जा रहे हैं.’
रावण के अस्थायी मंदिर में पूजा करते अनुयायी
बिसरख: जहां न रामलीला होती है और न रावण दहन
ग्रेटर नोएडा के पास बिसरख को रावण का पैतृक गांव होने का दावा किया जाता है. यहां न तो रामलीला होती है, न ही रावण दहन. यहां रावण का मंदिर है. उसकी पूजा होती है. गांव के लोग बताते हैं कि बिसरख में करीब छह दशक पहले पहली बार रामलीला का आयोजन किया गया. उस दौरान एक मौत हो गई और लीला अधूरी रह गई. फिर रामलीला का आयोजन हुआ और एक व्यक्ति की मौत हो गई और लीला पूरी नहीं हुई. तब से यहां रामलीला का आयोजन नहीं हुआ.
जलने के लिए तैयार रावण का पुतला
अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री प्रो. अब्दुल मतीन कहते हैं कि ‘ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है, क्योंकि समाज में हमेशा पक्ष और विपक्ष रहा है. कोई एक ही विचारधारा कहीं भी नहीं रहती. दूसरी आवाज किसी न किसी रूप में जिंदा रहती है. जब उसे मौका मिलता है वह मुखर होने लगती है.
वह कहते हैं कि ‘जो हमारे लिए सत्य है वह किसी और के लिए असत्य लग सकता है. कोई श्रीराम को मानने में अपना फायदा देख रहा है तो कोई रावण में. वाल्मीकि समाज के कुछ लोग इसी में अपना फायदा देख रहे होंगे. क्योंकि उनकी विचारधारा वहां से तय हुई है जहां वह समाज में आज खड़े हैं. वह अब भी दबे-कुचले हैं. हो सकता है कि इसलिए उन्होंने आपके खलनायक को नायक मान लिया हो.’
Article source: http://hindi.pradesh18.com/news/live-news/ragpicker-lady-finds-a-bag-full-of-rs-1000-notes-worth-rs-52000-in-pune-1509009.html
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