Saturday, 30 September 2017

UP की राजनीति में किस दिशा में जाएंगे मुलायम-अखिलेश?


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मनमोहन रायअखाड़े के अंदर हो या राजनीति के मैदान में मुलायम सिंह यादव अपने ‘धोबी पटक’ के लिए जाने जाते हैं. इस दांव से पिछले पांच दशक में उनके राजनैतिक करियर का ग्राफ लगातार बढ़ा और विरोधी चित्त होते रहे हैं. लेकिन, अब ऐसा लगता है कि वह अपने बेटे अखिलेश यादव के सामने झुक गए हैं.


ऐसी अटकलें लगी थीं कि मुलायम बेटे अखिलेश से अपने संबंधों को दरकिनार करते हुए अपना नया राजनैतिक संगठन बनाएंगे. लेकिन, 25 सितंबर को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में वह पीछे हट गए. हालांकि, पिता और पुत्र के पिछले कुछ महीनों के संबंधों को देखते हुए अटकलों को पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता, एक बड़ी घोषणा के लिए मंच भी सज गया था. लेकिन हाथ में माइक लेते ही मुलायम ने नरम पड़ गए. उन्होंने कहा, ‘अखिलेश मेरा बेटा है. उसे मेरा आशीर्वाद है. हालांकि, मैं उसके कुछ निर्णयों से सहमत नहीं हूं.’ इस दौरान मुलायम सिंह यादव ने नई पार्टी बनाने से साफतौर पर इनकार कर दिया. इसके कुछ देर बाद ही अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, मुलायम सिंह यादव जिंदाबाद.


गुरुवार को पिता और बेटे की करीब एक घंटे तक मीटिंग हुई. अगले सप्ताह आगरा में समाजवादी पार्टी की होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी को देखते हुए यह मीटिंग महत्वपूर्ण मानी जा रही है. अखिलेश यादव को दोबारा पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की तैयारी की जा चुकी है. कहा जा रहा है कि अंकल राम गोपाल यादव के साथ मिलकर पिता मुलायम सिंह यादव से पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद लेने वाले अखिलेश अब इस मुद्दे पर मुलायम सिंह को काफी हद तक शांत भी करा चुके हैं.हालांकि, नए घटनाक्रम को देखते हुए यह लगता है कि चतुर राजनैतिज्ञ मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर स्वीकार कर लिया है. अपनी रणनीति के लिए मशहूर मुलायम यादव जिन्होंने लोकदल और जनता दल के दुर्जेय राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती दी और उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस जैसी पार्टी को काफी पीछे छोड़ कर समाजवादी पार्टी को स्थापित किया. वह यह नोटिस करने में फेल हो गए कि 25 साल पुरानी उनकी पार्टी कैसे उनके हाथों से निकल गई.


पांच दशक के राजनैतिक करियर में मुलायम सिंह यादव ने मजबूत गांधी परिवार को चुनौती दी और उन्हें रायबरेली और अमेठी तक सीमित कर दिया. देश के सबसे बड़े और राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री बने. देश के रक्षामंत्री बने और प्रधानमंत्री की कुर्सी के काफी नजदीक तक पहुंचे. यूपीए-1 और यूपीए-2 को उन्होंने कई मौकों पर संभाला और अपने समय में एक मजबूत समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में सामने आए. लेकिन वह अपने बेटे अखिलेश यादव के समर्थन में आगे आ रहे लोगों को पहचानने में असफल हुए. हालांकि, साल 2012 में यूपी में बहुमत हासिल करने के बाद मुलायम ने ही अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया था. वहीं, साल 2012 से 2017 के बीच मुलायम सिंह यादव कई बार बोल चुके हैं, ‘मैंने अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री बनाया है. लेकिन वह मेरी नहीं सुनता है.’


एक जनवरी 2017 को अखिलेश ने मुलायम और उनके भाई शिवपाल से तनाव के बाद उन्हें लगभग पार्टी से बाहर ही कर दिया था. अखिलेश ने इस दौरान बयान दिया था कि कुछ बाहरी लोग उनके पिता को अपने सलीके से समझा रहे हैं. इस दौरान अखिलेश अपनी स्वच्छ छवि और पांच साल के कार्यकाल के दौरान की छवि को दिखाते हुए मजबूती से सामने आए थे.


धीरे-धीरे पूराने समाजवादी मुलायम की पार्टी को अखिलेश ने अपने रंग में ढाल लिया. किरणमोय नंदा, अहमद हसन, रेवती रमन सिंह और नरेश अग्रवाल जैसे मुलायम के पुराने साथियों ने अखिलेश को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत की और मुलायम सिंह यादव को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में रख दिया. रातों रात हुए इस तख्तापलट से मुलायम और शिवपाल हैरान थे.


मुलायम को कभी यह अहसास नहीं था कि एक समय ऐसा भी आ सकता है कि पार्टी और जनता में अखिलेश यादव की स्वीकार्यता उनसे ज्यादा हो जाएगी. हालांकि, मुलायम सिंह यादव ने पार्टी में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कानूनी और राजनैतिक रणनीति का सहारा लिया. लेकिन अखिलेश मजबूती से पार्टी अध्यक्ष पद पर आसीन रहे.


पिछले सप्ताह के घटनाक्रम को देखते हुए यह मालूम पड़ता है कि पार्टी के पुराने नेताओं ने अखिलेश यादव को एक नेता के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया है. इसके लिए उन्होंने एक सांमजस्यपूर्ण संकेत भी दिए हैं. 5 अक्टूबर को सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है. यहां ये देखने को मिल सकता है कि यूपी की राजनीति में पिता और पुत्र किस तरफ जा रहे हैं.


Article source: http://hindi.pradesh18.com/news/live-news/470-people-dies-in-shock-after-cm-j-jayalalithaa-death-claims-aiadmk-1520068.html

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