Thursday, 28 September 2017

Zee जानकारी: आतंकवाद को धर्म के चश्में से नहीं देखना चाहिए


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आंखों पर धर्म का चश्मा लगा हो.. तो फिर हक़ीकत थोड़ी सी धुंधली.. यानी Out of Focus हो जाती है. यही हाल हमारे देश के नेताओं… मीडिया और बुद्धिजीवियों का है…. रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचार की ख़बरों को हमारे देश में हाथों हाथ लिया जाता है.. तुरंत विरोध प्रदर्शन होने लगते हैं.. वोट बैंक की राजनीति होने लगती है.. लेकिन म्यांमार के हिंदुओं की मौत पर ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. हद तो ये है कि जो लोग ये कहते हैं कि आतंकवाद को धर्म के चश्में से नहीं देखना चाहिए.. वो भारत के वीर जवानों की शहादत पर भी चुप्पी साध लेते हैं. हमें म्यांमार के हिंदुओं पर रिपोर्ट दिखाए हुए.. 24 घंटे हो चुके हैं लेकिन किसी ने भी इस अत्याचार के विरोध में आवाज़ नहीं उठाई बुधवार (27 सितंबर) की रात कश्मीर के एक बहादुर बेटे का सीना…आतंकवादियों की गोली से छलनी हुआ है. लेकिन इस शहादत का कहीं कोई ज़िक्र नहीं हुआ.. क्योंकि इसमें कुछ लोगों का एजेंडा पूरा नहीं होता.


आपने नोट किया होगा कि हमारे ही देश में रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में ये नारे लगाए गये कि ‘बर्मा के मुसलमानों, हम तुम्हारे साथ हैं’. सोशल मीडिया पर धर्मनिरपेक्षता की आड़ में लगातार धार्मिक भावनाओं की आंधी चलती रही. लेकिन जब BSF के कॉन्स्टेबल मोहम्मद रमज़ान बुधवार (27 सितंबर) को शहीद हुए.. तो सबकी भावनाएं.. छुट्टी पर चली गईं… मुसलमानों का नाम लेकर राजनीति करने वालों को भारत के देशभक्त मुसलमानों में कोई दिलचस्पी नहीं है. वो उनकी शहादत पर आंसू नहीं बहाते… क्योंकि इसमें कोई धार्मिक एजेंडा नहीं है. सेक्युलरिज़्म के ठेकेदार अपनी सुविधा के अनुसार एक्टिव होते हैं और किसी भी मुद्दे को.. मौत को.. या शहादत को अपनी सहूलियत के हिसाब से छोटा या बड़ा कर देते हैं.


इसी वर्ष मई के महीने में जब आतंकवादियों ने, 22 साल के लेफ्टिनेंट उमर फयाज़ की हत्या की थी….उस वक्त भी धर्म का चश्मा पहनने वाले लोग चुप थे. शहीद लेफ्टिनेंट उमर फयाज़ के पार्थिव शरीर पर पत्थर फेंके गये थे…लेकिन इनमें से किसी ने भी इस घटना के ख़िलाफ आवाज़ नहीं उठाई. जिन लोगों ने 22 साल के आतंकवादी बुरहान वानी के लिए आंसू बहाए थे, वो ना तो 22 साल के लेफ्टिनेंट उमर फयाज़ के लिए खड़े हुए…और ना ही किसी के पास 33 साल के BSF कॉन्स्टेबल मोहम्मद रमज़ान के लिए खड़े होने का वक्त है. हमारा सवाल ये है कि… ऐसा फर्क और भेदभाव क्यों किया जाता है ?


शहीद लेफ्टिनेंट उमर फयाज़….और BSF के शहीद कॉन्स्टेबल मोहम्मद रमज़ान एक ही मिट्टी में पैदा हुए थे और उनकी सोच भी सिर्फ एक थी…देशसेवा. लेकिन, आतंकवादियों ने कश्मीर के इन दोनों बेटों की हत्या उस वक्त की…जब वो निहत्थे थे.  वर्ष 2011 में Border Security Force को Join करने वाले मोहम्मद रमज़ान, बारामुला में तैनात थे. और 37 दिन की छुट्टियां लेकर घर आए हुए थे. जिसमें से 22 दिन वो गुज़ार चुके थे. लेकिन बुधवार (27 सितंबर) रात कश्मीर घाटी के बांदीपोरा ज़िले के हाजिन गांव में, जैसे ही रमज़ान के घर का दरवाज़ा खुला…4 आतंकवादी घर के अंदर घुस गए. 


आतंकवादी उनका अपहरण ठीक वैसे ही करना चाहते थे, जैसे उन्होंने लेफ्टिनेंट उमर फयाज़ का किया था.  घर में घुसते ही आतंकियों ने पूछा कि…मोहम्मद रमज़ान कौन है और सब अपना Identity Card दिखाओ. और फिर जैसे ही, रमज़ान उनके सामने आए, आतंकवादी उन्हें पकड़कर घर से बाहर खींचने लगे. परिवार के सदस्यों ने इसका विरोध किया. लेकिन आतंकियों ने उनपर हमला कर दिया, जिसमें वो बुरी तरह ज़ख्मी हो गए. 


मोहम्मद रमज़ान अंतिम सांस तक आतंकवादियों से संघर्ष करते रहे. उनकी, आतंकियों के साथ हाथा-पाई भी हुई. वो निहत्थे थे….लेकिन एक पल के लिए भी वो कमज़ोर नहीं पड़े. उन्होंने आतंकवादियों से बंदूक छीनने की भी कोशिश की. लेकिन, अंत में चारों आतंकवादी उनपर भारी पड़ गए. और फायरिंग में मोहम्मद रमज़ान शहीद हो गये.


सूत्रों के मुताबिक, ये सभी आतंकवादी लश्कर-ए-तैय्यबा के थे. इन्होंने अपना एक Group बनाया हुआ था. जिसमें अबु ओसामा…महमूद…अबु मूसा और क़तील नामक पाकिस्तानी आतंकवादियों के अलावा…नसरुल्ला नामक स्थानीय आतंकवादी भी शामिल था. 


लेकिन, अफसोस इस बात का है, कि हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग, देशविरोधी एजेंडे वाली भक्ति में इतना लीन हो चुका है, कि उसे रोहिंग्या मुसलमानों की पीड़ा तो दिखाई दे रही है. लेकिन, देश के लिए मर-मिटने वाले बेटों और उनके परिवार की फिक्र नहीं है. देश को आज़ादी दिलाने वाले शहीद भगत सिंह की आत्मा भी आज रो रही होगी. आज शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है. लेकिन उन्होंने कभी ये सपने में भी नहीं सोचा होगा….कि आज़ाद भारत में एक दिन ऐसा भी आएगा….जब हर साल देश के टुकड़े करने वालों के पक्ष में Candle March निकलेंगे….और उमर फयाज़ और मोहम्मद रमज़ान की शहादत पर किसी के आंसू तक नहीं निकलेंगे.


भारत का कोई मुसलमान जब देश के खिलाफ आवाज़ उठाता है.. तो वो नेताओं और बुद्धिजीवियों का दुलारा बन जाता है… लेकिन जब कोई मुसलमान देश के लिए अपनी जान देता है.. तो उसकी बात कोई नहीं करता. कोई उसके लिए आंसू नहीं बहाता.


कॉन्स्टेबल मोहम्मद रमज़ान की निर्मम हत्या ये साबित करती है, कि कश्मीर के आतंकवादी किसी एजेंडे, आदर्श, मकसद या विचारधारा की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. वो अपनी बातें मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, फिर चाहे उन्हें इंसानियत की हत्या ही क्यों ना करनी पड़े ? 


वैसे एक सच ये भी है, कि देश की सेवा करना हर किसी के खून में होता है. आप भी कभी ना कभी ये ज़रुर सोचते होंगे, कि काश….एक बार सरहद पर जाकर सीना तान कर खड़े होने का मौका मिले. क्योंकि, देशभक्ति… की भावना ऐसी होती है कि खून में उबाल आने लगता है. लेकिन…अगर इस तरह देश के बेटे शहीद होते रहेंगे…और उनकी शहादत पर गर्व करने के बजाए, सब चुप्पी साध लेंगे, तो क्या कोई सेना में जाना चाहेगा ? सुरक्षाबलों की हत्या करने वालों के ख़िलाफ अगर देश एकजुट नहीं होगा…तो क्या उनके मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ेगा ? ये सोचने वाली बात है. 


आतंकवाद….उग्रवाद और नक्सलवाद…कहने को ये तीनों ही शब्द अलग-अलग हों. लेकिन, इनकी विचारधारा का Software लगभग एक जैसा होता है. निर्दोष लोगों की हत्या करने में ये लोग हिचकते नहीं हैं. भारत सहित पूरी दुनिया में इस तरह की विचारधारा बहुत तेज़ी से बढ़ी है. 2016 के Global Terrorism Index में आतंकवाद की वजह से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले देशों में भारत 7वें स्थान पर था. 


इस दौरान दुनियाभर में जितने भी आतंकवादी हमले हुए, उनमें से 7 फीसदी भारत में हुए. इस मामले में भारत इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बाद चौथे नंबर पर था. सन 2000 से 2015 के बीच आतंकवाद की वजह से दुनियाभर में 41 हज़ार 770 अरब रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ. जो Egypt और मलेशिया के कुल GDP का बराबर है. 


आतंकवाद की वजह से इंसानों की जान तो जाती ही है… इससे आपकी जेब पर भी हमला होता है. हर आतंकवादी हमले का असर, हम सबकी ज़िन्दगी पर पड़ता है. आप चाहे, कहीं पर भी क्यों ना हो…ये बर्बादी आप तक भी पहुंच सकती है. इसलिए, हमेशा सावधान रहें. अपने आस-पास होने वाली हर हरकत पर नज़र रखें. किसी भी संदिग्ध गतिविधि के बारे में पुलिस और सुरक्षाबलों को सूचित करें. क्योंकि, आपकी सतर्कता से ना सिर्फ आतंकवाद का नाश हो सकता है, बल्कि आपको सुखी और सुरक्षित जीवन की गारंटी भी मिल सकती है.


Article source: http://www.jagran.com/uttar-pradesh/meerut-city-16471175.html

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