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सेना ने कहा है कि घाटी में तेजी से सामान्य हो रहे हालात के बीच युवाओं में बढ़ती कट्टरता सबसे बड़ी चिंता के रूप में उभर कर सामने आई है।
पत्थरबाजी की घटनाओं में किशोर उम्र के बच्चों यहां तक कि आठ साल की कच्ची उम्र वाले बच्चों का शामिल होना शुभ संकेत नहीं है। वे किसी विचारधारा के असर में ऐसा नहीं कर रहे हैं बल्कि ऐसा करना साहसी होने की निशानी मानी जा रही है।
घाटी में आतंकरोधी अभियान से जुड़े विक्टर फोर्स के मेजर जनरल बीएस राजू ने कहा कि सेना स्कूलों और कॉलेजों में कई कार्यक्रम आयोजित कर रही जिनके जरिए उन बच्चों को व्यस्त रखा जा सके और उन्हें यह अहसास दिलाया जा सके कि सेना उनके साथ है।
इसके तहत खेल-कूद और पेंटिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन कराया जा रहा है। इसके अलावा कॉपी, किताब और पेंसिल जैसी स्टेशनरी बांटी जा रही है। बच्चों को ट्रेकिंग अभियान में शामिल किया जा रहा है।
मेजर जनरल के अनुसार ज्यादातर आतंकी, अलगाववादी और पत्थरबाज ‘आजादी’ का सही अर्थ नहीं जानते हैं। वे भारत से आजादी नहीं चाहते हैं। उन्हें तो सेना के भारी-भरकम उपस्थिति से एतराज है, लेकिन उन्हें समझना होगा कि सेना यहां उनकी हिफाजत के लिए है।
घाटी से आतंकवाद का खात्मा होते ही सुरक्षा बल वापस बैरक में चले जाएंगे। उन्होंने किशोर न्याय प्रणाली को मजबूत बनाए जाने पर जोर दिया है। उन्हें हिरासत में रखने के लिए अलग से केंद्र बनाए जाएं जहां उन्हें मानवीय परिस्थितियों में रखा जाए।
मौजूदा व्यवस्था में किशोर पत्थरबाजों को समूह में गिरफ्तार किया जाता है। हालांकि उन्हें बाद में रिहा कर दिया जाता है कि लेकिन उनके दिमाग से कट्टरता के जहर को निकालने की कोई व्यवस्था नहीं है। नतीजतन, वे वापस दोगुने उत्साह से पत्थरबाजी में जुट जाते हैं।
Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/politics/cm-akhilesh-meets-akhlaq-family-dadri-murder-case-414294.html
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