Wednesday, 27 September 2017

भगत सिंह ने अपने आखिरी पत्र में क्‍या लिखा था?


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भगत सिंह 28 सितंबर 1907 को पैदा हुए और सिर्फ 23 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए. उससे पहले अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को जगाने के लिए 22 मार्च 1931 को उन्‍होंने साथियों के नाम देशभक्‍ति से ओतप्रोत एक पत्र लिखा था.इस पत्र की हर लाइन में वतनपरस्ती झलकती है. उन्‍होंने लिखा कि-


‘साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए. मैं इसे छिपाना नहीं चाहता, लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि मैं कैंद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता. मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है. क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है, इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा हरगिज नहीं हो सकता’.


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bhagat singh birth anniversary  शहीद-ए-आजम भगत सिंह


‘हां, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं उसका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्‍वतंत्र जिंदा रह सकता तब शायद उन्‍हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय कोई लालच मेरे मच में फांसी से बचने का नहीं आया. मुझसे अधिक भाग्‍यशाली कौन होगा. आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है. कामना है कि यह और नजदीक हो जाए’.

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