Saturday, 31 March 2018

मठों के 'आर्शीवाद' से मिलेगी कर्नाटक की सत्ता


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कर्नाटक के 30 जिलों में 600 से अधिक‘मठों’ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, भाजपा के प्रमुखों को अपनी शरण में आने पर मजबूर कर दिया है. कर्नाटक में हमेशा से ही मठों की राजनीति हावी रही और लोगों पर मठों का खासा प्रभाव रहा है. लिहाजा राजनीतिक पार्टियां चुनावी समय में मठों के दर्शन कर वहां के मठाधीशों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश करती रही हैं.ऐसे में मतदाताओं पर मठों के प्रभाव को देखते हुए भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह और कांग्रेस के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राहुल गांधी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. संत समागम से जुड़े स्वामी आनंद स्वरूप ने बताया कि कर्नाटक में लिंगायत समुदाय से जुड़े करीब 400 छोटे बड़े मठ हैं जबकि वोक्कालिगा समुदाय से जुड़े करीब 150 मठ है. कुरबा समुदाय से 80 से अधिक मठ जुड़े हैं. इन समुदायों का कर्नाटक की राजनीति में खासा प्रभाव है, ऐसे में राजनीतिक दलों में इन मठों का आर्शीवाद प्राप्त करने की होड़ लगी रहती है.


उन्होंने बताया कि कर्नाटक में मठ सिर्फ आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र ही नहीं हैं बल्कि प्रदेश के सामाजिक जीवन में भी इनका काफी प्रभाव माना जाता है. शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में नि:स्वार्थ सेवा के साथ कमजोर वर्ग के लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान के कारण लोग इन मठों को श्रद्धा के भाव से देखते हैं.


इसलिए यहां पर भाजपा के लिए चुनौती बड़ी है. कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव अग्निपरीक्षा हैं क्योंकि यहां पर जीत के साथ उसके हार के सिलसिले पर विराम लग सकता है.ऐसे में मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने की पहल से उत्पन्न राजनीतिक स्थिति का फायदा उठाने और भाजपा कर्नाटक में सत्ता हासिल करने के लिये कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है.अमित शाह समेत भाजपा के वरिष्ठ नेता मठों का आर्शीवाद लेने में जुट गए हैं. पार्टी को उम्मीद है कि मठों के आशीर्वाद से लिंगायत समुदाय के कद्दावर नेता बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में इस दक्षिणी राज्य में कांग्रेस के चक्रव्यूह को तोड़ने में वह सफल होगी. हर धर्म के लोगों को साधने की कोशिश में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मंदिरों और मठ के अलावा चर्च और दरगाह जा रहे हैं.


कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने हाल ही में दावा किया था कि राज्य में जितने भी मठ हैं उन सब का समर्थन कांग्रेस को है. वहीं, राज्य में ‘नाथ सम्प्रदाय’ को साधने की कवायद के तहत भाजपा ने प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ को उतारा है.


अखिल भारतीय संत समिति के प्रवक्ता बाबा हठयोगी दिगंबर का कहना है कि मठ किसी राजनीतिक दल का न तो विरोध करते हैं और न ही समर्थन. ‘‘ हां, यह जरूर है कि राजनीतिक दल मठों का आर्शीवाद लेने आते हैं. ’’


राज्य में करीब 20 प्रतिशत आबादी लिंगायत समुदाय की है और 100 सीटों पर इस समुदाय का प्रभाव माना जाता है. इस समुदाय को भाजपा का पारंपरिक वोटबैंक माना जाता है लेकिन सिद्धरमैया सरकार के ‘लिंगायत कार्ड’ ने भाजपा के लिये चुनौती खड़ी कर दी है.


केंद्रीय मंत्री तथा कर्नाटक से भाजपा के वरिष्ठ नेता अनंत कुमार ने कहा, ‘‘ कर्नाटक की जनता सब जानती है वह जानती है कि कौन ‘‘दिल में श्रद्धा’’ रखते हैं और कौन ‘‘चुनावी श्रद्धा’’ रखते हैं. हम पूरे जीवन के लिये भगत हैं, पूरे जीवन के लिये श्रद्धा भाव रखते हैं.’’राज्य के सभी 30 जिलों में मठों का जाल फैला हुआ है. जातीय समीकरण के लिहाज से मठों का अपना प्रभुत्व और दबदबा है.


वोक्कालिगा समुदाय के बड़े नेता पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा माने जाते हैं और उनकी पार्टी जनता दल (सेकुलर) का चुनचुनगिरी मठ पर खासा प्रभाव माना जाता है. भाजपा और अमित शाह भी इस बार वोक्कालिगा समुदाय में पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. शाह के दौरे के बाद अनंत कुमार, सदानंद गौड़ा जैसे केंद्रीय मंत्री भी चुनचुनगिरी मठ का दौरा कर चुके हैं. जनसंख्या के लिहाज से कर्नाटक के दूसरे प्रभावी समुदाय वोक्कालिगा की आबादी 12 फीसदी है. राज्य में वोक्कालिगा समुदाय के 150 मठ हैं, जिनमें ज्यादातर मठ दक्षिण कर्नाटक में हैं.


तीसरा प्रमुख मठ कुरबा समुदाय से जुड़ा हुआ है. प्रदेश में इस समुदाय के 80 से अधिक मठ जुड़े हैं. मुख्य मठ दावणगेरे में श्रीगैरे मठ है. मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धरमैया इसी समुदाय से आते हैं. राज्य में कुरबा आबादी 8 फीसदी है.


अमित शाह इस क्षेत्र में लिंगायत समुदाय के प्रमुख धार्मिक स्थल सुत्तूर मठ का भी दौरा कर रहे हैं. हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस क्षेत्र का दौरा किया था. मुख्यमंत्री सिद्धरमैया भी दो अप्रैल तक मैसूर में चुनाव प्रचार करेंगे जहां वे कुछ मठों में आर्शीवाद लेने जायेंगे.


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गांधीनगर: युवा भाजपा नेता ने विधानसभा अध्‍यक्ष की कुर्सी पर बैठकर खिंचवाई फोटो, होगी कड़ी कार्रवाई


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गांधीनगर विधानसभा में बेहद अजीबोगरीब मामला सामने आया है. भाजपा के एक युवा नेता ने विधानसभा खाली होने पर विधानसभा अध्‍यक्ष की कुर्सी पर बैठकर बड़े अंदाज में फोटो खिंचवाई. इतना ही नहीं उसने सदन में घूम-घूमकर सेल्‍फी भी खींचीं. युवा नेता ने विधानसभा सदस्‍यों की जगह पर बैठकर माइक बोलते हुए स्‍टाइल में भी फोटो खिंचवाई.जैसे ही युवा नेता ने ये फोटो शेयर कीं तो विधानसभा सदस्‍यों और अध्‍यक्ष की नजर में ये बात आ गई. इसके बाद विधानसभा अध्‍यक्ष ने युवा नेता पर कड़ी कार्रवाई करने की बात कही है.


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VIDEO- कश्मीर के 'वफ़ादार'


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 कश्मीर में वर्दीवाले 'ख़ुद्दार', जिन्हें पत्थरबाज़ कहते हैं 'ग़द्दार'. वो हैं वादी के असली 'वफ़ादार'जाबांजो की असल कहानी. देखें देखिए न्यूज 18 इंडिया की एक ख़ास रिपोर्ट- कश्मीर के 'वफ़ादार'.

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आसनसोल हिंसा मामला: अपने खुफिया तंत्र में सुधार करेगा पश्चिम बंगाल


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गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी की जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल सरकार राज्य में हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए अपने खुफिया तंत्र में सुधार कर रही है. अधिकारी ने बताया कि हाल ही में हुई आसनसोल-रानीगंज हिंसा के बाद राज्य सरकार ज़मीनी स्तर पर अपने खुफिया तंत्र को मज़बूत करने की योजना बना रही है. मौजूदा व्यवस्था में अपर्याप्त आधारभूत ढांचे की वजह से इस सुधार की ज़रूरत पड़ी है.अधिकारी ने बताया, “ हम स्थानीय खुफिया तंत्र मज़बूत कर रहे हैं ताकि इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके.” साल 2014 में खगरागढ़ में हुए विस्फोट के बाद स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत करने की जरूरत पहली बार महसूस की गई थी. इस विस्फोट में बांग्लादेशी आतंकवादी समूह जमात- उल- मुजाहिद्दीन बांग्लादेश का हाथ था.


इस घटना के बाद राज्य सरकार ने स्थानीय खुफिया इकाई (एलआईयू) सभी जिलों में स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था. इस यूनिट का काम जमीनी स्तर पर जानकारियां जुटाना था, जिससे आतंकवादियों के बारे में जानकारी हासिल करने में मदद मिलती और राज्य में विनाशक गतिविधियों पर रोक लगती. लेकिन एलआईयू इकाई में अधिकारियों की तैनाती के अलावा इस विशेष खुफिया सेल के पास ज्यादातर जिलों में कार्यालय परिसर और अन्य ढांचों की कमी ही रही.


राज्य गृह विभाग के अधिकारी के अनुसार साल 2016 के बाद बंगाल में हुए दंगों के बारे में विशेष इनपुट था कि इन दंगों का षडयंत्र पहले रचा गया था. ये दंगे छिट- पुट नहीं थे जैसा कि मीडिया और राजनीतिक पार्टियों का एक वर्ग बता रहा है. केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा में तेजी से बढ़ोतरी हुई है.ये भी पढ़ें:


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लॉन्चिंग के 48 घंटे बाद ही इसरो का GSAT-6A से संपर्क टूटा


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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO) ने गुरुवार को कम्युनिकेशन सैटेलाइट जीसैट-6 का सफल लॉन्चिंग की थी. जानकारी के मुताबिक, इसरो का संपर्क जीसैट-6 से टूट गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसी आशंका जताई जा रही है कि किसी तकनीकी खामियों की वजह से इसरो का कम्युनिकेशन सैटेलाइट से संपर्क नहीं हो रहा रहा है.जानकारी के मुताबिक, पिछले 48 घंटे से इसरो की ओर से इस सैटेलाइट के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है. इस सैटेलाइट के बारे में आखिरी बार 30 मार्च सुबह 9:22 बजे आधिकारिक बयान जारी किया गया था. बताया जा रहा है कि लॉन्चिंग के बाद जीसैट-6A में कुछ तकनीकी खराबी आ गई थी. फिलहाल साइंटिस्ट इसे दूर करने में जुटे हैं.


कम्यूनिकेशन सैटेलाइट जीसैट-6A 270 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुई थी. जीसैट-6A का गुरुवार को सफल परीक्षण किया गया था. यह कम्यूनिकेशन सैटेलाइट बहुत दूरस्थ क्षेत्रों में भी मोबाइल कम्यूनिकेशन में मदद करेगा. बता दें कि इससे पहले 31 अगस्त 2017 में पीएसएलवी से IRNSS 1H का परीक्षण किया गया था, जो फेल रहा था.


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कश्मीरः शोपियां में सेना की गाड़ी पर हमला, पुलवामा में नागरिक की हत्‍या


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जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले के पोशवरी इलाके में आतंकियों ने गश्त पर निकली सेना के कैस्पर व्हीकल पर हमला किया है. इस घटना के बाद सेना ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी है और फोर्स को घटनास्थल के लिए रवाना किया गया है.अनंतनाग में जवान घायल, पुलवामा में सिविलियन की हत्‍याा
दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में शनिवार को आतंकवादियों ने एक पुलिसकर्मी को गोली मारकर घायल कर दिया. पुलिस के एक अधिकारी के अनुसार अनंतनाग के खानाबल चौक इलाके में यातायात ड्यूटी पर तैनात विशेष पुलिस अधिकारी तुरग सिंह पर अज्ञात आतंकवादियों ने गोली चला दी. इस घटना में सिंह घायल हो गये. अधिकारी ने बताया कि घायल पुलिसकर्मी को निकट के अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन बेहतर उपचार के लिये उन्हें वहां से श्रीनगर के अस्पताल भेजा गया.


वहीं पुलवामा जिले में मुर्रन चौक इलाके के निकट आतंकवादियों ने मोहम्मद अशरफ मीर नामक एक स्थानीय नागरिक को गोली मार दिया. इस नागरिक की इलाज के दौरान मौत हो गई. मीर पुलवामा में माचपुना के रहने वाले थे.अनंतनाग जिले में गुरुवार को आतंकियों ने विशेष पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी थी और उनकी पत्नी को घायल कर दिया था. उसी दिन एक अन्य घटना में आतंकवादियों ने कुलगाम जिले के चानसेर में एक व्यक्ति पर गोली चलायी. व्यक्ति के पैर में गोली लगी थी और उसे स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था.


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JNU छात्रा ने शेयर की पुलिस मारपीट-छेड़छाड़ की तस्‍वीरें, खुद पर ही गिरफ्तारी का खतरा


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जेएनयू में यौन प्रताड़ना के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान दिल्‍ली पुलिस के अधिकारियों पर छेड़छाड़ और मारपीट का आरोप लगाने वाली एक छात्रा पर अब गिरफ्तारी का खतरा मंडरा रहा है. पुलिस ने उस छात्रा के खिलाफ मामला दर्ज किया है. जेएनयू सोशियोलॉजी विभाग की छात्रा शीना ठाकुर ने छात्रों, अध्‍यापकों और पुलिस के बीच झड़प की कई तस्‍वीरें और वीडियो शेयर किए हैं. ये तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं. 24 मार्च को फेसबुक पर डाले जाने के बाद से ये तस्‍वीरें 28 हजार बार शेयर की गई हैं.बजफीड की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्‍ली पुलिस ने शीना सहित उसके कई दोस्‍तों पर मारपीट, महिला की गरिमा को नुकसान पहुंचाने और खतरनाक हथियार के साथ दंगा करने का मामला दर्ज किया है. इसके बाद उन पर गिरफ्तारी का खतरा मंडरा रहा है. शीना और उसकी दोस्‍तों को चिंता है कि उन्‍हें किसी भी पल गिरफ्तार किया जा सकता है.


वहीं शीना ने 23 मार्च को हुई घटना को याद करते हुए बताया कि जब जेएनयू की प्रदर्शन रैली संसद की ओर जा रही थी तो उन्‍होंने सुना कि पुलिसवाले चिल्‍ला रहे थे कि ‘उनके कपड़े फाड़ो’ और उसके कुछ देर बाद कोई उसकी ब्रा खींच रहा था. उसके पकड़ा गया, मारा गया, छेड़ा गया और पानी की बौछारों से धकेला गया.


जेएनयू के छात्र प्रोफेसर अतुल जौहरी को जमानत दिए जाने का विरोध कर रहे थे. जौहरी पर आठ महिलाओं के यौन शोषण का आरोप है. उन्‍हें कुछ घंटों के अंदर ही गिरफ्तार कर जमानत दे दी गई. इसके बाद छात्रों और अध्‍यापकों ने विरोध किया. इसी के चलते 23 मार्च को प्रदर्शन किया गया लेकिन पुलिस ने रास्‍ते में ही इसे रोक दिया जिससे झड़प हुई.


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वकालत कर सकते हैं MP-MLA लेकिन माननी होगी यह शर्त...


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बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने सांसदों और विधायकों को शनिवार को वकालत करने की मंजूरी दे दी. हालांकि बीसीआई ने इसके लिए एक शर्त भी रखी है. बीसीआई ने कहा कि उच्च न्यायपालिका के किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले को उस अदालत में वकालत करने की मंजूरी नहीं होगी.बीसीआई के प्रमुख एवं वरिष्ठ वकील मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि बार काउंसिल ने अधिकारों के दुरुपयोग और वकीलों के विशेषाधिकारों पर रोक लगाने के लिए यह फैसला लिया.


मिश्रा ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘बीसीआई इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुंची है कि हम सांसदों, विधायकों को वकालत करने से रोक नहीं सकते या उन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते लेकिन इसे लेकर एक अपवाद है. वकील-सांसद या वकील-विधायक, अगर वे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग या पद से हटाने की कार्यवाही का प्रस्ताव लाते हैं तो उन्हें उस खास अदालत में वकालत करने की मंजूरी नहीं होगी. यह काउंसिल के अधिकतर सदस्यों का रुख है.’’


उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली भाजपा प्रवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका को लेकर 12 मार्च को बीसीआई से जवाब मांगा था. याचिका में सांसदों या विधायकों के वकीलों के रूप में काम करने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गयी है.ये भी पढ़ेंः
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VIDEO: पश्चिम बंगाल की हिंसा से किसको हुआ फ़ायदा


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 रामनवमी की झांकी के दौरान पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भड़के दंगे पर सियासत तेज हो गई है. पश्चिम बंगाल के रानीगंज में रामनवमी के दिन हिंसा भड़क गई थी, जो दूसरे दिन आसनसोल तक पहुंच गई. हिंसा के दौरान दो दर्जन से ज्यादा घरों और दुकानों में आग में आग लगा दी गई. सवाल ये है क्या इस दंगे की पीछे कोई साजिश है. आखिर पश्विम बंगाल के दंगो पर किसका फ़ायदा हो रहा है? इस पूरे दंगादग्रस्त इलाकों में न्यूज 18 इंडिया ने ग्राउंड रिपोर्टिंग की. देखें रिपोर्ट. 

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कब से दुनिया बन रही है 'अप्रैल फूल'?


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बचपन से बड़े होने तक आपने कई बार कई लोगों को अप्रैल फूल बनाया होगा, लेकिन क्या आप इसकी शुरुआत के बारे में जानते हैं? नहीं..तो हम बताते हैं कि कब, कैसे और कहां से शुरू हुआ अप्रैल फूल?वैसे तो ठीक-ठीक इसकी शुरुआत के बारे में ज्यादा नहीं लिखा हुआ है. लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि साल 1582 से अप्रैल फूल को मनाना शुरू हुआ. जब फ्रांस ने जूलियन कैलेंडर से हटकर ग्रेगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल करना शुरू किया. इसका फैसला काउंसिल ऑफ ट्रेंट ने किया था.


लोगों का मजाक बनाया
इस फैसले के बारे में सभी को एक साथ नहीं पता चल पाया था. लोगों को धीरे-धीरे इसके बारे में पता चला, जो लोग 1 जनवरी की बजाए मार्च के आखिरी हफ्ते या 1 अप्रैल के दिन नया साल मना रहे थे, उनका मजाक बनाया जाने लगा.तब इसको ‘ऑल फूल्स डे’ के नाम से जाना जाता था. जैसे-जैसे ये आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे लोग एक दूसरे के साथ प्रैंक करने लगे.



हिलारिया पर्व के साथ जोड़ा
कई इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन रोम में इस तरह का एक पर्व मनाया जाता था. इसका नाम हिलारिया था और ये मार्च के आखिरी हफ्तों में मनाते थे.


18वीं सदी में ब्रिटेन में मशहूर
पूरे ब्रिटेन में अप्रैल फूल 18वीं सदी से लोकप्रिय हुआ. स्कॉटलैंड में ये एक ट्रेडिशन बन गया. यहां इसे 2 दिन मनाया जाता है. इस दौरान कई प्रैंक किए जाते हैं.


आधुनिक समय में अप्रैल फूल के दिन प्रैंक के साथ अफवाह भी फैलाई जाने लगी. इन्हें फैलाने में न्यूज़पेपर, रेडियो, टीवी स्टेशन और वेब मीडिया शामिल हो गई है. इस दिन मीडिया माध्यम फिक्शनल दावे और खबरें प्रसारित कर अपने दर्शकों का मूर्ख बनाते हैं.


कब-कब मीडिया ने बनाया मूर्ख
1957 में बीबीसी ने फर्जी खबर प्रसारित की थी. बीबीसी ने रिपोर्ट किया कि स्विटजरलैंड में स्फगेटी की बंपर फसल हुई है. लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ऐसे कुछ टीवी विजुअल्स दिखाए और लोगों ने इसे यकीन माना. ऐसी खबरें 1985, 1996 और 1998 में भी दिखाई गईं. लोगों ने इन पर यकीन किया और मूर्ख बने.


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