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मैसूर के आउटर में स्थित वरुणा विधानसभा सीट कर्नाटक की सबसे प्रतिष्ठित सीटों में से एक है. यह सीट 2008 में ही अस्तित्व में आई है, तब से ही यह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सीट है. इससे पहले 1983 से 2008 तक चामुंडेश्वरी सीट से वह सात बार चुनाव लड़ चुके हैं. इस बार सिद्धारमैया अपने बेटे यतींद्र के लिए वरुणा सीट खाली कर रहे हैं और वह खुद चामुंडेश्वरी वापस लौट रहे हैं.इस बार वरुणा सीट पर सीएम सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र और बीजेपी के सीएम पद के उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र के बीच रोचक मुकाबला देखने को मिल सकता है.
मैसूर सिद्धारमैया का गढ़ माना जाता है. इसलिए इस चुनाव में पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह मैसूर पर खासा फोकस कर रहे हैं. वे पहले ही तीन-चार बार मैसूर का दौरा कर चुके हैं. बीजेपी ने सिद्धारमैया के होम टर्फ में उन्हें कड़ी टक्कर देने की तैयारी कर ली है.
सिद्धारमैया ने अपने बेटे यतींद्र को वरुणा सीट से चुनाव मैदान में उतारने की घोषणा कर दी है. इसे एक चैलेंज के रूप में लेते हुए बीजेपी ने यहां से एक मजबूत उम्मीदवार खड़ा करने की योजना बनाई है. येदियुरप्पा के बड़े बेटे बीवाय राघवेंद्र शिमोगा जिले के शिकारीपुरा से विधायक हैं, इससे पहले वह शिमोगा से सांसद भी रह चुके हैं. इस बार उन्होंने वह सीट अपने पिता के लिए खाली की है. पारिवारिक सूत्रों का कहना है कि राघवेंद्र इस बार रनेबेन्नुर सीट से चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं. वहीं येदियुरप्पा के छोटे बेटे विजयेंद्र अब तक पर्दे के पीछे से ही पार्टी का काम देख रहे थे, यदि पार्टी उन्हें टिकट देती है तो यह उनका पहला चुनाव होगा. (पढ़ेंः सिद्धारमैया ने कहा- अमित शाह बताएं कि वो ‘हिंदू’ हैं या ‘जैन’)दूसरी तरफ यतींद्र एक मेडिकल प्रैक्टिशनर हैं. उनकी राजनीति में कभी दिलचस्पी नहीं रही. जुलाई 2016 में यतींद्र के बड़े भाई राकेश की बेल्जियम में मौत हो गई. उनकी मौत से पहले तक सिद्धारमैया के करीबी नेता भी यतींद्र को नहीं जानते थे. तब तक राकेश को सिद्धारमैया का राजनीतिक वारिस माना जा रहा था.
यतींद्र पिछले दो सालों से वरुणा में काम कर रहे हैं और वह स्थानीय मुद्दों और वहां के वोटरों से भलिभांति परिचित हैं. उन्हें वहां लोकल होने का फायदा भी मिल रहा है. दूसरी तरफ येदियुरप्पा के बेटे मैसूर की राजनीति में एक बाहरी हैं. शिमोगा में पले-बढ़े विजयेंद्र पिछले 10 सालों से बेंगलुरु में रह रहे हैं. (पढ़ेंः कर्नाटक चुनाव: शनिवार को वोटिंग-अमावस को नतीजे, नेताओं को अशुभ की आशंका)
हालांकि, सीएम के बेटे के खिलाफ विजयेंद्र को उतारने के पीछे स्थानीय बीजेपी नेताओं की अपनी वजहें हैं:
पहला, जेडीएस और कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले मैसूर क्षेत्र में बीजेपी के पास चुनाव जीत सकने वाले उम्मीदवारों की कमी है. 2013 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में बीजेपी को करारी हार मिली थी, वह यहां से एक भी सीट जीत नहीं पाई थी. येदियुरप्पा के पर्सनल असिस्टेंट कपू सिद्धालिंगास्वामी ने केजेपी के टिकट पर वरुणा से सिद्धारमैया के खिलाफ चुनाव लड़ा था और 30 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए थे.
दूसरा, वरुणा में वीरशैवों की एक बड़ी जनसंख्या है जो लिंगायतों को माइनॉरिटी स्टेटस देने की वजह से सिद्धारमैया से नाराज चल रहे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक वरुणा में करीब 60 हजार वीरशैव, 40 हजार नायका एसटी, 15 हजार कुरुबा, 10 हजार वोकालिगा और 50 हजार से ज्यादा दलित वोटर्स हैं. बीजेपी को उम्मीद है कि वहां उसे वीरशैव का समर्थन मिलेगा और वह एससी/एसटी वोट डिवाइड करने में सफल होगी.
हालांकि सिद्धारमैया का कहना है कि इन समुदायों ने पहले भी उनके लिए वोट किया है और वे ऐसा करते रहेंगे. उन्होंने कहा, “बीजेपी लोगों को बांटने का काम करती है. हम ऐसा नहीं करेंगे. इन समुदायों ने पहले भी मुझे वोट किया है और आगे भी करेंगे.”
इस मामले अब तक येदियुरप्पा ने कुछ नहीं कहा है. हालांकि वरुणा के बीजेपी नेताओं ने अमित शाह को चिट्ठी लिखकर विजयेंद्र को वहां से टिकट देने की मांग की है.
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