Friday, 30 March 2018

आखिर क्यों कर्नाटक चुनाव 2019 के लिए कोई संकेत नहीं देगा?


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(अजय सिंह)भारत में, हर चुनाव अपने आप में अनोखा होता है. हर चुनाव को भविष्य की राजनीति के लिए एक ट्रेंडसेटर कहा जा सकता है. हालांकि वास्तविकता यह है कि कोई चुनाव शायद ही पहले से स्थापित चुनावी समीकरण में कोई बदलाव करता है. जो लोग सोचते हैं कि 12 मई को होने वाला कर्नाटक विधानसभा चुनाव, राष्ट्रीय राजनीति में बनने वाली स्थितियों के लिए एक संकेत होगा उन लोगों को निश्चित रूप से राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के बाद निराशा हो सकती है.


लोकसभा चुनाव होने में अभी भी एक साल बाकी है इस दौरान राज्य विधानसभाओं में होने वाले चुनाव व उप-चुनाव राजनीतिक विश्लेषकों को उभरते हुए राजनीतिक समीकरणों का एक संकेत दे सकते हैं. लेकिन इसकी विश्वसनीयता बहुत ही संदिग्ध होगी, क्योंकि कई सालों से भारतीय मतदाताओं के मूड का पता लगा पाना मुश्किल है. उनके किसी भी क्रिया के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल होता है.


मिसाल के तौर पर, फरवरी में राजस्थान में हुए तीन उपचुनावों में बीजेपी की हार के बाद एक नारा उभरा रानी तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं.’ लेकिन यह बात साफ है कि यह नारा किसी मीडिया कंसल्टेंट या एक्सपर्ट द्वारा नहीं दिया गया था बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से आम लोगों द्वारा दिया गया था. बेशक, वसुंधरा राजे सिंधिया के खिलाफ गुस्सा राजस्थान में काफी स्पष्ट है.इसी तरह, कर्नाटक चुनाव में भी कई फैक्टर काम करेंगे. कांग्रेस ने एक चतुराई भरा कदम उठाया. उसने मोदी व उनके व्यक्तित्व से चुनाव का मुद्दा उठाकर कर्नाटक के स्थानीय मुद्दों पर इसे केंद्रित कर दिया. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने चतुराई दिखाते हुए राज्य के लिए एक अलग झंडे का मुद्दा उठाकर कन्नड़ उप-राष्ट्रवाद को हवा दी. उन्होंने शक्तिशाली लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देकर उसे भी बीजेपी से दूर करने की कोशिश की.


सैद्धांतिक रूप से यह सही दिखता है. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि सिद्धारमैया को अपने राज्य में एंटी-इंकंबेंसी भावनाओं का भी सामना करना पड़ रहा है. हालांकि सिद्धारमैया काफी चतुर राजनीतिज्ञ हैं लेकिन राज्य में उनका प्रदर्शन बहुत बेहतर नहीं रहा है. बिगड़ती कानून और व्यवस्था के अलावा, राज्य में बुनियादी ढांचे को लेकर भी कई समस्याएं हैं. राज्य में रोज़गार सृजन और ग्रामीण संकट जैसी समस्याएं काफी स्पष्ट रूप से दिखती हैं. इसलिए, सिद्धारमैया के पास अपने रसूख को बचाने का अंतिम सहारा यही था कि लोगों की भावनाओं के साथ खेला जाए.


बेशक, भारतीय राजनीति में भावनाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. लेकिन शायद ही कभी उन्होंने हारते हुए नेता की किस्मत को बचाने में एक भूमिका निभाई है. अगर सिद्धारमैया एक अपवाद साबित होते हैं तो उन्हें अपने भाग्य पर गर्व होना चाहिए. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन्होंने कर्नाटक के चुनावी पानी को इतना गंदा कर दिया है कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक स्पष्ट राय बना पाना बहुत मुश्किल हो गया है. लेकिन यह दुविधा मतदाताओं पर लागू नहीं होती. उन्होंने अब तक फैसला कर लिया होगा कि किसे वोट देना है.


कर्नाटक चुनाव के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण चुनाव होंगे जहां भाजपा को अपनी सत्ता को बचा के रखने की चिंता होगी. राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी को अपनी जमीन खोने की पर्याप्त संभावनाएं हैं. मध्यप्रदेश में, ग्रामीण संकट और भ्रष्टाचार की खबरें लगातार सरकुलेट की जा रही हैं. और उनमें से कुछ की विश्वसनीयता भी है. राजे सरकार जो सरकार-विरोधी भावनाएं झेल रही है वो राज्य में हुए हालिया उप-चुनावों में दिख भी गया है.


हर तरह से सभी राज्यों के विधानसभा चुनावों में अलग-अलग परिणाम आने हैं. लेकिन इन चुनाव परिणामों की वजह से 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कोई निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा. इन राज्यों में चुनाव वहां की राज्य सरकार के कार्यों के आधार पर लड़े जाएंगे. राज्य के अधिकतर चुनाव व उप-चुनाव वहां के स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखकर लड़े जाते हैं. देश के स्तर के मुद्दों को ध्यान में रखकर वोटिंग नहीं होती.


जाहिरी तौर पर देश के राजनीतिक इतिहास में ये बार-बार होता रहा है. मिसाल के तौर पर, 1960 के दशक में, पूरे देश में व्याप्त कांग्रेस-विरोधी भावनाओं ने कई राज्यों में कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंका लेकिन 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस जीत गई. हाल ही में 2012 में यूपी के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की बुरी तरह से हार हुई. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में उसी बीजेपी ने 80 लोकसभा सीटों में से 73 सीटों पर जीत दर्ज की. बिहार में भाजपा ने 40 में से 31 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया लेकिन उसी के एक साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में हार गई. यही कहानी दिल्ली में भी दोहराई गई, जहां लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सभी 7 सीटें जीत लीं लेकिन विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार गई.


लोकसभा चुनाव का खेल पूरी तरह से अलग है-
राज्य विधानसभा चुनावों मेें स्थानीय मुद्दे निर्णायक होते हैं, जबकि इसके विपरीत लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी का व्यक्तित्व व उनका काम चर्चा का विषय होगा. मोदी का प्रदर्शन, उनकी विश्वसनीयता और उनके राजनीतिक प्रबंधन को उनके विरोधियों के खिलाफ परखा जाएगा. वो विपक्षी दल जो अभी तक एकजुट होने की जद्दोजहद में हैं. पिछले अनुभवों को देखें तो मोदी विपरीत परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने में अच्छी काबिलियत रखते हैं. फिर उन परिस्थितियों में जबकि मतदाता नारों व सोशल मीडिया से प्रभावित होता हो उसके लिए एक साल का समय काफी है.


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