Saturday, 31 March 2018

राजस्थान का ढोली समुदाय जो ना हिंदू है ना मुस्लिम


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राजस्थान में एक समुदाय अपने वजूद, अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा है. उस समुदाय के लोगों की धार्मिक पहचान पर ही संकट खड़ा हो गया है. खुद को वो हिंदू मानते हैं, लेकिन राजस्थान सरकार ने दस्तावेजों में उनका धर्म हिंदू से बदलकर गैर मुस्लिम कर दिया है. यानी अब ना वो हिंदू हैं, ना मुसलमान. पहचान पर उठे सवाल ने उस समुदाय से दलित होने का हक भी छीन लिया है. अपनी असली पहचान हासिल करने के लिए समुदाय के लोग कई सालों से संघर्ष कर रहे हैं.हम बात कर रहे हैं राजस्थान के ढोली समुदाय के बारे में. ये नाम इस समुदाय को इनके पेशे की वजह से मिला है. ढोली समुदाय खुद को गंधर्व देव की सन्तान मानते हैं. राजा-महाराजाओं के काल में युद्ध के दौरान रणभेरी बजाने वालों के तौर पर ये जाति अस्तित्व में आई और ढोल बजाने की वजह से इन्हें ढोली कहा जाने लगा. लेकिन ये पौराणिक पहचान आज इनके किसी काम की नहीं ये तो सरकारी दस्तावेजों में अपने अस्तित्व पर मुहर चाहते हैं क्योंकि इनकी धार्मिक पहचान पर ही संकट मंडराने लगा है.



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न्यूज18 इंडिया पहुंचा है जयपुर से 40 किलोमीटर दूर मुंडिया रामसर गांव के बाहर बनी इस बस्ती से अक्सर संगीत के ऐसे सुर उठते रहते हैं. ये बस्ती है हिंदू ढोली समुदाय की.
इन्हें यहां पर राणा के नाम से जाना जाता है. राणा ढोली समुदाय की एक उप जाति है. राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग उप जातियां हैं.राणा के अलावा नगारची, दमामी और बारहेठ भी ढोली समुदाय की उप जातियां हैं. ढोली हिंदू भी हैं और मुसलमान भी.ढोली हिंदू भी हैं और मुसलमान भी.
2013 में राजस्थान सरकार ने इन्हें मुस्लिम घोषित कर दिया.लेकिन समुदाय के लोगों ने इस फैसले का विरोध किया.फिर 2016 में इन्हें सरकारी दस्तावेजों में गैर मुस्लिम का दर्जा दे दिया गया.लेकिन लंबे संघर्ष के बाद भी अभी तक इन्हें मूल धर्म की पहचान नहीं मिली यानी ये अब ना हिंदू हैं, ना मुसलमान.


सवाल उठता है कि आखिर इस फैसले से इनकी जिंदगी में क्या बदला. इस सवाल का जवाब आपको योगेश से मिलेगा. योगेश राणा सेना और अर्धसैनिक बल में भर्ती के लिए पिछले पांच साल से तैयारी कर रहे हैं. मैदान पर पसीना बहाने के अलावा घर पर घंटों पढ़ाई करने के बावजूद इनका अभी तक चयन नहीं हो पाया है जबकि अब तक ये चार नौकरियों के लिए परीक्षा पास कर चुके हैं. लिखित परीक्षा पास करने के बाद इनसे धर्म और जाति का प्रमाण पत्र मांगा गया, जो ये नहीं दे पाए नतीजा हाथ आई नौकरी निकल गई.


संतरा देव 50 साल से ढ़ोल बजा रही हूं न्यूज 18 इंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा-. हमारे पासे खाने का ही इंतजाम नहीं जाति प्रमाण पत्र नहीं मिल रहा है, हम शुरु से राणा है लेकिन हमें मुसलमान बना दिया.बच्चे क्या करेंगे हम तो मरने के लिए जा रहे हैं.


खैरूजी राणा शहनाई वादक हैं. न्यूज 18 इंडिया को उन्होंने अपना दर्द कुछ इस तरह बयान किया- कोई हमें ढ़ोली कहते हैं कोई भांड कहते हैं, कोई राणा कहते हैं. ये पांच जाति एक है. शुरु से ढ़ोल बजाते तो हमारी पहचान हो हम भी थोड़ा जीवन में आए कि हम कुछ है जैसे हम संसार में ही नहीं हम मुसलमान नहीं हिंदू है.


धर्म परिवर्तन की आहट मिलते ही हिंदूवादी संगठन इन ढोलियों को उनका हक दिलाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं. एक बार फिर इतिहास की सुनी-अनसुनी कहानियों की चर्चा तेज हो गई है. इस समुदाय का मानना है कि ढोली मूल रूप से हिंदू ही थे. मुगल बादशाह औरंगजेब के काल में बिरादरी के ज्यादातर लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया था तबसे धर्म भले ही अलग है, लेकिन ढोली समुदाय की जातियां इस्लाम में भी वहीं हैं, जो हिंदू धर्म में हैं. पेशा भी दोनों मजहब का एक जैसा ही है फिर भी अपनी मूल पहचान से कट जाने का दर्द ढोलियों को तकलीफ दे रहा है. तकलीफ इस बात की भी है कि जिस देश में रंगों का धर्म तय हो चुका है जहां भगवा और हरे रंग को मजहबी पहचान मिल चुकी है. वहां कुछ ऐसे इंसान भी हैं, जिन्हें ना हिंदू अपना कह रहे हैं, ना मुसलमान खुद में शरीक कर रहे हैं. जहां जमीन और इमारतों को अपने-अपने धर्म का बताकर उस पर हक जताया जा रहा है, वहां ढोली समुदाय को अपना धार्मिक हक पाने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है.


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