Friday, 30 March 2018

ममता बनर्जी को वही करना चाहिए, जो 1989 में देवी लाल ने किया था


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आशुतोषलोकसभा के चुनाव में अभी भी एक साल का वक्त बाक़ी हैं, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों ने अभी से ही माहौल बदल दिया है. आज हर किसी के मन में दो सवाल लगातार उठ रहे हैं- क्या मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे? क्या विपक्षी दल एक साथ मिलकर मोदी को टक्कर देंगे? उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों में भारी जीत के बावजूद मोदी पहले की तरह लोकप्रिय नहीं रहे.


बीजेपी अभी 22 राज्यों में सत्ता में है और इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति को जाना चाहिए और वो हैं नरेन्द्र मोदी. अमित शाह सिर्फ मोदी के विचारों को लागू करते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमित शाह ने बीजेपी को एक बड़ी चुनावी मशीन बना दिया है.


ऐसे समय में जब मोदी ढलान पर हैं, अर्थव्यवस्था में सुधार का कोई संकेत नहीं दिखता है, ग्रामीण संकट बढ़ रहा है, बेरोजगारी युवाओं को परेशान कर रही है, राफेल सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप है, नीरव मोदी के साथ कथित नजदीकियां कई सवाल खड़े करती है. ऐसे में सवाल ये कि क्या विपक्ष मौजूदा हालात का फायदा उठा सकती है? ऐसे मोड़ पर ममता बनर्जी की दिल्ली यात्रा और विपक्षी नेताओं के साथ उनकी बैठकों का काफी महत्व है.ममता बनर्जी एक ऐसे राज्य से आती हैं, जहां बीजेपी की पोजिशन अच्छी नहीं है. लेकिन इस राज्य में बीजेपी की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं. धीरे-धीरे बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस का सफाया हो गया है. ममता को पता है कि आने वाले दिनों में यहां बीजेपी उनकी सबसे बड़ा दुश्मन होगी. आरएसएस और बीजेपी दोनों का यहां लंबे विज़न के साथ काम कर रही है.


राज्य में सांप्रदायिक झड़प तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए बीजेपी के आक्रामक बयानों का नतीजा है. धर्म के नाम पर लोगों का जुटना ममता बनर्जी के लिए एक नया अनुभव होगा. अगर वो अतीत से बाहर आ सकती है, तो वो उनके हित में होगा. वामपंथियों को वो छोड़ दें और नई चुनौतियों के लिए तैयार रहें. लेकिन वामपंथी भी दुविधा में है. वो ऐसे राज्य को नहीं छोड़ सकता है जहां उसने 35 साल तक राज किया. ऐसे में ममता के लिए उनकी पहली चुनौती होगी अपने राज्य को ठीक तरीके से मैनेज करना जिससे कि उनका राज्य दूसरे के लिए एक मॉडल बन सके.


ममता को देवी लाल की भूमिका निभानी होगी. देवीलाल 1980 के दशक में हरियाणा में एक मजबूत स्तंभ के तौर पर उभरे थे. ये वो समय था जब राजीव गांधी को सबसे ऐतिहासिक जनादेश मिला था. लोकसभा में 400 से अधिक सीटें उन्होंने जीती थीं, विपक्ष लगभग खत्म हो गया था. बीजेपी की सिर्फ दो सीटें थी, और आंध्र प्रदेश से एनटी रामाराव की अगुवाई में टीडीपी विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी थी.


विपक्ष की हालत बेहद खराब थी. उन्हें एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो उन्हें एकजुट कर सके. उस वक्त देवी लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे और लंबे अनुभव के चलते वो दूसरों को साथ लेकर चल सकते थे. इसमें कोई शक नहीं है कि उन दिनों वीपी सिंह सबसे बड़े स्टार नेता थे. वो राजनीति के मैदान में योद्धा की तरह नज़र आते थे. लेकिन विपक्षी नेताओं के साथ उनका कोई संबंध नहीं था. उनका पूरा जीवन कांग्रेस में ही बीता था. वीपी सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और बाद में राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री भी रहे थे. बोफोर्स घोटाले के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था.


शुरुआत में वीपी सिंह विपक्ष के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने खुद जन मोर्चा के नाम से एक मंच तैयार किया. वो इस बात को लेकर संकोच में थे कि क्या अपना रास्ता बनाया जाए या फिर बाकी लोगों के साथ हाथ मिलाया जाय. वो इस बात को लेकर दुविधा में थे कि आखिर ऐसे लोगों से कैसे हाथ मिलाया जाए जिसके खिलाफ वो पूरे जीवन भर लड़ते रहे. वो अपनी साफ छवि के साथ समझौता नहीं करना चाहते थे.


देवी लाल, हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु, एनटी रामाराव, राम कृष्णा हेगड़े और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें आश्वस्त किया कि एक साथ लड़े बिना सारी मेहनत बेकार हो जाएगी. वीपी सिंह इस तर्क को समझ गए.


उस समय कांग्रेस का कद काफी बड़ा था. वो एक पार्टी नहीं थी, बल्कि एक प्रणाली थी. कांग्रेस को तब ही हराया जा सकता है जब विरोधी एक साथ आए. देश के सामने 1967 और 1977 के दो उधारण थे. उस वक्त देवी लाल ने सारी ताकतों को एक साथ मिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. जनता पार्टी के सभी विभाजित समूहों से अनुरोध किया गया कि वे जनता दल में मिल जाए.


जो लोग जनता दल में शामिल नहीं हो सके उनके लिए एक राष्ट्रीय मोर्चा बनाया गया था. सीपीएम की अगुआई वाली वामपंथी और बीजेपी ने अपने मुख्य विचारधाराओं को बिना छोड़े राष्ट्रीय मोर्च को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया था. ये एक अनूठा प्रयोग था. वीपी सिंह सरकार को बीजेपी और वामपंथी ने समर्थन दिया था. आज, ममता और अन्य विपक्षी नेताओं को वैसा ही करिश्मा करना होगा.


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, दुनिया को तेजी से दो विचार धाराओं में विभाजित किया गया. भारत कोई अलग नहीं था. 1980 के दशक में, भारत में वामपंथी काफी ताकतवर था, बीजेपी कमजोर थी. ऐसे में दोनों को एक साथ एक मंच पर लाना मुश्किल चुनौती थी. लेकिन राजनीति व्यावहारिक वास्तविकताओं से तय होती है. कांग्रेस को हराने की जरूरत थी उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप थे. नेता उन दिनों स्मार्ट होते थे, वे लोगों की नब्ज को समझते थे. सवाल उठता है कि क्या वे आज भी ऐसा ही करेंगे? सवाल ये भी है कि क्या ममता इस भूमिका को निभा सकती हैं?


अगर मायावती और अखिलेश यादव गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी को हराने के लिए एक साथ आ सकते हैं, तो ममता और वामपंथी भी सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए क्यों हाथ नहीं मिला सकते हैं.


तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव और कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस भी नरेंद्र मोदी को हराने के लिए एक साथ आ सकते हैं. कांग्रेस और एनसीपी के बीच कोई अंतर नहीं है, और वे आसानी से एक साथ हो सकते हैं. शिवसेना और एमएनएस को भी एक मंच पर लाया जा सकता है. ममता हर किसी से बात कर रही है जिसमें अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं.


सोनिया गांधी के साथ ममता के अच्छे संबंध हैं. वो कांग्रेस को अच्छे से जानती है. राष्ट्रव्यापी मंच से आखिरकार कांग्रेस को फायदा होगा. अगर मोदी को 2019 में नहीं हराया गया तो कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान होगा. कांग्रेस नवीन पटनायक से बात कर सकती है और ममता एक मध्यस्थ की भूमिका निभा सकती है.


टीडीपी पहले ही एनडीए छोड़ चुका है. शिवसेना एक विपक्षी दल की तरह कर रही है. यूपी में ओमप्रकाश राजभर नाखुश हैं. उपेंद्र कुशवाहा लालू प्रसाद यादव से मुलाकात कर रहे हैं.


समय की आवश्यकता है कि बिना लड़े एक साझा कार्यक्रम तैयार किया जाए. मोदी को हराया जा सकता है, लेकिन विपक्ष को पहले इस पर विश्वास करना होगा.


(लेखक आम आदमी पार्टी के नेता हैं, ये लेखक के निजी राय है)

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