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(रिशिका सादाम)तेलंगाना चुनाव में हुए कड़े मुकाबले का नतीजा क्या होगा, सबकी नजर इस वक्त इसी तरफ लगी हुई है. चार साल पहले तेलंगाना राज्य का निर्माण हुआ था, जिसके बाद 7 दिसंबर को यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए.
चुनाव परिणामों को लेकर हर एग्जिट पोल अलग तस्वीर बयां कर रहा है, ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या तेलंगाना की जनता ने किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया है?
विधानसभा चुनाव के दौरान तेलंगाना में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला. चुनाव में टीआरएस, कांग्रेस के नेतृत्व वाला महाकुटमी गठबंधन और बीजेपी आमने-सामने थे. अधिकांश एग्जिट पोल ने इस तरफ इशारा किया कि केसीआर राज्य की सत्ता में वापसी कर रहे हैं. 2014 में तेलंगाना आंदोलन से जुड़ी भावनाओं की बदौलत केसीआर सत्ता में आए थे. टीआरएस को 63 सीटें मिली थी, जो कि सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या 60 से थोड़ी अधिक हैं.वहीं दूसरी तरफ 2014 में कांग्रेस और टीडीपी को 21 और 15 सीटें मिली. दोनों के वोट शेयर की बात करें तो कांग्रेस का वोट शेयर 25% और टीडीपी का वोट शेयर 15% रहा. दोनों के वोट शेयर को मिला दें तो ये 40% होता है जो कि टीआरएस के 34% वोट शेयर से अधिक है.
अब भले ही एग्जिट पोल टीआरएस की जीत का इशारा दे रहे हैं, लेकिन राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि चुनाव परिणाम इससे अलग हो सकते हैं. एंटी इनकंबेंसी के कारण केसीआर के लिए सबकुछ इतना आसान नजर नहीं होगा. अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए टीआरएस को कई कल्याणकारी योजनाएं लानी पड़ी थी, और अब पार्टी दावा कर रही है कि उसे 100 से ज्यादा सीटें मिलेंगी.
महाकुटमी गठबंधन की बात करें तो चुनाव के दौरान राहुल गांधी और चंद्रबाबू नायडू राज्य में आक्रमक तरीके से प्रचार करते नजर आए थे. महाकुटमी से कांग्रेस ने 98, टीडीपी ने 13, जेडीएस ने 8 और सीपीआई ने 3 सीटों पर चुनाव लड़ा. 80 के दौर से एक दूसरे के प्रतिद्वंदी कांग्रेस और टीडीपी ने केसीआर को हराने के लिए पहली बार हाथ मिलाया है.
2014 के नतीजों के आधार पर बात करें तो यह गठबंधन 16 विधानसभा क्षेत्रों में सत्ताधारी पार्टी के वोट शेयर को नुकसान पहुंचाने के साथ उन सीटों को वापस जीत सकता है जो उसे 2014 में मिली थीं. हालांकि यह तभी संभव होगा जब उनका वोट शेयर आसानी से ट्रांसफर हो जाए.
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राज्य में अब भी तेलंगाना आंदोलन से जुड़ी भावनाएं मौजूद हैं और कांग्रेस और से टीडीपी के गठबंधन के बाद मुकाबला फिर से तेलंगाना बनाम आध्र प्रदेश का हो गया है. केसीआर और उनके बेटे केटी रामा राव लगातार आरोप लगा रहे हैं कि चंद्रबाबू नायडू, जिन्होंने कि तेलंगाना के गठन का विरोध किया था अब ‘प्रॉक्सी अलायंस’ के जरिए तेलंगाना पर राज करना चाहते हैं. एंटी इनकंबेंसी को कम करने के लिए पिता-पुत्र एक ही तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर वे अपना वोट बैंक एकजुट रख पाए तो इसका मतलब ये होगा कि उनकी तरकीब काम कर गई.
राज्य के मुकाबले में खड़ी तीसरी पार्टी बीजेपी को 2014 के चुनाव में 5 सीटें मिली थीं. 2014 में पार्टी का टीडीपी से गठबंधन था. इस बार बीजेपी अपने दम पर चुनाव मैदान में है और उसे आशा है कि वह राज्य में मजबूत होकर उभरेगी. तेलंगाना के बीजेपी अध्यक्ष डॉ के लक्ष्मण ने न्यूज18 से कहा कि बीजेपी राज्य में इस बार किंगमेकर के तौर पर उभरेगी और अगर सत्ताधारी पार्टी ओवैसी की AIMIM के साथ अपनी दोस्ती खत्म कर लेती है तो वह उसके साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है.
इसके साथ ही नजरें AIMIM पर भी होंगी, जिसने पिछले चुनाव में 7 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सातों पर जीत दर्ज की थी. पार्टी ने इस बार 8 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं और सभी पर जीत की उम्मीद कर रही है.
इस बार संभावना जताई जा रही है कि अगर जरूरत पड़ी तो टीआरएस एवं MIM में गठबंधन हो सकता है, क्योंकि दोनों ही पार्टियों के रिश्ते काफी अच्छे हैं. यहां ध्यान देने वाली बात ये भी है कि 2014 में जहां राज्य में 69.5% मतदान हुआ थी वहीं इस बार यह बढ़कर 72.4% हो गया.
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