Monday, 30 April 2018

SC-ST एक्ट में बदलाव के खिलाफ आज 'प्रतिरोध दिवस' मनाएंगे दलित संगठन


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एससी/एसटी एक्ट यानी दलित कानून में संशोधन के खिलाफ 1 मई को देश के कई दलित संगठन प्रतिरोध दिवस मनाने जा रहे हैं. अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने दलित कानून (एससी/एसटी एक्ट) पर एक अहम फैसला सुनाते हुए मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. इस फैसले के खिलाफ देशभर के दलित 1 मई को लामबंद होंगे और जगह-जगह प्रदर्शन कर विरोध जताएंगे.दलित मूवमेंट फॉर जस्टिस (NDMJ) के महासचिव डॉक्टर वीए रमेन नाथन ने विरोध प्रदर्शन को शांतिपूर्ण आयोजित करने की अपील की है. नाथन के मुताबिक, दलितों की आवाज बुलंद करने के लिए बने नेशनल कोअलिशन के बैनर तले 1 मई को सभी जिला और प्रदेश मुख्यालयों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का फैसला किया है.


नाथन ने लोगों से अपील की कि दलित कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एक मई को राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाएं. उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं, कामगार समूहों, मजदूर संगठनों, मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्थाओं, महिला संस्थाओं से सहयोग मांगा है. उन्होंने कहा कि इस दिन देशभर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए जाएंगे.नेशनल कोअलिशन ने सरकार के सामने 12 प्रमुख मांगें रखी हैं. उनकी मांगों में एक मांग यह भी है कि भारत सरकार यह तय करे कि दलित कानून (अत्याचार से संरक्षण) की स्थिति वही रहे जो सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसेल से पहले थी. न तो इसमें जूडिशरी दखल दे और न ही संसद.


इससे पहले दलितों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में 2 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया था.


ये भी पढ़ें: कैंडिडेट्स के सीने पर SC-ST लिखने पर बोले राहुल- BJP की इस सोच को हराकर रहेंगे


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NEWS BLOG: J&K में 2 आतंकियों की मौत पर हुर्रियत ने आज बुलाया 'जम्मू बंद'


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कर्नाटक चुनाव को लेकर पीएम मोदी आज से बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे. राज्य में 5 दिन के दौरान पीएम मोदी की 15 रैलियां होनी हैं. राज्य में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद पहली बार आ रहे मोदी अपने आक्रामक प्रचार अभियान की शुरुआत चामराजनगर से करने जा रहे हैं. वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तरी तानाशाह किम जोंग उन की मुलाकात सिंगापुर में हो सकती है. ट्रंप ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है. फिलहाल मुलाकात किस दिन होगी, ये तय नहीं किया गया है.


उधर, एससी/एसटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ दलित संगठन आज प्रतिरोध दिवस मनाने जा रहे हैं. इस दौरान दलित जगह-जगह लामबंद होंगे और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे. वहीं, जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ के दौरान 2 आतंकियों और एक पत्थरबाज की मौत पर अलगाववादी पार्टी हुर्रियत ने आज जम्मू बंद का ऐलान किया है.


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महज 'सेक्युलरिज़्म' के मुद्दे पर 2019 की जंग कैसे जीतेंगे राहुल गांधी?


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दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने जन आक्रोश रैली की. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बीजेपी और पीएम मोदी पर जमकर बरसे. उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी आज देश में बढ़ रही नफरत, बेरोजगारी और हिंसा पर चुप हैं. राहुल के निशाने पर नोटबंदी, नीरव मोदी, राफेल डील जैसे मुद्दे रहे तो उन्होने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कर्नाटक चुनाव में बीजेपी नेता बीएस येदियुप्पा पर हमला बोला.वैसे ये सारी बातें कमोबेश राहुल के हर भाषण में कहीं न कहीं होती हैं. उनका मुख्य उद्देश्य इन मुद्दों को लेकर सीधे पीएम मोदी के बरक्स खुद को रखने की होती है, क्योंकि कांग्रेस की कोशिश है कि यूपीए 3 के राहुल सर्वमान्य नेता बन सकें. तभी कांग्रेस चाहती है कि साल 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल ही रखा जाए, ताकि बाकी घटक दल और क्षेत्रीय नेताओं को महागठबंधन के नेतृत्व से दूर भी रखा जा सके.


इस बार भी यही हुआ. कांग्रेस ने यूपीए 3 में राहुल के नेतृत्व की राह तैयार करने के मकसद से जनाक्रोश रैली के जरिए दो जगह संदेश भेजने की कोशिश की. पहला संकेत सहयोगी और बीजेपी-संघ विरोधी दलों को सलमान खुर्शीद के जरिए दिया गया.


बीजेपी को हराने के लिए असली मुकाबला संघ से हैराहुल गांधी ने सलमान खुर्शीद के हाल ही में दिए गए बयान को खुर्शीद का निजी विचार बताया तो साथ ही ये हिदायत भी दी कि अलग अलग विचारधारा के बावजूद बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा से लड़ने के लिए एकजुट होने की जरूरत है. साफ है कि उनका इशारा सलमान खुर्शीद के जरिए उस तीसरे मोर्चे की तरफ था जो कि बीजेपी और आरएसएस विचाराधारा का विरोध तो करते हैं लेकिन राजनीतिक नफे-नुकसान के चलते कांग्रेस के साथ आने से कतरा भी रहे हैं.


ऐसे में राहुल गांधी ने सलमान खुर्शीद की राय को पार्टी के भीतर ‘आजाद आवाज’ का अमलीजामा पहना कर ये बताने की कोशिश की कि कांग्रेस के भीतर सभी नेता-कार्यकर्ता अपनी निजी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन साथ ही ये भी ताकीद कर दिया कि संघ की विचाराधारा से लड़ने के लिए सबका एकजुट होना जरूरी है. कांग्रेस ये जानती है कि बीजेपी को हराने के लिए असली मुकाबला संघ से है. संघ का काडर देश के कोने-कोने में मजबूत होता जा रहा है. केरल में कम्यूनिस्ट पार्टियों के लिए संघ चुनौती बन चुका है तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी भी संघ को देखकर ‘सावधान मुद्रा’ में आ चुकी है. त्रिपुरा की हार कांग्रेस के लिए भी सबसे बड़ा सबक है कि वहां नंबर दो की पार्टी होने के बावजूद सूपड़ा ही साफ हो गया.



राहुल गांधी ने सलमान खुर्शीद को अभयदान दिया है.

लेकिन खुर्शीद को ‘अभयदान’ देने के पीछे राहुल की राजनीतिक वजह को भी समझने की जरुरत है. सलमान खुर्शीद ने कहा था कि कांग्रेस के दामन पर भी मुसलमानों के खून के दाग हैं. दरअसल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान उनसे पूछा गया कि 1947 में आज़ादी के बाद हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ,मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, भागलपुर, अलीगढ़ जैसी जगहों पर मुसलमानों का नरसंहार हुआ. इसके अलावा बाबरी मस्जिद के दरवाजे खुलवाना और बाबरी विध्वंस जैसी घटनाएं भी कांग्रेस शासन के दौर में हुई तो कांग्रेस के दामन पर मुसलमानों के इन तमाम धब्बों को आप किन शब्दों के ज़रिये धोएंगे?


लेकिन इससे ये साफ नहीं हो सका कि कांग्रेस क्या ये वाकई मानती है कि उसके शासनकाल में मुसलमानों की जान दंगों में गई? अगर राहुल वाकई सलमान खुर्शीद के बयान से इत्तेफाक रखते हैं तो क्या वो पिछले सत्तर साल में कांग्रेस शासित राज्यों में हुए दंगों के लिए मुसलमानों से माफी मांगेंगे? क्या उन्हें 1984 के सिख दंगों की तरह की खुर्शीद के बयान के बाद मुस्लिम समुदाय से भी माफी मांगनी चाहिए? क्या उन्होंने सलमान खुर्शीद को इसलिए माफ कर दिया और रक्षा का वचन दिया क्योंकि वो मुसलमान हैं?



दिल्ली में राहुल ने मोदी सरकार के खिलाफ जन आक्रोश रैली की,

ऐसे में राहुल गांधी एक तरफ सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए हिंदू वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रहे हैं तो वहीं वो धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और सांप्रदायिक माहौल को हथियार बनाकर संघ के विरोध की आड़ में मुसलमानों को जोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं. राहुल ये जानते हैं कि संघ का ही डर दिखाकर छिटके मुस्लिम वोट बैंक को साधा जा सकता है क्योंकि पीएम मोदी ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे के जरिए अल्पसंख्यकों के दिलों से डर निकालने में कामयाब रहे हैं.


70 सालों में कांग्रेस ने देश को जोड़ने का काम किया है


कांग्रेस के पिछले शासनकाल में जितने दंगे हुए उनका जवाब उसके पास नहीं है लेकिन वो मोदी सरकार पर नफरत और हिंसा फैलाने का आरोप लगा रहे हैं जबकि केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद उस पर एक भी दंगे का आरोप नहीं लगा है.


ऐसे में राहुल की रणनीति उस हौव्वे को बरकरार रखने की है जिसके बूते कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक किसी वक्त सबसे मजबूत आधार होता था. लेकिन बाद में ये खिसकते खिसकते क्षेत्रीय दलों के पास चला गया.


तभी राहुल कांग्रेस के पुराने राजनीतिज्ञों के नक्शे कदम पर चलते हुए ही बीजेपी पर नफरत फैलाने का आरोप लगा रहे हैं तो देश की सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने का आरोप लगा रहे हैं. वो कहते हैं कि देश के डीएनए में नफरत नहीं है और भारत ने पिछले तीन हजार साल में किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया. वो कहते हैं कि 70 सालों में कांग्रेस ने देश को जोड़ने का काम किया है और महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों की रक्षा करने का काम किया है और अब बीजेपी-आरएसएस की नफरत के खिलाफ लड़ना है.



कर्नाटक चुनाव को लेकर राहुल गांधी इन दिनों एक दिन में कई रैलियां कर रहे हैं.

राहुल का ये भाषण नब्बे के दशक में शुरू हुई गठबंधन की सरकारों के दौर की याद दिलाता है. केंद्र में जब एनडीए सरकार कभी 13 दिन तो कभी 13 महीनों में सत्ता से बेदखल हुई थी तो उसकी बड़ी वजह यही थी कि बीजेपी पर सांप्रदायिकता का आरोप लगा कर कथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने समर्थन देने से इनकार कर दिया था. सभी दलों को अपने वोटबैंक को खोने का डर था. आज कांग्रेस उसी डर को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रही है ताकि बीजेपी पर एक बार फिर सांप्रदायिक होने का आरोप साबित कर साल 2019 के लोकसभा चुनाव की धारा तय की जा सके.


राहुल इस बयान के जरिए ये बता गए कि एक तरफ वो मुसलमानों के हितैषी भी हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने पिछले 70 साल में हिफाजत का काम किया है.


इस भाषण के जरिए राहुल का सॉफ्ट हिंदुत्व कहीं से प्रभावित नहीं हुआ. बल्कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय को संबोधित किए बगैर ही ये संदेश भी पहुंचा दिया कि कांग्रेस उनके मुहाफिज़ के तौर पर खड़ी है.


अब जिस तरह से दलितों को लेकर भारत बंद का आव्हान किया गया और फिर संविधान बचाओ रैली की तो अब जनाक्रोश रैली से साफ है कि कांग्रेस चुनाव के मोड में पूरी तरह उतर चुकी है और राहुल साल 2019 के चुनाव का बिगुल फूंक चुके हैं.


राहुल उत्साह और आत्मविश्वास से लबरेज हैं तभी उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव जीतेगी तो साथ ही 2019 का लोकसभा चुनाव भी जीतेगी. इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल में मजबूत नेतृत्व क्षमता उभर कर सामने आ रही है लेकिन चुनावी में जीत के नतीजों से ही कार्यकर्ताओं में जोश आएगा और नेतृत्व क्षमता का असली इम्तेहान भी तभी होगा.



बीजेपी के खिलाफ राहुल गांधी ने सॉफ्ट हिंदुत्व को मुद्दा बनाया है.

कांग्रेस सच के साथ खड़ी है


जनाक्रोश रैली में राहुल ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कर्नाटक में बीजेपी को घेरते हुए बीएस येदुरप्पा पर हमला किया और कहा कि येदुरप्पा वो मंत्री हैं जो जेल जा चुके हैं. अब राजनीति की विडंबना देखिए कि राहुल खुद भी आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव से मिलने एम्स अस्पताल गए और लालू पर चारा घोटाला मामले में कौन-कौन से आरोप कोर्ट में साबित हो चुके हैं वो देश जानता है. इसके बावजूद राहुल का कहना कि कांग्रेस सच के साथ खड़ी है तो वो कई सवाल भी खड़े कर जाता है.


वो कहते हैं कि देश के डीएनए में नफरत नहीं है लेकिन लोकतंत्र की मिसाल देखिए कि जिस पार्टी पर राहुल नफरत फैलाने का आरोप लगा रहे हैं उस बीजेपी और एनडीए की 21 राज्यों में सरकार है. मोदी सरकार पर हमला करने से चार राज्यों में सिमटी हुई कांग्रेस गरीबी और बेरोजगारी को लेकर अपना इतिहास नही बदल सकती है. क्योंकि सिर्फ चार साल की सरकार पर सवाल उठा कर जनादेश को जनाक्रोश के जरिए बदला नहीं जा सकता है.


कुल मिलाकर राहुल गांधी के जनाक्रोश रैली के बाद ये माना जा सकता है कि वो साल 2019 के चुनाव की नई धारा तय करने और उसमें धार देने में जुट चुके हैं.


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पानी की कहानी: इतना डराने क्यों लगा है जीवन देने वाला 'पानी'


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राजधानी दिल्ली के वजीरपुर इलाके में 17 मार्च को लाल बहादुर नाम के 60 वर्षीय एक बुजुर्ग की टैंकर से पानी भरने को लेकर हुए झगड़े में पड़ोसियों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी.इसी साल फरवरी में भरतपुर (राजस्थान), रूपवास थाना क्षेत्र में आने वाले गांव खानसूरजापुर के एक हैंडपंप पर पानी भरने को लेकर हुए झगड़े में सुनीता नामक महिला की मौत हो गई.


इसी अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मध्य प्रदेश के डबरा स्थित कैरुआ गांव में पानी विवाद को लेकर ब्रजेन्द्र नामक एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई.पानी की किल्लत ऐसी कि जान की कीमत भी कम पड़ रही है.


ये वाकये पानी को लेकर बढ़ती जद्दोजहद में एक-दूसरे की जान तक ले लेने के चंद उदाहरण मात्र हैं. गली-मुहल्लों में पानी को लेकर लाठी-डंडे चलना आम बात होती जा रही है. इससे समझा जा सकता है कि देश में पानी को लेकर हालात किस हद तक गंभीर हो चले हैं. Everything Need To Know Water Crisis In India, india face a problem of necessity of Drinking water, हर किसी को जल संकट के बारे में जानना चाहिए, भारत इस वक्त जल संकट से घिरा हुआ है. Paani ki kahani-water predicament conditions in india, पानी की कहानी: इतना डराने क्यों लगा है जीवन देने वाला 'पानी'        पानी की उपलब्धता लगातार कम हो रही है


मेरे गांव में कुछ साल पहले तक 20 मीटर नीचे तक पानी मिल जाता था. लेकिन अब नल मुश्किल से 70-80 मीटर पर पानी देता है. जबकि मेरा गांव दो नदियों के बीच यानी दोआब में पड़ता है. गर्मियों में नल पानी छोड़ने लगता है. पानी का पाताल में जाना बदस्तूर जारी है. यह गहराते जल संकट की एक डरावनी सच्चाई है. कुछ क्षेत्रों में तो पेयजल के लिए चार-पांच किलोमीटर तक लोग पानी ढोने को मजबूर हैं.


हालात ये हैं कि आम आदमी से लेकर सरकारें तक पानी के झगड़े में उलझी हुई हैं. पानी अब चुनावी मुद्दा बन गया है. नेताओं के लिए वोट लेने का औजार बन गया है. एक तरफ पानी के लिए कई राज्यों में हाहाकार मचा हुआ है तो दूसरी ओर सूखे की चपेट वाले बुंदेलखंड में बोतलबंद पानी बेचने वाली 25 रजिस्टर्ड कंपनियां लाखों का कारोबार कर रही हैं.


पानी न सिर्फ आदमी, पशु-पक्षियों और जानवरों सबके जीने की पहली शर्त है, बल्कि आज तेल के बाद वह दुनिया का सबसे बड़ा मुद्दा भी है. धरती से पानी बूंद-बूंद कम होता जा रहा है और हम अपने जलस्रोतों को मिटाते जा रहे हैं.


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मनुष्य के शरीर में लगभग 60 फीसदी पानी होता है. मतलब पानी तो सबकी जरूरत है. संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक पीने के साफ पानी की मांग 40 फीसदी तक बढ़ सकती है. इसलिए हम सबको मिलकर पानी के प्रबंधन के लिए सही मैनेजमेंट करना होगा.



मार्च 2016 में महाराष्ट्र के लातूर शहर में पानी को लेकर इतना संघर्ष था कि प्रशासन ने धारा 144 लगा दी थी. सूखे की मार और उसके बाद पानी की किल्लत से जूझ रहे इस शहर में पहली बार ट्रेन से पानी की आपूर्ति करनी पड़ी थी. तब वहां के लोगों को पानी की कीमत का पता चला था. ऐसे हालात आपके क्षेत्र में भी पैदा हो सकते हैं.


जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है पानी पाताल में जा रहा है. दिल्ली से सटा साइबर सिटी गुड़गांव दुनिया भर में विख्यात है. लेकिन, इसी का एक हिस्सा है मेवात, जिस पर न सिर्फ देश के सबसे पिछड़े जिले का कलंक लगा हुआ है बल्कि यहां के लोग भयंकर जल संकट से दो-चार हो रहे हैं. यहां कुछ ऐसे इलाके हैं जहां जो पानी पशु पीते हैं वही पानी इंसान भी पीने को मजबूर हैं.


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हरियाणा, दिल्ली, यूपी, राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार आदि जल संकट से जूझ रहे हैं. पानी को लेकर उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक तक लड़ाई जारी है. इस साल जल संकट और बढ़ने की आशंका है. इसीलिए सेंट्रल वॉटर कमीशन ने आने वाले दिनों में पानी की संभावित कमी से बचने के लिए फरवरी में ही राज्यों को एडवाइजरी जारी कर दी थी.


पानी के संकट से निपटें तब तो उसकी गुणवत्ता पर बात करें, लेकिन इसकी बात इसलिए जरूरी है क्योंकि ज्यादातर बीमारियां खराब पानी की देन हैं. पानी की गुणवत्ता जांचने वाली प्रयोगशालाएं 130 करोड़ लोगों पर सिर्फ 2289 हैं. यानी कोई व्यक्ति आसानी से यह पता नहीं कर सकता कि वो जो पानी पी रहा है वह कैसा है. पता तब चलता है जब वह किसी बीमारी का शिकार हो चुका होता है.


जल संसाधन मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल संकट साफ पानी की बढ़ती मांग, बारिश में विविधता, बढ़ी हुई आबादी, औद्योगीकरण और शहरीकरण की वजह से है. जबकि पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “हमने अपने आसपास पानी रिचार्ज करने के तंत्र बंद कर दिए और सिर्फ बड़े-बड़े बांधों पर ध्यान लगाया, इससे जल संकट और बढ़ गया. सरकारों ने पानी बचाने के काम में कभी लोगों को नहीं जोड़ा, इससे संकट और बढ़ता गया और बढ़ता रहेगा.”


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बेतरतीब विकास, अंधाधुंध शहरीकरण और लापरवाही से संसाधनों के हो रहे दोहन ने हमें पानी की विकट समस्या के बीच ला खड़ा किया है. हमें तो शायद पानी उपलब्ध हो भी जाए, मगर आने वाली पीढ़ियों के लिए हालात कैसे रहेंगे इसकी कल्पना भी मन में सिहरन पैदा कर देती है.


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आखिर क्यों बदली-बदली नज़र आ रहीं हैं मायावती!


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बसपा सुप्रीमो मायावती के तेवर बदले-बदले नज़र आ रहे हैं. यूपी में खुद आगे बढ़कर अखिलेश यादव और सपा के साथ आने की बात छोड़ भी दें तो कभी भी चुनाव पूर्व गठबंधन की पक्षधर नहीं रही मायावती इस बार कर्नाटक और हरियाणा में चुनावों से पहले ही गठबंधन का ऐलान कर चुकी हैं. कांशीराम के वक़्त से ही बसपा राज्यों में उन पार्टियों से गठबंधन करने की पक्षधर थी, जो सरकार बनाने में समर्थ नजर आती थी. कांशीराम का मानना था कि बसपा के सत्ता के साथ रहने का सीधा फायदा एससी/एसटी समाज के लोगों को ही मिलेगा. कुछ जानकार इसे मायावती की नई रणनीति बता रहे हैं तो कुछ सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने की जद्दोजहद करार दे रहे हैं.कर्नाटक में जेडीएस और हरियाणा में इनेलो
बसपा ने इस बार आगे बढ़कर कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर और हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल से गठबंधन किया है. कर्नाटक में बसपा 22 सीटों पर चुनाव भी लड़ रही और इनमें से 7 सीटें ऐसी हैं जिन पर दलित आबादी सबसे ज्यादा है, कर्नाटक में भी कुल जनसंख्या में से 18% दलित आबादी है. उधर हरियाणा में भी आईएनएलडी के सीनियर नेता अभय सिंह चौटाला ने बीते दिनों बसपा के साथ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन का ऐलान कर दिया है. बता दें कि हरियाणा की आबादी में 21% हिस्सा दलित जातियों का है.


हरियाणा के आलावा मायावती की बातचीत मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड में भी चल रही है और मिली जानकारी के मुताबिक कांग्रेस से उसकी बातचीत नहीं भी बनी तो वो क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर सकती है. मध्य प्रदेश चुनावों से पहले एक निजी न्यूज़ चैनल के सर्वे में सामने आया है कि पिछले चुनाव में 4 सीटें जीतने वाली बसपा इस बार अपना आंकड़ा 12 तक ले जा सकती है. मायावती की बदली रणनीति का उदाहरण आरजेडी चीफ की ‘बीजेपी भागाओ, देश बचाओ’ रैली के दौरान भी देखने को मिला था. इस रैली के लिए लालू ने मायावती को भी न्योता भेजा था लेकिन उन्होंने ये कहकर साफ़ इनकार कर दिया कि बसपा तब तक किसी पार्टी के साथ स्टेज शेयर नहीं करेगी जब तक 2019 के लिए सीट शेयरिंग या गठबंधन का फ़ॉर्मूला फिक्स न हो जाए.


राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचा रही हैं मायावती
ये सच है कि लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न मिलने के बाद से ही बसपा को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म करने का नोटिस दिया जा रहा है. अगर इस बार जरूरत भर की सीटें नहीं मिलीं और दूसरे राज्यों में वोट प्रतिशत नहीं बढ़ा तो बसपा से राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता छिन जाना तय है. मन जा रहा है कि यही वजह है कि मायावती ने बसपा की रणनीति बदली है और यूपी के अलावा दूसरे राज्यों में भी लगातार गठबंधन पर जोर दे रही है. ज़रूरी वोट प्रतिशत हासिल करने के लिए ऐसी पार्टियों से भी हाथ मिलाया जा रहा है जिनकी राज्यों में स्थिति तीसरे या चौथे नंबर पर है.



गौरतलब है कि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए तीन प्रमुख शर्तें हैं. पहली यह कि तीन राज्यों में लोकसभा की कम से कम 2% सीटें मिल जाएं. दूसरी शर्त के मुताबिक लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 6% वोट के साथ ही चार लोकसभा सीटों पर जीत जरूरी है. तीसरी शर्त है कि चार या उससे ज्यादा राज्यों में राज्यस्तरीय पार्टी की मान्यता मिल जाए. बसपा फिलहाल वोट प्रतिशत और लोकसभा सीटों के मामले में पिछड़ रही है.


क्या बसपा सच में मुश्किल में है
बसपा के लिए 2019 लोकसभा चुनावों में यूपी में प्रदर्शन सुधारना सबसे बड़ी चुनौती है. बसपा के लिए अभी तक सबसे अच्छा ये रहा है कि बीते दिनों निकाय चुनावों में अलीगढ़ और मेरठ से उसके मेयर चुनकर आए हैं. ऐसा पहली बार हुआ था कि बसपा ने निकाय चुनावों में उम्मीदवार पार्टी सिंबल पर उतारे थे. हालांकि इन्हीं चुनावों में बसपा के करीब 73% उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए. साल 2007 के बाद से दोनों विधानसभा चुनावों में बसपा को सीटों और वोट शेयर के मामले में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. 2009 के आम चुनावों के 6.17% वोट शेयर और 21 सीट जीतने वाली बसपा 2014 में 4.19% वोट शेयर और जीरो सीट के साथ लोकसभा से गायब ही हो गयी. गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में सपा का साथ देने के बावजूद राज्यसभा में भी बसपा को हार का सामना करना पड़ा.


काफी संभल कर चल रहीं हैं मायावती
बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने प्रभारी तय करते हुए अपनी लोकसभा की तैयारी शुरू कर दी है. ऐसा भी माना जा रहा है कि कार्यकर्ताओं को मिशन 2019 के लिए अलर्ट रहने और लोकसभा की सीटों की सौदेबाजी के समय लीड लेने की कवायद के तहत यह पहल मानी जा रही है. बसपा में यह परंपरा रही है कि सभी सीटों के प्रभारी ही संभावित उम्मीदवार घोषित किए जाते रहे हैं. ऐसे में आखिरी वक़्त पर सपा से गठबंधन न होने पर या फिर कोई भी आपातकालीन स्थिति आने पर वो 80 सीटों पर उम्मीदवार उतार सकेगी.



कुछ जानकारों का मानना है कि ये मायावती का यह राजनीतिक दांव भी है, ताकि महागठबंधन बनने पर ज्यादा से ज्यादा सीटों पर दावेदारी की जा सके. बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी 80 में से 34 सीटों पर नंबर दो पर रही थी और मायावती इन में से कम सीटों पर ही अपनी दावेदारी छोड़ने के लिए तैयार होगी. मिल रही जानकारी के मुताबिक राज्य सभा चुनाव में हार से भी मायावती खुश नहीं थी. हालांकि मायावती के कैंडिडेट भीमराव अंबेडकर को अखिलेश यादव ने विधान परिषद भेजकर नुकसान की भरपाई करने की कोशिश ज़रूर की थी.


कर्नाटक में अलग और कैराना पर भी सस्पेंस!
यूपी में सपा-बसपा भले ही बीजेपी से निपटने के लिए साथ आने के संकेत दे रहे हैं लेकिन कर्नाटक में दोनों फिलहाल विरोधी खेमे में हैं. सपा भी कर्नाटक में 20 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है जबकि बसपा जेडी-एस के साथ मिलकर 22 सीटों से मैदान में है. अखिलेश और मायावती दोनों ही कर्नाटक में चुनावी रैलियां कर रहे हैं, हालांकि बीजेपी ने इस ‘चुनावी पर्यटन’ बताकर खारिज कर दिया है.


कर्नाटक की बात छोड़ दें तो 2019 लोकसभा चुनावों से पहले यूपी की कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव भी है. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में ‘मोदी लहर’ और राजनीतिक रूप से खासा दबदबा रखने वाले मुनव्‍वर हसन के परिवार में वोटों के बंटवारे के बीच बीजेपी के हुकुम सिंह ने कैराना लोकसभा सीट जीती थी. अब उनके निधन के बाद यह सीट खाली हुई है. सपा के राष्‍ट्रीय सचिव राजेन्‍द्र चौधरी का कहना है कि पार्टी ने अभी कैराना लोकसभा सीट के लिये बसपा के समर्थन के बारे में कोई फैसला नहीं किया है. अखिलेश यादव एक तरफ समर्थन के लिए बसपा को धन्यवाद तो दे रहे हैं लेकिन मायावती ने इस पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं.



बता दें कि बसपा कभी कोई उपचुनाव नहीं लड़ती लेकिन जिस तरह बदले माहौल में मायावती ने अपनी धुर विरोधी रही सपा से हाथ मिलाया है, चुनावी रणनीति भी बदली है ऐसे में वो अपनी ताकत दिखने के लिए उपचुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाए तो इसमें भी कोई ताज्जुब नहीं होगा. गौरतलब है कि कैराना लोकसभा सीट पिछले कई साल से अलग-अलग राजनीतिक दलों के खाते में जाती रही है. 1996 में सपा, 1998 में बीजेपी, 1999 और 2004 में राष्ट्रीय लोकदल, 2009 में बसपा और 2014 में बीजेपी का इस पर कब्‍जा रहा है.


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