Thursday, 1 February 2018

VIDEO: बिजली के खंभे में शॉट सर्किट से लगी आग


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गोंडा के पटेलनगर मोहल्ले में शार्ट सर्किट से लगी इतनी तेजी से बढ़ने लगी कि  अचानक हर तरफ अफरा तफरी मच गयी. बिजली के खम्भे से हुई इस शार्ट सर्किट से एक घर में लाग फैल गई और देखते ही देखते पूरा घर धूं-धूं कर के जलने लगा.इस आग को बुझाने के लिए स्थानीय लोगों ने काफी मशक्कत की और बाद में पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम किसी तरह आग पर काबू पाया. दअरसल खम्भे से उठी चिंगारी से अचानक लगी आग को जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक आग काफी भड़क चुकी थी और लोग बुझाने के लिए जुटे रहे. आग की लपटें इतनी तेज थी की लोग करीब नहीं पहुंच पा रहे थे.


सूचना के बाद भी दमकल की टीम डेढ़ घण्टे तक मौके पर नही पहुंची जिसके चलते आसपास के घरों में भी आग के फैलने का डर बना रहा. फिलहाल फायर ब्रिगेड और स्थानीय लोगों की मदद से आग पर काबू पा लिआ गया. अभी तक आग लगने से कितना नुकसान हुआ है इसका आंकलन नहीं हो पाया है.


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बजट 2018: रक्षा बजट में मामूली बढ़ोतरी, आवंटित हुए 2.95 लाख करोड़ रुपये


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सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में रक्षा बजट के लिए 2.95 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. ये पिछले साल के 2.74 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 7.81 फीसदी ज्यादा है. संसद में गुरुवार को पेश आम बजट में कुल रक्षा बजट के तहत सेना के तीनों अंगों के लिए नए हथियारों, विमानों, जंगी जहाजों और अन्य सैन्य साजो-सामान की खरीद के लिए 99,947 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई है.रक्षा बजट 2018-19 के लिए निर्धारित कुल 24,42,213 करोड़ रुपये के आवंटन का 12.10 प्रतिशत है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में देश की सीमाओं पर चुनौतियों से निपटने और जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोत्तर दोनों क्षेत्रों में आंतरिक सुरक्षा माहौल को प्रबंधित करने में सशस्त्र बलों की भूमिका की सराहना की.


उन्होंने कहा कि सरकार दो रक्षा औद्योगिक उत्पादन कॉरिडोर विकसित करेगी और घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उद्योग अनुकूल सैन्य उत्पादन नीति लेकर आएगी. जेटली ने कहा कि 2017-18 में रक्षा बजट के लिए 2.79 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान की तुलना में आवंटन में वृद्धि 5.91 प्रतिशत और 2.74 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान की तुलना में वृद्धि 7.81 प्रतिशत है.


रक्षा मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 के लिए आवंटित 2,95,511 करोड़ रुपये में से 99,947 करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए हैं जो सेना के तीनों अंगों के आधुनिकीकरण पर खर्च किए जाएंगे. रक्षा क्षेत्र के राजस्व व्यय के लिए 1,95,947 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं जिसमें वेतन, प्रतिष्ठानों के रखरखाव और अन्य संबंधित व्यय शामिल हैं.रक्षाकर्मियों के पेंशन के लिए इन आवंटनों से इतर 1,08,853 करोड़ रुपये की एक पृथक राशि का प्रावधान किया गया है. रक्षा पेंशन के लिए राशि में पिछले साल के 85,740 करोड़ रुपये के आवंटन की तुलना में 26.60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. जेटली ने अपने संबोधन में कहा कि पिछले साढ़े तीन वर्ष में रक्षाबलों की अभियानगत क्षमता को आधुनिक बनाने और मजबूत करने पर काफी जोर दिया गया है.


वित्त मंत्री ने कहा, ‘सरकार देश में दो रक्षा औद्योगिक उत्पादन गलियारा के विकास के लिए कदम उठाएगी.’ जेटली ने कहा कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के जरिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उद्योग अनुकूल ‘रक्षा उत्पादन नीति 2018’ भी लेकर आएगी.


उन्होंने कहा कि देश को रक्षा जरूरतों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के वास्ते भारत की मूल रक्षा उत्पादन क्षमता के विकास के लिए कई पहल शुरू की गई हैं. मंत्री ने कहा कि रक्षा उत्पादन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को उदार बनाने के साथ-साथ निजी निवेश के द्वार खोल दिए गए हैं.
(संदीप बोल के इनपुट्स के साथ)


वो देश जिनका डिफेंस बजट होता है सबसे ज्यादा


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दुनिया के दस सबसे अजीबोगरीब टैक्स


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1535 में, इंग्लैंड के राजा हेनरी आठ, जो खुद दाढ़ी रखता था, ने दाढ़ी पर कर लगा दिया. इस टैक्स की दरें दाढ़ी रखने वाले की सामाजिक स्थिति पर तय होती थीं. इसे फिर हटा भी लिया गया. बाद में उनकी बेटी, इंग्लैंड की एलिजाबेथ प्रथम, दाढ़ी कर को फिर से शुरू किया, जिसे दो-हफ्तों से अधिक की हर दाढ़ी पर लगाया गया.


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आम बजट 2018: मोदी सरकार का बड़ा तोहफा, अब आसान और तेज होगी यात्रा..!


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वित्त मंत्री अरुण जेटली आज संसद में 2018-19 के लिए आम बजट पेश कर रहे हैं. सरकार एक के बाद एक घोषणाएं कर इस बजट को आम जनता से जाेड़ने का प्रयास किया है. आम आदमी के लिए जहां हेल्थ इंश्योरेंस की सुविधा दी गई, वहीं किसानों को भी राहत पहुंचाने का प्रयास किया गया है. लेकिन इस बीच वित्त मंत्री ने आम आदमी की यात्रा को सहज, सुलभ और तेज गति भी प्रदान करने की कोशिश की है.आइए जानते हैं कैसे यात्रा को सरल बनाने की कोशिश की है वित्त मंत्री ने.


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पश्चिम बंगाल के नतीजे ममता के साथ BJP के लिए भी हैं 'गुड न्यूज'


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पश्चिम बंगाल में उलूबेरिया लोकसभा और नवापाड़ा विधानसभा सीट पर उपचुनाव के प्रदर्शन को लेकर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस में खुशी की लहर है. हालांकि ये नतीजें टीएमसी के साथ-साथ बीजेपी के लिए खुशखबरी की तरह है, जहां उसने सीपीएम को पीछे धकेल नंबर दो का स्थान हासिल किया.बंगाल में 34 साल तक वांमपंथी पार्टियों का राज रहा है. साल 2011 में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने लंबे समय बाद सीपीएम को सत्ता से बेदखल किया था और उसके बाद पिछले 7 साल से वहां ममता बनर्जी की सरकार है. हालांकि अब ऐसा लग रहा है कि बीजेपी धीमी रफ्तार से ही सही, लेकिन राज्य में अपनी जमीन बनाती दिख रही है.


पश्चिम बंगाल से आए उपचुनाव के नतीजे इसी ओर इशारा करते हैं. नवापाड़ा सीट पर टीएमसी ने जहां भारी मतों से जीत हासिल की. हालांकि बीजेपी के उम्मीदवार संदीप बनर्जी का प्रदर्शन भी यहां अच्छा ही माना जाएगा. वह 38,711 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे है. वहीं उलूबेरिया लोकसभा सीट पर भी बीजेपी दूसरे नंबर पर रही है.


साल 2016 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें, तो बीजेपी को तब यहां 23000 वोट मिले थे. लेकिन इस बार नवापाड़ा में बीजेपी के खाते में वोटों का भारी इज़ाफा हुआ है.पश्चिम बंगाल में बीजेपी लगातार आगे बढ़ रही है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के वोट शेयर में 2011 के मुकाबले 11 फीसदी का इज़ाफा हुआ था. ये बंगाल में बीजेपी के लिए बड़ी कामयाबी है. वो भी उस पार्टी के लिए जिसका इस प्रदेश में जनाधार लगभग ना के बराबर रहा है.


साल 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 10 फीसदी वोट शेयर के बावजूद सिर्फ 3 सीट जीत सकी थी. ये पार्टी के लिए निराशा के पल थे, लेकिन एक बार फिर से पश्चिम बंगाल में तस्वीर बदल रही है. वामपथियों का जनाधार लगभग खत्म होता दिख रहा है, जबकि बीजेपी तेजी से मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरती दिख रही है.


पिछले साल अगस्त में नगर निगम के चुनाम में तृणमूल कांग्रेस की चारों ओर लहर थी, लेकिन तब भी ज्यादातर जगहों पर बीजेपी ही दूसरे नंबर पर रही थी. बंगाल में लगातार लेफ्ट और कांग्रेस को नुकसान हो रहा है और इसका फायदा तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी उठा रही है.


बीजेपी पश्चिम बंगाल में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है और उसे वहां कुछ बड़े चेहरों की तलाश है. पिछले साल नवंबर में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी रहे पूर्व रेलमंत्री मुकुल रॉय को पार्टी में शामिल किया. मुकुल रॉय को पार्टी में शामिल करने का बीजेपी को फिलहाल कितना फायदा हुआ है ये कहना मुश्किल है. लेकिन आने वाले दिनों में बंगाल के कुछ बड़े नेता बीजेपी के लिए तस्वीर जरूर बदल सकते हैं.


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Budget 2018 : हर स्टेशन पर होगा WiFi और प्लेटफॉर्म पर होंगे कैमरे, बजट के 7 फैसले जिनसे बदल जाएगी इंडियन रेलवे..!


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2- मुंबई में 90 किलोमीटर तक पटरी का विस्तार किया जाएगा. मुंबई में लोकल नेटवर्क का दायरा बढ़ाया जाएगा. पटरी, गेज बदलने जैसे काम पर खर्च किया जाएगा.


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राजस्थान उपचुनाव परिणाम 2018: ये थे वो मुद्दे, जिससे कांग्रेस ने पलटा अलवर का चुनाव


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अलवर लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. करण सिंह यादव बीजेपी उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराने में कामयाब हुए हैं. लेकिन कांग्रेस के लिए इस सीट को दोबारा से हथियाना इतना आसान नहीं था. एक ओर बीजेपी की लहर थी तो दूसरी ओर अपनी ही पार्टी में मचा घमासान भी था.लेकिन बड़ी ही चतुराई से कांग्रेस ने पहलू खान, आनन्दपाल एनकाउंटर और पदमावत के मुद्दे को उठाते हुए जातिगत आधार पर वोट को बांट दिया. राजनीति शास्त्र के जानकार और एएमयू, अलीगढ़ में प्रोफेसर आरिफ हमीद बताते हैं कि अलवर में पहले ही जातिगत आंकड़े कांग्रेस के समर्थन वाले हैं. ये लोकसभा क्षेत्र यादव बाहुल्य कहा जाता है.


यहां से सात बार यादव उम्मीदवार सांसद बन चुका है. ये ही वजह है कि कांग्रेस ने यादव उम्मीदवार को टिकट दी थी. ये बात भी ठीक है कि बीजेपी ने भी डॉ. जसवंत सिंह यादव को टिकट देकर अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन पहलू खान, पदमावत और आनन्द पाल एनकाउंटर मुद्दा बीजेपी के विरोध में गया. जिसके चलते बीजेपी को दूसरी जातियों का वोट नहीं मिला.


जबकि कांग्रेस को यादव के अलावा मेव, दलित और आन्नद पाल के चलते गुर्जर वोट भी बड़ी संख्या में मिला. इसके अलावा चुनावों से ठीक पहले 16 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बाड़मेर में पचपदरा में रिफाइनरी परियोजना के कार्य आरंभ करने की योजना भी बीजेपी को कोई फायदा नहीं दिला सकी.मौजूदा वक्त में बीजेपी का गढ़ है अलवर


  • अलवर लोकसभा सीट की आठ विधानसभा सीटों में से सात भाजपा के पास हैं.


  • वहीं एक राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ सीट अन्य पार्टी के पास है.




  • साल 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां से एक भी सीट नहीं मिली थी.




  • अलवर लोकसभा सीट परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रही है.




  • कांग्रेस ने यहां से 10 लोकसभा चुनाव जीते हैं वहीं भाजपा ने तीन चुनाव जीते हैं.




  • यादव उम्मीदवारों ने यहां से सात चुनाव जीते हैं जिससे इस सीट पर यादवों के प्रभुत्व का पता चलता है.



चांदनाथ के कारण भी हाथ से निकली सीट


अलवर सीट बीजेपे के हाथ से निकलने के पीछे एक और कारण भी है. और ये कारण है खुद उसके सांसद रहे महंत चांदनाथ. कहा जाता है कि अपनी बीमारी के चलते चांदनाथ काफी समय से इलाज के चलते क्षेत्र से बाहर ही रहते थे. वे अलवर को ज्यादा समय नहीं दे पाए.


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