READ MORE
अलवर लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. करण सिंह यादव बीजेपी उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराने में कामयाब हुए हैं. लेकिन कांग्रेस के लिए इस सीट को दोबारा से हथियाना इतना आसान नहीं था. एक ओर बीजेपी की लहर थी तो दूसरी ओर अपनी ही पार्टी में मचा घमासान भी था.लेकिन बड़ी ही चतुराई से कांग्रेस ने पहलू खान, आनन्दपाल एनकाउंटर और पदमावत के मुद्दे को उठाते हुए जातिगत आधार पर वोट को बांट दिया. राजनीति शास्त्र के जानकार और एएमयू, अलीगढ़ में प्रोफेसर आरिफ हमीद बताते हैं कि अलवर में पहले ही जातिगत आंकड़े कांग्रेस के समर्थन वाले हैं. ये लोकसभा क्षेत्र यादव बाहुल्य कहा जाता है.
यहां से सात बार यादव उम्मीदवार सांसद बन चुका है. ये ही वजह है कि कांग्रेस ने यादव उम्मीदवार को टिकट दी थी. ये बात भी ठीक है कि बीजेपी ने भी डॉ. जसवंत सिंह यादव को टिकट देकर अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन पहलू खान, पदमावत और आनन्द पाल एनकाउंटर मुद्दा बीजेपी के विरोध में गया. जिसके चलते बीजेपी को दूसरी जातियों का वोट नहीं मिला.
जबकि कांग्रेस को यादव के अलावा मेव, दलित और आन्नद पाल के चलते गुर्जर वोट भी बड़ी संख्या में मिला. इसके अलावा चुनावों से ठीक पहले 16 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बाड़मेर में पचपदरा में रिफाइनरी परियोजना के कार्य आरंभ करने की योजना भी बीजेपी को कोई फायदा नहीं दिला सकी.मौजूदा वक्त में बीजेपी का गढ़ है अलवर
- अलवर लोकसभा सीट की आठ विधानसभा सीटों में से सात भाजपा के पास हैं.
वहीं एक राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ सीट अन्य पार्टी के पास है.
साल 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां से एक भी सीट नहीं मिली थी.
अलवर लोकसभा सीट परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रही है.
कांग्रेस ने यहां से 10 लोकसभा चुनाव जीते हैं वहीं भाजपा ने तीन चुनाव जीते हैं.
यादव उम्मीदवारों ने यहां से सात चुनाव जीते हैं जिससे इस सीट पर यादवों के प्रभुत्व का पता चलता है.
चांदनाथ के कारण भी हाथ से निकली सीट
अलवर सीट बीजेपे के हाथ से निकलने के पीछे एक और कारण भी है. और ये कारण है खुद उसके सांसद रहे महंत चांदनाथ. कहा जाता है कि अपनी बीमारी के चलते चांदनाथ काफी समय से इलाज के चलते क्षेत्र से बाहर ही रहते थे. वे अलवर को ज्यादा समय नहीं दे पाए.
Article source: http://feedproxy.google.com/~r/Khabar-Cricket/~3/gWE4487a9U4/story01.htm
No comments:
Post a Comment