Sunday, 1 July 2018

मुम्बई: इतालवी महिला ने ‘टूर गाइड’ पर कैब में बलात्कार करने का आरोप लगाया


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इटली की 37 वर्षीय एक नागरिक ने टूर गाइड होने का दावा करने वाले एक व्यक्ति पर आरोप लगाया है कि उसने मुम्बई के जुहू क्षेत्र में 14 जून को कैब में उससे बलात्कार किया. पुलिस ने कहा कि पीड़िता ने शुक्रवार को दर्ज कराई गई अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि घटना वाले दिन वह मुम्बई में दर्शनीय स्थलों की यात्रा करने के लिए एक बस में बैठी थी.अधिकारी ने बताया, ‘वह आरोपी व्यक्ति से 14 जून को बस टूर के दौरान मिली. उसने खुद को एक टूर गाइड बताया और इस पर पीड़िता ने उसकी सेवाएं ली.’ पुलिस ने बताया कि शाम सात बजे बस टूर जुहू में समाप्त होने के बाद आरोपी ने पीड़िता को फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन का बंगला दिखाने की पेशकश की जो उसी क्षेत्र में है.


अधिकारी ने कहा, ‘आरोपी ने पीड़िता को कोलाबा स्थित उस होटल में छोड़ने का वादा किया जहां वह रूकी हुई थी. आरोपी ने एक कैब बुक की और शिकायतकर्ता ने हमें बताया है कि उसने पास से शराब खरीदने के लिए वाहन रूकवाया. पीड़िता ने हमें बताया कि आरोपी ने उसे शराब पीने के लिए बाध्य किया और उसे अनुचित तरीके से छुआ भी. उसने उसके बाद कार में उससे बलात्कार किया.’


पुलिस ने कहा कि पीड़िता ने इतालवी दूतावास से सम्पर्क किया जिसने उसे स्थानीय पुलिस में मामला दर्ज कराने के लिए कहा. शिकायत के आधार पर कोलाबा पुलिस थाने में एक जीरो एफआईआर दर्ज की गई और उसके बाद उसे जुहू पुलिस थाने भेज दिया गया जहां घटना कथित रूप से घटित हुई थी.जुहू पुलिस थाने के अधिकारी ने कहा, ‘बलात्कार का एक मामला दर्ज कर लिया गया है और पुलिस आरोपी की तलाश कर रही है. आगे की जांच जारी है.’ पीड़िता गत वर्ष दिसम्बर में भारत आई थी और वह 11 जून को मुम्बई पहुंची थी.


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चिदंबरम ने GST को बताया ‘RSS कर', कहा- लोगों पर बढ़ा टैक्‍स का बोझ


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पूर्व वित्त मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने जीएसटी प्रणाली की पहली वर्षगांठ पर इस कर प्रणाली को लेकर सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने इसे लोगों पर कर बोझ बढ़ाने वाला आरएसएस कर बताया और कहा कि जीएसटी लोगों के बीच बुरा शब्द बनकर रह गया है. चिदंबरम ने पार्टी कार्यालय में संवाददाताओं से बातचीत में कहा,‘यह वास्तविक जीएसटी नहीं है, यह कुछ अलग ही मामला है.’उन्होंने कहा, ‘जीएसटी का मतलब केवल एक कर दर होना है. अगर (इसमें) कई दरें है तो इसे आरएसएस कर कहिए. इसमें कोई दोराय नहीं है कि जीएसटी का अभी आर्थिक वृद्धि पर कोई सकारात्मक असर नहीं दिखाई दिया है. जीएसटी का डिजाइन, ढांचा, दर और जीएसटी का कार्यान्वयन इतना दोषपूर्ण है कि यह कारोबारी इकाइयों , व्यापारियों, निर्यातकों व आम लोगों के बीच बुरा शब्द बनकर रह गया है.’


उन्होंने कहा कि जीएसटी को लेकर अगर कोई एक वर्ग खुश है तो वह कर प्रशासन है जिसे इतने अधिक अधिकार मिल गए हैं कि आम कारोबारी व नागरिकों में डर है. चिदंबरम ने कहा, ‘यह आम धारणा बन गई है कि जीएसटी से आम नागरिक पर कर्ज बोझ बढ़ा है. इससे निश्चित रूप से कर बोझ कम नहीं हुआ है जैसा कि वादा किया गया था.’


उन्होंने कहा कि जीएसटी का प्रस्ताव मूल रूप से कांग्रेस लाई थी. संप्रग सरकार ने 2006 में पहली बार इसका प्रस्ताव किया. चार बार वित्त मंत्री रहे चिदंबरम ने कहा कि इस अप्रत्यक्ष कर ढांचे में आमूल चूल बदलाव के लिए विशेषज्ञों को समुचित अधिकार दिए जाने चाहिए.पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा सरकार ने जीएसटी के मामले में कई मौकों पर मुख्य आर्थिक सलाहकार की सलाह को दरकिनार किया. विशेषतौर से दरों के मामले में. जीएसटी को लेकर केन्द्र की भाजपा सरकार ने जो भी कदम उठाये वह पूरी तरह से दोषपूर्ण थे.


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2025 तक 5 हजार अरब डॉलर का आंकड़ा छू लेगी भारतीय अर्थव्यवस्थाः कोविंद


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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेज वृद्धि के लिए तैयार है और देश का का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2025 तक दोगुना होकर 5,000 अरब डॉलर के आंकड़े को छू लेने की संभावना है. उन्होंने भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान (आईसीएआई) के प्लेटिनम जयंती समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही.कोविंद ने कहा, ‘‘अगले दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था नयी उड़ान भरने को तैयार है और 2025 तक देश की जीडीपी का आकार दोगुना होकर पांच अरब डॉलर होने की उम्मीद है. ’’


कोविंद ने चार्टड अकाउंटेंटों को जनहित का प्रहरी बताया. उन्होंने कहा कि देश की कर प्रणाली और कर दाताओं को सूविधा देने में चार्टड अकाउंटेंटों की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने निष्पक्ष कर प्रणाली के अनुपालन पर जोर देते हुए कहा कि इसका आशय सरकार को राजस्व देने से कहीं अधिक है.


कॉरपोरेट मामलों के राज्यमंत्री पीपी चौधरी भी इस मौके पर मौजूद थे. उन्होंने कहा कि काले धन के खिलाफ सरकार की लड़ाई जारी रहेगी और इस क्रम में अब तक 2.25 लाख संदिग्ध मुखौटा कंपनियों की पहचान की गई है. दूरसंचार राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने भी इस अवसर पर अपनी बात रखी.


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बुराड़ी हत्‍याकांड में मारी गई प्रियंका आखिर क्‍यों हर किसी की जुबान पर है ?


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दिल्‍ली में दिल दहला देने वाले हत्‍याकांड में 11 लोगों की मौत हुई है. बुजुर्ग से लेकर बच्‍चे तक इस हत्‍याकांड में मौत के मुंह में समा गए. लेकिन एक नाम न केवल पड़ोसियों बल्कि रिश्‍तेदारो की जुबान से भी नीचे नहीं उतर रहा है. वह नाम है प्रियंका. भाटिया परिवार की पोती 32 साल की प्रियंका. जो इस भीषण हत्‍याकांड में मुंह पर पट्टी बांधे, फांसी पर लटकी मिली है.पड़ोसियों से लेकर रिश्‍तेदार तक सिर्फ एक ही बात कह रहे हैं कि बहुत बुरा हुआ. अभी तो प्रियंका के हाथों से सगाई की मेहंदी भी नहीं छूटी थी. पिछले महीने ही 17 जून को प्रियंका की सगाई हुई थी. वह बहुत खुश थी. दिसंबर में उसकी शादी होने वाली थी. पूरा परिवार प्रियंका की शादी को लेकर उत्‍साहित था. वो भी अभी से तैयारियों में लगी थी लेकिन विधाता ने ऐसा कर दिया.


बुराड़ी घटनास्‍थल पर पहुंचे प्रियंका के होने वाले पति और सास-ससुर भी अपने आंसू नहीं रोक पाए. प्रियंका के मंगेतर ने कहा कि सगाई हुई थी. प्रियंका बहुत अच्छी थी. पूरा परिवार बेहद संजीदा था. जीवन शुरू करने के सपने ही देख रहे थे कि सब खत्‍म हो गया. बुराड़ी तो पहुंच गए लेकिन घर के अंदर का हाल ऐसा था कि रूह कांप रही थी. हर तरफ लाशें ही थीं. कुछ समझ नहीं आ रहा कि ऐसा कैसे हुआ. सब उजड़ गया.



बुराड़ी हत्‍याकांड

वहीं प्रियंका के राखी भाई प्रवीण मित्‍तल बताते हैं कि बुजुर्ग महिला मिसेज भाटिया की बेटी प्रियंका के जन्‍म के दो साल बाद ही विधवा हो गई थीं. तब से उनकी बेटी राजस्‍थान छोड़कर यहीं उनके पास आकर रहने लगी. वे बच्‍चों को ट्यूशन पढ़ाने लगीं. जबकि प्रियंका ने यहीं पढ़ाई की और फिर एमबीए कर लिया. काफी होनहार प्रियंका नोएडा की एक कंपनी में जॉब भी करने लगी. प्रियंका प्रवीण मित्‍तल को बचपन से ही राखी बांधती थी और भाई मानते हुए हर बात शेयर भी करती थी. उसने खुद ही बताया था कि सब ठीक चल रहा है.


फिर उसके मामा ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर एक लड़का पसंद किया जो सबको पसंद आया. प्रियंका की शादी तय हो गई. प्रियंका भी काफी खुश थी. 17 जून को अशोक विहार में दोनों की सगाई हुई थी.पड़ोसी और रिश्‍तेदार भी आए थे. बहुत दिन के बाद घर में खुशी आई थी. सब अच्‍छा था. प्रवीण कहते हैं कि प्रियंका उनकी एनिवर्सरी पर एक दिन पहले नहीं आ पाई थी तो कल रात अपनी दोनों मामियों और बच्‍चों को लेकर उनके घर आई. प्रवीण और उनकी पत्‍नी के लिए गिफ्ट भी लाई. काफी अच्‍छे से बात की. फिर रात को साढ़े 8 बजे करीब अपने घर लौटी.



मामले की जांच में जुटी है पुलिस

प्रवीण बताते हैं कि कल रात ही प्रियंका और उसकी मामियों ने बताया भी था कि घर में सब ठीक चल रहा है. प्रियंका भी बहुत खुश दिख रही थी. उसने बताया कि दिसंबर में शादी होने वाली है. बस तारीख निकलवा रहे हैं. लेकिन क्‍या पता था कि एेसा हो जाएगा. सब खत्‍म हो गया.


वहीं पड़ोसी और प्रियंका के टीचर जितेंद्र बताते हैं कि कुछ दिन पहले ही उनसे भी प्रियंका मिली थी. बहुत खुश थी. पूरा परिवार ही बहुत सज्‍जन था. इस घटना ने पूरी तरह झकझोर के रख दिया है. घर में कोई आर्थिक समस्‍या भी नहीं थी. पिछले साल मई से ऊपर कमरे बनाए जा रहे थे. दोनों भाइयों का बिजनेस भी अच्‍छा था. सब ठीक थे. घर में सभी एक साथ बैठकर पूजा करते थे. उन्‍होंने भी आजतक कभी झगड़े के बारे में भी नहीं सुना. ये मौतें सचमुच रहस्‍य बन गई. अभी तक यकीन नहीं हो रहा, ऐसा कैसे हो सकता है.


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RTI के जवाब में सरकार ने कहा- नहीं पता, कितनी साफ हुई गंगा


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गंगा की सफाई को लेकर दाखिल की गई एक आरटीआई के जवाब में सरकार ने कहा कि उसे नहीं पता  गंगा की सफाई की क्या  हालत है. हाल ही में एक आरटीआई अर्जी के जवाब से खुलासा हुआ कि सरकार गंगा की सफाई पर अब तक 3,800 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. तब सवाल उठता है कि जमीनी स्तर पर सफाई कहां-कहां हुई? इतनी बड़ी रकम कहां-कहां और किन मदों में खर्च हुई?गंगा की सफाई को लेकर अभियान चला रहीं कार्यकर्ता जयंती ने सरकार से कहा कि गंगा की सफाई का बिगुल बजाए एक अरसा हो गया है, लेकिन सरकार ने सफाई के नाम पर कुछ घाट चमका दिए हैं, लेकिन सरकार के पास क्या गंगा के घटते जलस्तर पर कोई जवाब है? गंगा में जमी गाद को हटाने के लिए सरकार कर क्या रही है? इसे हटाए बिना जलमार्ग का विकास असंभव है, क्योंकि गंगा जब तक अविरल नहीं होगी, निर्मल भी नहीं होगी.


प्रधानमंत्री बनने से पहले गंगा की सफाई को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी ने कई दावे किए थे. गुजरात से उत्तर प्रदेश के वाराणसी आए नरेंद्र मोदी ने सांसद प्रत्याशी के रूप में गंगा को नमन करते हुए कहा था, “न मै यहां खुद आया हूं, न कोई मुझे लाया है, मुझे तो गंगा मां ने बुलाया है.”


मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा की सफाई के लिए ‘नमामि गंगे’ नाम से एक परियोजना लाई गई. इसकी जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री उमा भारती को सौंपी गई. लेकिन गंगा अब तक निर्मल नहीं हो सकी.अब, जब मौजूदा सरकार के पांच साल पूरे होने में बमुश्किल एक साल बचा है तो पीछे मुड़कर देखने की जरूरत है कि सरकार ने गंगा की सफाई को लेकर चार साल में आखिर किया क्या है? यह जानने के लिए जब एक आरटीआई अर्जी दायर की गई, तो जवाब में सरकार साफतौर पर कह रही है कि उसे पता ही नहीं, गंगा अब तक कितनी साफ हुई है.


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आरटीआई याचिकाकर्ता एवं पर्यावरणविद् विक्रम तोगड़े कहते हैं, “आरटीआई के तहत यह ब्योरा मांगा गया था कि अब तक गंगा की कितनी सफाई हुई है, लेकिन सरकार इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं करा पाई.”


वह कहते हैं, “सरकार क्या इतनी बात नहीं जानती कि गंगा में गंदे नालों के पानी को जाने से रोके बिना गंगा की सफाई नहीं हो सकती. नमामि गंगा के तहत सरकार ने गौमुख से गंगा सागर तक का जो हिस्सा कवर किया है, वहां के हालात जाकर देखिए, काई, गाद और कूड़े का ढेर देखने को मिलेगा. इसी तरह आप गढ़ गंगा यानी गढ़मुक्तेश्वर का हाल देख लीजिए. सफाई हुई कहां है और हो कहां रही है?”


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पर्यावरणविद् कहते हैं कि गंगा को लेकर ‘पॉलिटिकल विल’ में इजाफा तो हुआ है, लेकिन इस काम को विकेंद्रीकृत किए जाने की ज़रूरत है. ‘एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रोच’ अपनाए जाने की ज़रूरत है.


वह कहते हैं, “गंगा में पानी की भी कमी है. इसकी सहायक नदियों का अतिक्रमण हुआ है. सफाई के नाम पर खर्च अधिक हुआ है लेकिन फायदा कहीं दिख नहीं रहा है. कचरे के निपटान की व्यवस्था करनी भी ज़रूरी है. इसके लिए ट्रेनिंग नेटवर्क तैयार करना होगा.”


पर्यावरणविद जयंती कहती हैं, “समस्या यह है कि अभी जो काम हो रहा है, उसका असर अगले तीन से चार साल में देखने को मिलेगा लेकिन तब तक और गंदगी एवं कूड़ा इकट्ठा हो जाएगा. सरकार को नेचुरल ट्रीटमेंट प्रोसेस को शुरू करने की ज़रूरत है लेकिन लगता है कि सरकार गंभीर ही नहीं है.”


वह कहती हैं, “सरकार ने 2020 तक 80 फीसदी गंगा साफ करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन अभी तक कितनी साफ हुई है, इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया है. 2019 में कितनी गंगा साफ करेंगे इसका हिसाब भी किसी और को नहीं, सरकार को ही देना है.”


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क्या ओवैसी इस देश की मौजूदा राजनीति के 'नए जिन्ना' हैं ?


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असदुद्दीन ओवैसी के बारे में एक बड़े तबके का मानना है कि वो देश की सियासत में मुसलमानों की हिस्सेदारी की आवाज़ हैं. लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि ओवैसी की राजनीति कट्टरपंथ पर टिकी है. उनकी राजनीति का केंद्र है सिर्फ़ एक मज़हब है और वो मज़हब है इस्लाम. हाल ही में एक रैली में ओवैसी ने जब सेक्युलरिज्म को ही छल करार देते हुए मुसलमानों की ज़मात से एकजुट होने की अपील की तो आरोप लगा कि देश में एक नया जिन्नाह खड़ा हो रहा है. सवाल है क्या वाकई ओवैसी की सियासत में जिन्ना की झलक है ?असदुद्दीन ओवैसी को नया जिन्नाह कहे जाने के पीछें हैं असदुद्दीन ओवैसी की तक़रीरें. पुराने हैदराबाद की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत ऑल इंडिया मुस्लिमीन. ओवैसी के बारे में कहा जाता है कि वो मुस्लिमों के जज़्बात उभारने में माहिर हैं. देश की मुस्लिम सियासत का विकल्प सेक्यूलरिज्म की धुरी पर घूमता रहा है. ऐसे वक्त ओवैसी मुस्लिमों के लिए अलग ही राजनीति की लकीर खींचते हैं. वो मुसलमान एकजुट होकर मुस्लिम उम्मीदवारों को ही वोट देने की अपील करते हैं. यही बात उन्हें नया जिन्ना होने का आरोप लगाती है.


एमआईएम पार्टी का इतिहास भी ओवैसी का पीछा नहीं छोड़ता


असदुद्दीन ओवैसी 80 साल पुरानी पार्टी की नुमाइंदगी करते हैं. नवाब महमूद नवाज ने 1927 में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लमीन की नींव रखी थी.आज़ादी से 3 महीने पहले यानी मई 1947 जब भारत की आज़ादी की तारीख़ तय हो चुकी थी. सरदार पटेल बड़ी-बड़ी रियासतों का विलय भारत में कराने में जुटे हुए थे.उस समय 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद.


7 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद के निज़ाम ने भारतीय सेना के आगे आत्म-समर्पण किया
MIM उस वक्त कासिम राज़वी की अगुआई में हैदराबाद निज़ाम की निजी सेना थी. MIM के पास उस वक़्त 2 लाख रजाकार थे. आज़ादी के लिए कट्टरपंथी क़ासिम राज़वी के नेतृत्व में रज़ाकार जन सभाएं कर रहे थे और ग़ैर-मुस्लिमों पर हमले कर रहे थे. सरदार पटेल चाहते थे कि भारत के बीचों बीच पड़ने वाली रियासत हैदराबाद का निज़ाम किसी भी कीमत पर पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहिए.


उस समय सरदार पटेल की प्राथमिकता थी हैदराबाद का भारत में विलय. 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने निज़ाम के महल पर हमला बोल दिया. निज़ाम के MIM वाले रजाकारो ने भारतीय सेना के साथ लड़ाई शुरू कर दी. ये संघर्ष 4 दिन तक चला. 17 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद के निज़ाम ने आत्म-समर्पण कर दिया. रज़ाकारों ने हार मानकर हथियार डाल दिए.


असदुद्दीन के दादा मौलाना अब्दुल वहीद ओवैसी को भी नफरत फैलाने के लिए 11 महीने तक जेल हुई


1948 में MIM पर सरकार ने पाबंदी लगा दी. 1957 में रज़ाकार कासिम राज़वी पाकिस्तान चला गया और MIM की कमान असदुद्दीन ओवैसी के दादा अब्दुल वहीद ओवैसी को सौंप गया. यही वो साल था जब नेहरू सरकार ने MIM पर लगी पाबंदी को हटाया था और इसी साल से असदुद्दीन ओवैसी के दादा ने नफ़रत की सियासत फिर छेड़ दी थी. असदुद्दीन के दादा मौलाना अब्दुल वहीद ओवैसी को भी नफरत फैलाने के लिए 11 महीने तक जेल में रखा गया था.


अब्दुल वहीद ओवैसी को 14 मार्च 1958 को गिरफ़्तार किया गया था. वहीद पर हैदराबाद पुलिस ने सांप्रदायिक सद्भावना को भंग करने, मज़हबी नफरत फैलाने देश के ख़िलाफ़ मुसलमानों को भड़काने के आरोप लगाए थे.


MIM ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की. तब असदुद्दीन ओवैसी के पिता सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए. फिर 2 साल बाद वह विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की ताकत लगातार बढती गई.


  जबसे असदुद्दीन ने पार्टी की कमान संभाली तबसे देशभर में उसको पहचान दिलाई
सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से लगातार 6 बार सांसद रहे. 1984 से हैदराबाद लोकसभा सीट पर MIM का कब्ज़ा बरकरार है. 1984 वही दौर था जब असदुद्दीन ओवैसी सेंट मैरी जूनियर कॉलेज में पढ़ रहे थे. राजनीति से ज्यादा वास्ता नहीं था. 1989-1994 में उन्होंने लंदन के लिंकन कॉलेज से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की, लेकिन 1994 से ही असदुद्दीन का नाता राजनीति से जुड़ गया.
1994 और 1999 में अदुद्दीन हैदराबाद की चारमीनार विधानसभा सीट से विधायक रहे. 2004, 2009 और 2015 में हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. असदुद्दीन 2008 से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष हैं.


ओवैसी खानदान की पार्टी AIMIM की पहचान उनके पिता के ज़माने तक हैदराबाद और आस-पास के इलाकों में ही थी लेकिन जबसे असदुद्दीन ने पार्टी की कमान संभाली तबसे देशभर में उसको पहचान दिलाई और उसकी वज़ह है उनका हमलावर अंदाज़ और कड़क तेवर.


उनके छोटे भाई के भड़काऊ बयान के बाद ये धारणा और बढ़ी


असदुद्दीन ओवैसी की राजनीतिक शैली और आक्रामक है. यही उन्हें दूसरे अल्पसंख्यक नेताओं से अलग खड़ा करती है. उनकी ताकत है मुद्दों पर पकड़, बातचीत का हमलावर लहज़ा. लेकिन उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी की राजनीति बिल्कुल रज़ाकारों के कट्टरपंथ पर चलती है. अकबरुद्दीन के एक बयान की वजह से देश भर में उनकी पहचान नफरत और बांटने वाली राजनीति की होने लगी. असदुद्दीन तर्कपूर्ण तरीके से मुसलमानों के हक की बात करके उन्हें लामबंद करते हैं, लेकिन अकबरुद्दीन की राजनीति एकदम कट्टर है फिर भी असदुद्दीन ने उन्हें कभी नहीं रोका. इसको तो असदुद्दीन की राजनीति की कुटिल चाल ही माना जाना चाहिए.


राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि असदुद्दीन बांटने वाली राजनीति तो करते हैं लेकिन चालाकी भरे अंदाज़ में. वो इसी देश में रहने, जीने मरने की कसमें भी खाते हैं और इसी देश में मुसलमानों को बाकी समाज से अलग सिर्फ मुसलमानों के लिए जीने की कसमें भी दिलाते हैं. इसीलिए असदुद्दीन को बाकी मुस्लिम नेताओं की कतार में नहीं खड़ा किया जाता. उनकी हर बात अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम युवाओं पर अलग प्रभाव छोड़ती है.


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