Saturday, 1 December 2018

सीएम योगी के बयान के बाद दलित समाज के लोगों ने हनुमानजी के मंदिर पर किया कब्जा!


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‘हनुमानजी दलित थे’… यूपी के सीएम योगी के इस बयान के बाद आगरा में हनुमानजी के एक प्राचीन मंदिर पर दलितों ने कब्जा कर लिया है. वहां हनुमान चालीसा पढ़ी गई. पूजा-पाठ हुआ. साथ ही चेतावनी दी गई कि अब जब ये साफ हो गया है कि हनुमानजी दलित थे तो उनके मंदिरों की जिम्मेदारी हमारी है.वहीं ऑल इंडिया अंबेडकर महासभा ने ये कहते हुए सीएम योगी को नोटिस भेजने की बात कही है कि हनुमानजी वानर थे और दलितों की तुलना हनुमानजी से की जा रही है. ये दलितों का अपमान है.


आगरा के लंगड़ी की चौकी इलाके में हनुमानजी का एक पुराना और बड़ा मंदिर है. दो दिन पहले धोबी समाज के अमित सिंह, अखिल भारतीय कोली समाज के नंदलाल भारती, वाल्मीकि समाज के अजय वाल्मीकि सहित दर्जनों लोग मंदिर में पहुंच गए. वहां उन्होंनो हनुमान चालीसा पढ़ने के साथ पूजा-पाठ की गई.


न्यूज18 से बातचीत में अमित सिंह ने बताया, ‘अब हनुमानजी के मंदिरों की देखरेख और उन्हें संभालने का जिम्मा दलितों का है. इसके लिए हम सीएम योगी के आभारी हैं कि उन्होंने हमे बताया कि हनुमानजी हमारे समाज से हैं.’वहीं नंदलाल भारती का कहना, “हमे ये जानकर बड़ी खुशी हुई है कि हनुमानजी हमारे समाज के हैं. अब हम जल्द ही सभी हनुमान मंदिरों का कब्जा लेंगे. हनुमानजी के हर मंदिर को अब हम ही संभालेंगे. मंदिरों पर आने वाले दान और चढ़ावें को भी दलितों के उत्थान के लिए खर्च किया जाएगा.”


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ऑल इंडिया अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती ने न्यूज18 हिन्दी से कहा, “ जल्द ही महासभा यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को एक नोटिस भेजने जा रही है. सीएम योगी ने हनुमानजी को दलित बताकर दलितों का अपमान किया है. हनुमानजी वानर जाति से थे और दलित इंसान हैं. इसलिए दलितों की तुलना हनुमानजी से करके उन्होंने दलितों का अपमान किया है. इसके लिए हम कानून का सहारा लेंगे.”ये भी पढ़ें- आजम खां ने कसा तंज, कहा- सीएम योगी बताएं, हनुमान जी दलितों में कौन से दलित हैं


गौरतलब है कि राजस्थान में चुनावी जनसभा के दौरान सीएम योगी ने कहा था कि हनुमानजी दलित जाति के थे.

जॉर्ज बुश सीनियर: इनकी सरकार ने व्हाइट हाउस में एक सब्जी पर बैन लग गया था


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भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज हर्बर्ट वॉकर बुश का 94 वर्ष की आयु में शुक्रवार को निधन हो गया. किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से अधिक उम्र तक जीने वाले इस राष्ट्रपति का तमाम जीवन और राजनैतिक कार्यकाल दिलचस्प घटनाओं से भरा रहा. इसमें उनके बचपन से लेकर उनकी वैवाहिक जिंदगी भी शामिल है, जो पूरे 73 सालों तक चली. ये अपने-आप में एक रिकॉर्ड है जो अब तक कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं तोड़ सका है.बुश सीनियर का जन्म 12 जून 1924 को अमेरिका के मिल्टन में हुआ. जन्म के कुछ वक्त बाद ही परिवार ग्रीनविच आ गया, जहां उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा हुई. तब अपने प्यारे चेहरे और दिलचस्प बातों की वजह से आसपास के लोग और साथी उन्हें पॉपी पुकारा करते थे. पॉपी अपने चेहरे और बातों की वजह से ही लोकप्रिय नहीं था, बल्कि तभी से वे स्कूली गतिविधियों में आगे रहने लगे. तब कोई नहीं जानता था कि स्कूल का प्रेसिडेंट एक रोज अमेरिका के प्रेसिडेंट की तरह भी काम करेगा.


जब थप्पड़ के बदले शास्त्री जी ने चपरासी को लगा लिया था गले!


दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दिसंबर 1941 में पर्ल हार्बर अटैक ने उन्हें इतना व्यथित किया कि उन्होंने पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी और अपने 18वें जन्मदिन पर ही यूएस नेवी में शामिल हो गए. यहीं से वे एक के बाद एक खुद को साबित करते गए. वे उस दौर के सबसे कम उम्र के विमान-चालक थे. अगले चार सालों तक यूएस नेवी में काम करने के बाद बुश सीनियर को अपनी छोड़ी हुई पढ़ाई की सुध लौटी और वे येल यूनिवर्सिटी में आर्ट्स में ग्रेजुएशन करने लगे.एक रुपए के नोट क्यों जारी नहीं करता रिजर्व बैंक, जानिए, सबसे छोटे नोट की बड़ी कहानी


नेवी में अपने कार्यकाल के दौरान ही बुश की मुलाकात बारबरा पीयर्स से हुई. मुकालात इश्क में बदली और इनकी शादी किसी भी अमेरिकी राजनैतिक की शादी से लंबी चली. दोनों 73 सालों तक साथ रहे, 6 बच्चों के माता-पिता बने और साथ-साथ कितने ही उतार-चढ़ाव देखे. अप्रैल 2018 में बारबरा की मौत ही इस जोड़े को अलग कर सकी. पत्नी की मौत के बाद बुश सीनियर के हवाले से जारी बयान में कहा गया- हमें यकीन है कि वो जन्नत में है. जिंदगी किसी के न होने पर रुकती नहीं इसलिए परेशानियों को अपनी सूची से निकालकर आज को जिएं…!


वोटर आईडी पर गलत नाम-तस्वीर आ जाए या पता बदल जाए तो ऐसे कराएं सहीबुश सीनियर के मजबूत इरादों की झलक इसी से मिल जाती है कि ग्रेजुएशन खत्म करने के बाद इन्होंने बतौर सेल्समैन शुरुआत की थी और फिर अपने 40वें साल में उनका नाम अमेरिका के जाने-माने कारोबारियों में शामिल हो चुका था. साल 1963 में उनके राजनैतिक करियर की शुरुआत हुई, जब वे टैक्सास से रिपब्लिकन पार्टी के चेयरमैन चुने गए. उपलब्धियों से उनका याराना राजनीति में भी नहीं छूटा, बल्कि मजबूत ही हुआ. वे 1989 में यूएस के 41वें राष्ट्रपति चुने गए. इससे पहले 1981 से 1989 के दौरान वे रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में बतौर उप-राष्ट्रपति सेवाएं दे चुके थे.


अपने पूरे राजनैतिक करियर के दौरान बुश सीनियर ने कई अहम फैसले लिए. कार्यकाल के दौरान बुश ने कुवैत पर इराक के कब्जे को लेकर ऑपरेशन डेजर्ट शील्ड का आदेश दिया, इसके साथ ही उन्होंने इराक की मनमानियों के खिलाफ वैश्विक सहयोग जुटा लिया. अपने इस ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए बुश सीनियर ने वहां पर यूएस के बड़े दल-बल को भेज दिया. गेराल्ड फोर्ड के कार्यकाल के दौरान उन्होंने अनौपचारिक तौर पर चीन में राजदूत के तौर पर काम किया और माना जाता है कि इस दौरान अमेरिका और चीन के रिश्ते काफी मजबूत हुए. राष्ट्रपति रहते हुए कई फैसले लिए, जिनमें दिव्यांगों के लिए एक्ट और तकनीकी विकास के कई फैसले काफी अहम रहे.


चीन का ऐसा सेटेलाइट, जो पूरी दुनिया को फ्री में देने जा रहा है WiFi


निजी जिंदगी में भी बुश सीनियर के कई अलग-अलग पहलू दिखाई देते रहे. जुलाई 2013 में उन्होंने सीक्रेट सर्विस के एक एजेंट के बेटे को कैंसर होने पर उन्होंने फंडिंग को बढ़ावा देने के लिए और परिवार से स्नेह जताने के लिए अपना सिर मुंडा लिया. कैटरीना तूफान के अमेरिका में तबाही मचाने पर बिल क्लिंटन के साथ मिलकर इस वयोवृद्ध पूर्व राष्ट्रपति ने एक फंड की शुरुआत की और इसके लिए बाकायदा कैंपेन भी चलाया.


जीवन का 75वां साल, जिसे आमतौर पर हमारे यहां सपनों का अंत मान लिया जाता है, उसी साल बुश सीनियर ने अपना जन्मदिन अलग अंदाज में मनाया. उन्होंने साथियों के साथ मिलकर स्काईडाइविंग की. पांच सालों बाद दोबारा यही किया और फिर 85वें जन्मदिन पर एक बार फिर यही. अपने 90वें जन्मदिन पर चौथी बार बुश सीनियर ने स्काईडाइविंग की.


जब 2.0 लिखा जाता है तो उसका क्या मतलब होता है?


बुश को ब्रोकली सख्त नापसंद थी. राष्ट्रपति बतौर अपने कार्यकाल में उन्होंने व्हाइट हाउस में ब्रोकली पर एक तरह से बैन ही लगा दिया था. इसी बात पर उन्होंने कहा- मुझे ब्रोकली एकदम पसंद नहीं. बचपन में मेरी मां मुझे जबर्दस्ती ब्रोकली खिलाया करती थी. अब मैं अमेरिका का राष्ट्रपति हूं और मैं ब्रोकली कतई नहीं खाऊंगा! अपने मजबूत इरादों और निहायत दिलचस्प जुमलों से लेकर कई अहम राजनैतिक और सामाजिक फैसलों के लिए बुश सीनियर का नाम अमेरिकी किवदंतियों में शामिल हो चुका है.

नोटबंदी में रद्दी हो गए सबसे बड़ी ट्रेन डकैती के करोड़ों रुपये, अब खुला राज


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2 साल पहले तमिलनाडु में एक बड़ी ट्रेन डकैती हुई थी. चलती ट्रेन से आरबीआई के करोड़ों रुपये पार कर दिए गए थे. जीआरपी और सिविल पुलिस डकैती का राज खोलने में नाकाम रही थी. 2 साल बाद सीबीसीआईडी ने केस को खोला है. लेकिन 2 महीने बाद ही डकैती के रुपये रद्दी हो गए. नवंबर में नोटबंदी लागू हो गई. पकड़े गए बदमाशों ने इसका खुलासा किया है.8 अगस्त, 2016 को सेलम-चेन्नई एक्सप्रेस में डकैती पड़ी थी. ट्रेन की पॉर्सल वैन में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के 345 करोड़ रुपये जा रहे थे. नोटों की सुरक्षा के लिए ट्रेन में हथिय़ारों से लैस 18 गॉर्ड भी थे. लेकिन रात के किसी वक्त पॉर्सल वैन से 5 करोड़ से अधिक के 500 और 1000 रुपये के नोट गायब हो गए.


जांच में सामने आया कि बोगी की छत काटकर डकैती डाली गई है. शुरुआती जांच रेलवे पुलिस जीआरपी ने की. उसके बाद चेन्नई की सिविल पुलिस ने जांच की, लेकिन उसके हाथ भी कुछ नहीं लगा. इसके बाद जांच की जिम्मेदारी सीबीसीआईडी को दी गई. कई महीने की मशक्कत के बाद सीआईडी देश की सबसे बड़ी ट्रेन डकैती का राज खोलने में कामयाब हुई है.


8 दिन तक ट्रेन में सफर करके की रेकी13 नवबंद को सीआईडी ने इस संबंध में प्रेस कांफ्रेंस की थी. इससे पहले सीआईडी के अधिकारियों ने घटनास्थल जाकर आरोपियों के साथ क्राइम सीन को दोहराया. अधिकारियों ने बताया कि गुना, मध्य प्रदेश के रहने वाले मोहर सिंह और उसके चार दूसरे साथी नवबंर में तमिलनाडु आए थे.


इसी दौरान उन्हें जानकारी मिली कि सेलम-चेन्नई एक्सप्रेस में बैंक का कारोड़ों रुपया आने वाला है. आरोपी मोहर सिंह के अनुसार सभी लोगों ने 8 दिन तक सेलम-चेन्नई एक्सप्रेस में सफर किया. ये जानकारी जुटाई कि चिन्नासालेम और विरुधचलम रेलवे स्टेशनों के बीच डकैती की घटना को अंजाम दिया जा सकता है. क्योंकि इन दोनों स्टेशन के बीच ट्रेन करीब 45 मिनट से अधिक समय तक चलती है और रात भी होने लगती है तो अंधेरा हो जाता है.


चलती ट्रेन में ऐसे डाली डकैतीघटना वाले दिन सभी आरोपी ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा कर रहे थे. इस लाइन पर डीजल इंजन चलते हैं. मौका लगते ही बैटरी वाले कटर से बोगी की छत काट दी. एक आरोपी बोगी में अंदर चला गया. लकड़ी के बॉक्स काटकर नोटों के बंडल निकाल लिए.


अपने अंडर गॉरमेंट में बंडल लपेटकर छत पर बैठे साथियों को दे दिए. आगे चलकर रेलवे लाइन के किनारे उनके साथी इंतजार कर रहे थे. उन्हें बंडल फेंककर दे दिए गए. ट्रेन में चढ़े साथी कूद कर फरार हो गए. सीआईडी ने बताया कि मोहर सिंह ने डकैती को अंजाम देने के लिए अपने 7 साथियों को बुला लिया था.


डकैती का पता एक स्टेशन पर चला. वहां ट्रेन रुकी तो सुरक्षा गॉर्ड बोगी चेक करने आए. रात के वक्त भी छत के रास्ते उन्हें रोशनी दिखी तो शक हुआ. जांच की गई तो छत कटी हुई मिली. इसके बाद पुलिस जांच में जुट गई. लेकिन कई महीनों की मशक्कत के बाद भी डकैती से जुड़ा कोई सुराग नहीं मिला.


सीआईडी ने मोबाइल से ऐसे खोला राज


चर्चा तो ये भी है कि इस केस को खोलने के लिए स्पेस एजेंसी नासा की मदद ली गई है. उसी से सीआईडी को ये पता लगा कि डकैती किस एरिया में डाली गई. हालांकि सीआईडी के अधिकारी नासा से मदद लेने वाली बात को सिरे से खारिज कर रहे हैं.


लेकिन जानकार बताते हैं कि सीआईडी ने पूरा केस मोबाइल की मदद से खोला है. सीआईडी को जब ये पता चल गया कि किस एरिया में घटना को अंजाम दिया गया है तो उस एरिया में लगे सभी मोबाइल टॉवर से उस वक्त की कॉल डिटेल निकलवाई गई जिस वक्त डकैती पड़ी थी.


हजारों नम्बरों के बीच में से सीआईडी ने कुछ ऐसे नम्बर निकाले जिन पर शक हो रहा था. उसमे से जब कुछ नम्बर की आईडी निकलवाई गई तो उन सभी नम्बर की आईडी मध्य प्रदेश की थी. बस यहीं से सीआईडी को शक हो गया. मध्य प्रदेश में दबिश देकर एक-एक कर पांच लोगों को हिरासत में ले लिया गया.


डकैती के 2 महीने बाद रद्दी हो गए नोट


गिरोह के सरगना मोहर सिंह ने बताया कि इतनी बड़ी रकम को खर्च करना आसान नहीं था. हम रकम को रखकर बैठे हुए थे. अभी हम कुछ ही रकम खर्च कर पाए थे कि 8 नवबंर को नोटबंदी हो गई. एक हजार और 500 के सभी नोट रद्दी हो गए.

SC पर 4 जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस का कोई पछतावा नहीं, हो रहा है बदलाव: जस्टिस जोसेफ


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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कुरियन जोसेफ हाल ही में रिटायर हुए हैं. शुक्रवार को उन्होंने शीर्ष अदालत में कामकाज को लेकर की गई चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बेबाकी से अपनी राय रखी. कुरियन ने कहा कि 12 जनवरी के विवादित प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर कोई पछतावा नहीं है, जिसमें उन्होंने और तीन अन्य जजों ने शीर्ष अदालत के कामकाज को लेकर कई मुद्दे उठाए थे. हालांकि, कुरियन जोसेफ ने कहा कि अब चीजें बदल रही हैं. जस्टिस जोसेफ ने कहा कि शीर्ष अदालत की व्यवस्थाओं और परंपराओं में बदलाव आने में समय लगेगा, क्योंकि वे लंबे वक्त से मौजूद हैं.सुप्रीम कोर्ट ने पुस्तक ‘गॉडमैन टू टाइकून’ मामले में बाबा रामदेव को भेजा नोटिस


बता दें कि 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के चार जजों जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एमबी लोकूर, जस्टिस जे. चेलामेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. उन्होंने तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा पर सवाल उठाए थे. चारों जजों ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है और लोकतंत्र खतरे में है. चार जजों के इस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस ने देश को हैरानी में डाल दिया था. इस पर काफी विवाद भी हुआ.


लेकिन, बीते दिन एक कार्यक्रम में जस्टिस कुरियन ने कहा, ‘मुझे कोई पछतावा नहीं है. मैंने बहुत सोच समझकर ऐसा किया, क्योंकि कोई और रास्ता नहीं बचा था. मैं नहीं कह सकता कि संकट खत्म हो गया है. यह एक सांस्थानिक संकट था और सिस्मट को बदलने में समय लगता है. हालांकि, यह बदल रहा है और यह आगे भी जारी रहेगा.’जस्टिस कुरियन ने कहा कि जहां तक शीर्ष अदालत की बात है, तो उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्तियों और स्थानान्तरण से जुड़े ‘मैमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ (एमओपी) अंतिम रूप में है. ये कॉलेजियम मसौदे के अनुसार काम कर रहा है.




यह पूछे जाने पर कि क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, जस्टिस कुरियन ने कहा,‘मैं इस आम राय से सहमत नहीं हूं कि समाज में भ्रष्टाचार है, लेकिन मैं इस बात को मानता हूं कि लोगों में कुछ निचले स्तरों पर भ्रष्टाचार को लेकर कुछ नजरिया है.’


सुप्रीम कोर्ट में पूर्व जज ने कहा कि अगर पूर्व जजों को रिटायरमेंट के बाद सरकार कोई पद ‘उपकार स्वरूप’ यानी चैरिटी में देती है, तो उन्हें इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए. जस्टिस कुरियन ने कहा, ‘पूर्व जजों को रिटायरमेंट के बाद सिर्फ उस स्थिति में पद संभालना चाहिए, जब सरकार द्वारा उनसे न्यायाधिकरण की जिम्मेदारी संभालने के लिए ‘‘सम्मानपूर्वक आग्रह’’ किया जाए. (एजेंसी इनपुट के साथ)

अरुणाचल के राज्यपाल ने पेश की इंसानियत की मिसाल, गर्भपति महिला को अपने हेलिकॉप्टर से पहुंचाया अस्पताल


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अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बी. डी. मिश्रा एक गर्भवती महिला को अपने हेलिकॉप्टर से तवांग से ईटानगर लेकर आए ताकि उसे वक्त पर डॉक्टरी सहायता उपलब्ध हो सके. राजभवन के सूत्रों ने बताया कि तवांग में बुधवार को आधिकारिक कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने मुख्यमंत्री पेमा खांडू और स्थानीय विधायक के बीच बातचीत सुनी.विधायक खांडू को बता रहे थे कि एक गर्भवती महिला की हालत नाजुक है, लेकिन तवांग और गुवाहाटी के बीच अगले तीन दिनों तक कोई हेलिकॉप्टर सेवा नहीं है. इतना सुनते ही राज्यपाल मिश्रा ने कहा कि वह अपने हेलिकॉप्टर से महिला और उसके पति को साथ ले जाएंगे.


ये भी पढ़ें- आर्मी-पुलिसकर्मियों के बीच झड़प में सुलह कराने अरुणाचल पहुंचीं निर्मला और रिजिजू


उस दंपति के लिए हेलिकॉप्टर में जगह बनाने की खातिर राज्यपाल ने अपने दो अधिकारियों को तवांग में ही छोड़ने का फैसला लिया. मामला यहीं खत्म नहीं हुआ, मिश्रा का हेलिकॉप्टर असम के तेजपुर में ईंधन भरने के लिए उतरा. वहां पायलट ने देखा कि हेलिकॉप्टर में कुछ खराबी आ गई है और अब वह उड़ान नहीं भर सकता है.ये भी पढ़ें- गर्भवती महिलाएं जीका वायरस से रहें सावधान! ऐसे करें बचाव


महिला की हालत से परेशान राज्यपाल ने तेजपुर स्थित वायुसेना बेस के कमांडिंग अफसर से दूसरा हेलिकॉप्टर मांगा और महिला तथा उसके पति को रवाना किया. वह खुद बाद में दूसरे हेलिकॉप्टर से गए.


इतना ही नहीं मिश्रा ने यह भी पक्का किया कि ईटानगर में राजभवन के हेलीपैड पर एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के साथ एम्बुलेंस मौजूद रहे ताकि महिला को कोई तकलीफ ना हो.राज्यपाल ने बाद में महिला और बिल्कुल स्वस्थ पैदा हुए बच्चे को शुभकामनाएं और शुभाशीष दिए.

Friday, 30 November 2018

जॉब की है तलाश तो 19 दिसंबर को यहां दीजिए इंटरव्यू


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डिफेंस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) ने लेजर साइंस एंड टेक्नॉलजी सेंटर में जूनियर रिसर्च फेलो की भर्तियों के लिए आवेदन मंगाए हैं. 12 पदों पर ये भर्तियां लेजर, फोटोनिक्स और ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों के लिए हैं. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 19 और 20 दिसंबर को सुबह 9:30 पर डीआरडीओ के ऑफिस में इंटरव्यू के लिए आ सकते हैं. ये इंटरव्यू 11:30 तक चलेगा. चयनित उम्मीदवारों को 3 साल का फेलोशिप ग्रांट किया जाएगा जिसे सरकारी नियमों के मुताबिक आगे बढ़ाया जा सकता है.ये भी पढ़ें- NHAI में युवाओं के लिए नौकरी का मौका, 60 हजार रुपए होगी सैलरी


पदों का विवरण-
फिजिक्स- 7 पदइलेक्ट्रॉनिक्स- 5 पद


योग्यता-
– फिजिक्स जेआरएफ के लिए आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास यूजीसी नेट क्वालिफिकेशन के साथ फर्स्ट डिविजन में बेसिक साइंस में पोस्टग्रेजुएट डिग्री होनी चाहिए. या ग्रेजुएशन/पोस्ट ग्रेजुएशन लेवल पर फर्स्ट डिविजन के साथ एमई/एमटेक की डिग्री होनी चाहिए.- इलेक्ट्रॉनिक जेआरएफ के लिए आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास नेट/गेट क्वालिफिकेशन के साथ बीई/बीटेक में फर्स्ट डिविजन होना चाहिए. या ग्रेजुएशन/पोस्ट ग्रेजुएशन लेवल पर फर्स्ट डिविजन के साथ एमई/एमटेक की डिग्री होनी चाहिए.


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आयु सीमा-
दोनों जेआरएफ के लिए 31 दिसंबर को उम्मीदवार की अधिकतम आयु सीमा 28 साल होनी चाहिए. ओबीसी उम्मीदवारों को 3 साल और एससी/एसटी उम्मीदवारों को 5 साल की छूट दी जाएगी.


पे स्केल-
पहले 2 साल के लिए 25,000 रुपए. अगले साल SRF द्वारा अपग्रेड किया जाए तो तीसरे साल 28,000 रुपए


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ये डॉक्यूमेंट्स होंगे जरूरी-
खुद से लिखा या टाइप किया हुआ एप्लीकेशन जिसमें नाम, जन्मतिथि, एड्रेस हो. इसके अलावा आधार कार्ड, जाति प्रमाण पत्र (अगर जरूरी हो), शैक्षणिक सर्टिफिकेट, मार्क्स के परसेंटेज, गेट/ नेट का स्कोर कार्ड अपने साथ जरूर लाएं. सभी डॉक्यूमेंट्स को सेल्फ अटेस्ट भी कर लें. इसके अलावा ओरिजनल सर्टिफिकेट भी साथ लाएं.


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एक रुपए के नोट क्यों जारी नहीं करता रिजर्व बैंक? जानें सबसे छोटे नोट की बड़ी कहानी


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पूरी दुनिया पहले विश्वयुद्ध की आग में झुलस रही थी. तब भारत के रुपए-पैसे औपनिवेशिक सरकार यानी ब्रिटिश सरकार के यहां छपा करते थे. चूंकि लड़ाई की वजह से सिक्के ढालने वाले टकसालों की क्षमता सीमित हो चुकी थी, लिहाजा ब्रिटिश सरकार ने एक रुपए का नोट निकाला. 30 नवंबर 1917 को इंग्लैंड से छपकर आया ये नीले रंग का नोट जल्द ही भारतीय बाजार पर छा गया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का ये सबसे नन्हा नोट आरबीआई नहीं, बल्कि भारत सरकार की ओर से जारी होता है. इस एक रुपए के नोट के अलावा दूसरे सभी नोटों पर आरबीआई गर्वनर के दस्तखत होते हैं. ये नोट दूसरे नोटों से अलग है, साथ ही इसके कई दिलचस्प पहलू भी हैं जो इसे दूसरे नोट से अलग बनाते हैं.जब थप्पड़ के बदले शास्त्री जी ने चपरासी को लगा लिया था गले!


हमारे देश में रुपए-पैसों की टकसाल का एकमात्र अधिकार आरबीआई के पास है. एक रुपए के नोट के अलावा बाकी सबपर आरबीआई गर्वनर के हस्ताक्षर होते हैं, वहीं एक रुपए के नोट वित्त मंत्रालय द्वारा जारी होता है और इसपर वित्त सचिव के दस्तखत होते हैं. इसकी एक बड़ी वजह ये है कि आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 24 के अनुसार आरबीआई को एक रुपये के बैंक नोट जारी करने का अधिकार नहीं है. चूंकि नोट के अलावा ये सिक्कों के रूप में भी बाजार में है, लिहाजा इसे लाएबिलिटी माना जाता है और मैं धारक को … अदा करने का वचन देता हूं, नहीं लिखा रहता है.



फोटो, सौजन्य- मिंटेज वर्ल्ड

एक रुपए के नोट के 101 सालों के इतिहास में इन पर दो बार रोक लगी. सबसे पहले साल 1926 में लागत संबंधी वजहों से इस नोट पर रोक लगाई गई, बाद में 1940 में नोट दोबारा बनने लगे जो 1994 में एक बार फिर से बंद कर दिए गए. इसके बाद 2015 से नोटों की छपाई फिर से शुरू हो गई. हालांकि दो बार नोट बनने पर रोक लगने के बाद भी इनका अस्तित्व खत्म नहीं हुआ और ये हमेशा वैध रहे.


वोटर आईडी पर गलत नाम-तस्वीर आ जाए या पता बदल जाए तो ऐसे कराएं सही


आजादी के बाद नोट से जॉर्ज पंचम की तस्वीर हटाकर अशोक स्तंभ प्रिंट किया जाने लगा. कहा जाता है कि पहले भारत सरकार ने इसपर गांधीजी की तस्वीर चित्रित करनी चाही, लेकिन कुछ वजहों से ऐसा संभव नहीं हो सका. नोट पर उस वक्त के वित्त सचिव के दस्तखत थे.



एक रुपए का नोट

एक रुपए के नोट छापने का अधिकार भारत सरकार को कॉइनेज एक्ट के तहत मिला हुआ है. इस एक्ट के तहत केवल एक रुपए के नोट छापने का अधिकार वित्त मंत्रालय को है, लेकिन इस नोट और सिक्कों का बाजार में सर्कुलेशन आरबीआई के तहत ही आता है. इस एक्ट में हालांकि वक्त-वक्त पर कई बदलाव होते रहे हैं. एक रुपए के नोट पर आरबीआई के गर्वनर की बजाए वित्त सचिव का साइन होता है, साथ ही इसपर सिल्वर लाइन भी नहीं होती है, जो कि बाकी सभी नोटों में होती है.


दस काम जिसे इंसान चुटकियों में कर सकते हैं लेकिन रोबोट हो जाते हैं फेल


नोट के रंग में भी लगातार बदलाव हुए, जैसे पहला इसका रंग हरा था जो 1951 में तब के वित्त सचिव के जी अंबेगांवकर के कार्यकाल में नीला-बैंगनी सा हो गया. फिर 1966 में एस भूतलिंगम के दौरान नोट का साइज और छोटा हो गया. माना जाता है कि एक रुपए का नोट एकमात्र ऐसी करंसी है, जिसके रंग आकार और दस्तखत में बहुत बार बदलाव हुए. 30 नवंबर साल 2017 में एक रुपए के नोट के 100 साल पूरे होने पर नोट के संक्षिप्त इतिहास के साथ एक कार्ड भी जारी हुआ.


सिखों के लिए क्या है कृपाण की अहमियत?


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