Sunday, 2 December 2018

राजस्‍थान: बाल विवाह को बालिका वधू की 'किक', गौने को ना और 'गोल' को हां


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निकहत अलीसदियों पुराने बाल विवाह का अत्याचार देश के तकरीबन हर हिस्से में कभी रिवाज़, कभी परम्परा तो कभी मजबूरी के नाम पर आज भी जारी है. ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ के बड़े-बड़े दावे तो 21वीं सदी के आधुनिक भारत में किए जा रहे हैं लेकिन सच ये है कि बेटियों को बचाना क़ानून के लिए भी बड़ी चुनौती है. बाल विवाह को लेकर सरकार भले ही सख़्त हो लेकिन आज भी यह कुप्रथा चोरी छिपे बदस्तूर जारी है.


अक्टूबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में सौंपी गई एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि बाल विवाह का शिकार हुई सबसे ज्यादा लड़कियां पश्चिम बंगाल में हैं. इसके तहत पश्चिम बंगाल के शहरी इलाकों में 40.7 और ग्रामीण इलाकों में 47 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं. दूसरे नंबर पर बिहार रहा जहां बाल विवाह के 39 प्रतिशत मामले समाने आए.


तीसरे नंबर पर झारखंड में बाल विवाह के 38 प्रतिशत मामले सामने आए. चौथे नंबर पर राजस्थान रहा जहां बाल विवाह के 35.4 प्रतिशत मामले सामने आए. पांचवे पर महाराष्ट्र रहा जहां 25 प्रतिशत मामले सामने आए. छठे नंबर पर गुजरात रहा जहां 24.9 प्रतिशत मामले सामने आए. पंजाब और केरल में बाल विवाह का आंकड़ा 20 प्रतिशत से कम रहा.अब एक ज़िद से सब बदलने वाला है. ये बयार राजस्थान से चली है जो कुरीतियों और अंधविश्वास की जंज़ीरों में आज तक जकड़ा हुआ है. यहां आज भी बाल विवाह, बचपन को बर्बादी के दलदल में धकेल रहा है. लेकिन अब इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ बेटियों ने ही झंड़ा बुलंद कर दिया है. बेटियों ने साफ कर दिया है कि, न तो वो कच्ची उम्र में सगाई करेंगी और न ही शादी.


आज NEWS18 आपको लेकर चलेगा राजस्थान के अजमेर में जहां बचपन में ही शादी की बेड़ियों में जकड़ दी गई लड़कियों ने अपनी आज़ादी के लिए खेल को सहारा बनाया है. इन बच्चियों ने जब मैदान में फुटबॉल को किक मारी तो इशारा साफ था कि अब और नहीं.


अजमेर. राजस्थान का एक ख़ुबसूरत शहर. जहां झील भी हैं, ऐतिहासिक धरोहरें भीं है. धार्मिक मान्यताओं के लिए भी ये शहर जाना जाता है लेकिन इसी शहर में दशकों से जारी कुप्रथा पर आज तक लगाम नहीं लग पाई है. यहां आज भी बड़े पैमाने पर बाल विवाह को अंजाम दिया जाता है. आज भी यहां दो साल से 6 साल की उम्र के बच्चों की शादी कर दी जाती है. न तो क़ानून का ख़ौफ है और न ही किसी की परवाह. यहां चलती है तो सिर्फ समाज की शर्मनाक सोच.


आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान के जिन 16 ज़िलों में सबसे ज्यादा बाल विवाह होता है उनमें दौसा, जोधपुर, भीलवाड़ा, चुरू, झालावाड़, टोंक, उदयपुर, करौली, अजमेर, बूंदी, चितौडगढ़, नागौर, पाली, सवाईमाधोपुर, अलवर और बारां शामिल हैं.


ऐसा नहीं है कि बाल विवाह को लेकर सरकार ठोस कानून नहीं लाई लेकिन सब कुछ इतना चोरी छिपे होता है कि आरोपी बच निकलते हैं. बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के मुताबिक बाल विवाह कराने वाले बच्चे के माता पिता और विवाह में शामिल सभी लोगों पर एक लाख का जुर्माना और दो साल की कठोर सज़ा का प्रावधान है. साथ ही नाबालिग बच्ची के योन शोषण पर पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई का क़ानून है.


अजमेर से सिर्फ 30 किलोमीटर दूर हशियावास गांव में बाल विवाह के ख़िलाफ कई बच्चियां एक जुट हो गई हैं. कम उम्र में इन बच्चियों की शादी कर दी गई थी, उस वक्त न तो ये शादी का मतलब जानती थीं और न ही आज भी इन्हें इसकी कुछ समझ है, लेकिन अपनी आज़ादी और सपनों के मायने ये बच्चियों खेल और किताब के ज़रिए ज़रूर समझ गई हैं. इन लड़कियों में किसी की सगाई हो गई तो किसी की शादी, लेकिन कच्ची उम्र में इन लड़कियों ने रिश्ते की डोर में बंधने से इनकार कर दिया. ये बच्चियां भी पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहती हैं जिसे ज़ाहिर करने के लिए इन्होंने इसी खेल के मैदान में एक गीत भी बनाया.


कैमरे की गवाही में पीड़ितों के ऐसे बयान दर्ज हुए जो सुनने वालों के होश उड़ाने के लिए काफी हैं.


हैरानी इस बात की भी है कि अगर कोई परिवार इस कुप्रथा का हिस्सा न बनना चाहे, तो समाज की बंदिशें बच्चियों को बर्बादी की बेड़ियों में जकड़ने को मजबूर कर देती हैं. अपनी आज़ादी के लिए लड़ रही ये लड़कियां रोज़ाना पहले स्कूल जाती हैं फिर मैदान में फुटबॉल की प्रैक्टिस करती हैं. सगाई और शादी के बन्धन में बंधी इन लड़कियों ने हिम्मत दिखाई और आत्मविश्वास के दम पर अपना गोना रुकवा दिया यानी ससुराल जाने के इनकार कर दिया.


इन लड़कियों ने अब एक फुटबॉल ग्रुप बनाया है. इसमें कई ऐसी बच्चियां हैं जो अपनी बड़ी बहनों की शादी के समय ही बाल विवाह का शिकार हो गई थीं लेकिन अब उन्होंने कसम खाई है कि वो गांव में दूसरी बच्चियों की ज़िंदगी बर्बाद नहीं होने देगीं. पिछले दो सालों से फुटबॉल खेलती ये बच्चियां आज इतने आत्मविश्वास से भर चुकी है कि बाल विवाह जैसी कुप्रथा के ख़िलाफ़ खुलकर परिवार वालों के सामने आवाज़ उठाती हैं.


इन बच्चियों का भी सपना है कि वो फुटबॉल में मेसी और रोनाल्डो जैसी खिलाड़ी बनें. बच्चियों ने शपथ ली है कि वे गांव में होने वाले बाल विवाह में शामिल नहीं होंगी. इन बच्चियों को उनके घर की दहलीज़ से निकालकर खेल के मैदान तक लाना भी आसान नहीं था, बच्चियों को ट्रेनिंग दे रही ट्रेनर आरती शर्मा ने बताया कि जब वो पहुंची तो बच्चियों की हालत बेहद ख़राब थी. उन्‍होंने कहा कि बच्चियों कसो यहां तक लाने में काफी मुश्किलें आईं. लेकिन पहली नजर में ही पता चल गया था कि ये बच्चियां आगे तक जा सकती हैं.


बच्चियों के इस कदम से गांव में एक लहर चली जिसका फायदा दूसरी बच्चियों को भी मिला. लेकिन हर जगह ऐसा नहीं है.


इन बच्चियों में ये आत्मविश्वास महिला जन कल्याण समिति नाम के एक एनजीओ की कोशिश से आया है. इस एनजीओ ने इन बच्चियों को दो साल की मेहनत से खड़ा किया है. एनजीओ में काम करने वाली महिला करुणा फ़िलिप बताती हैं कि ख़ुद में आत्मविश्वास और हिम्मत लाने में खेल से अच्छा माध्यम कोई नहीं था लेकिन लड़कियों को फुटबॉल खिलाना इतना आसान नहीं था. दो साल पहले शुरु किए गए इस सफर में अब 150 से ज़्यादा बच्चियां इस फुटबॉल कल्ब का हिस्सा हैं.


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