Saturday, 30 June 2018

JDS-कांग्रेस के बागी विधायकों को BSY के ऑफर के बाद कुमारस्वामी-सिद्धारमैया ने मिलाया हाथ!


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कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर लगाए हुए हैं. पिछले महीने कांग्रेस-जेडीएस की एकता के चलते उन्हें सीएम पद की शपथ लेने के 56 घंटे के अंदर इस्तीफा देना पड़ा था.बेंगलुरु में शुक्रवार को बीजेपी के प्रदेश पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए पूर्व सीएम ने मौजूदा कुमारस्वामी सरकार से नाराज चल रहे कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को बीजेपी में शामिल होने का खुला ऑफर दिया था. इन विधायकों के बीजेपी में शामिल होने से एचडी कुमारस्वामी की गठबंधन सरकार गिर जाएगी.


पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो येदियुरप्पा वर्तमान में राज्य में बन रही राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाना चाहते हैं. इसके लिए वह कांग्रेस-जेडीएस के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों को साधने में जुटे हुए हैं.


चार दिन पहले उन्होंने अहमदाबाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से भी मुलाकात की थी. हालांकि उन्होंने बाद में सफाई दी थी कि उन दोनों के बीच लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर चर्चा हुई, प्रदेश की राजनीति पर नहीं.कर्नाटक के कुछ बीजेपी नेताओं का कहना है कि बीजेपी की केंद्रीय लीडरशिप का फोकस जेडीएस-कांग्रेस सरकार को गिराने पर नहीं है. उन्होंने येदियुरप्पा को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर फोकस करने के लिए कहा है जोकि राजनीतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण है. केंद्रीय नेतृत्व ने येदियुरप्पा को कर्नाटक की गठबंधन सरकार को लेकर चिंता नहीं करने को कहा है.


कर्नाटक की राजनीति में बन रही परिस्थितियों को देखते हुए कुमारस्वामी ने गठबंधन सरकार से नाराज चल रहे पूर्व सीएम सिद्धारमैया से सुलह करने के लिए शुक्रवार रात पहल की. एक ट्वीट में उन्होंने लिखा कि सरकार में सिद्धारमैया बड़ी भूमिका निभाएंगे.


कुमारस्वामी के ट्वीट के जवाब में सिद्धारमैया ने अपनी नाराजगी से जुड़ी सभी खबरों को अफवाह करार दिया है. उन्होंने कहा कि सरकार स्थिर है. एक ट्वीट में उन्होंने मीडिया पर आरोप लगाया कि वीडियो के एडिटेड हिस्से दिखाकर वह उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रही है.


हालांकि शनिवार को कुमारस्वामी ने कावे मुद्दे पर ऑल-पार्टी बैठक बुलाई थी जिसमें येदियुरप्पा शामिल हुए लेकिन सिद्धारमैया गायब रहे. इस दौरान सिद्धारमैया वरिष्ठ कांग्रेस नेता एमबी पाटिल से मुलाकात कर रहे थे जिन्हें इस बार मंत्री नहीं बनाया गया है.


इस बीच कुमारस्वामी 5 जुलाई को अपनी सरकार का पहला बजट पेश करने वाले हैं. सोमवार को विधानसभा की कार्यवाही शुरू होगी. अब यह देखना होगा कि सदम में सिद्धारमैया गठबंधन सरकार का बचाव करते हैं या चुपचाप बैठकर तमाशा देखते हैं.


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पीछा, छेड़छाड़ और अश्‍लील हरकतें: दिल्‍ली की महिलाएं रोजाना सफर में झेलती हैं ऐसी यातनाएं


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जोया मतीनदिल्‍ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली अक्षिता दिल्‍ली के उत्‍तम नगर में रहती हैं. पहले स्‍कूल और अब कॉलेज जाने के लिए वह कई घंटों का सफर करती हैं. मेट्रो कनेक्टिविटी होने के बावजूद उसे दिन में दो बार बस या ऑटो लेना पड़ता है. इस दौरान उसे छेड़खानी और सार्वजनिक जगहों पर फब्तियां झेलनी पड़ती है. उसने बताया, ‘अक्‍सर मैं काफी डरी हुई रहती हूं. एक बार एक आदमी ने मेरा मेट्रो स्‍टेशन से कॉलेज तक पीछा किया.’


अक्षिता की कहानी देश की किसी भी महिला की कहानी हो सकती है. महिलाओं के मुद्दों पर थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन सर्वे में भी यह समस्‍या सामने आई थी और इस सर्वे में भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया था. यह रैंकिंग स्‍वास्‍थ्‍य, भेदभाव, सांस्‍कृतिक परंपराओं, यौन हिंसा, गैर यौन हिंसा और मानव तस्‍करी के पैमाने के आधार पर तय की गई.


केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने हालांकि इस सर्वे को खारिज कर दिया और थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के सर्वे के तरीके को विस्‍तार से बताने को कहा. मंत्री को अपने सवालों के जवाब का इंतजार है लेकिन दिल्‍ली में महिलाओं को बस, ऑटो और मेट्रो में सफर के दौरान डर का अंदेशा हर वक्‍त बना रहता है.नोएडा में काम करने वाली 24 साल की एक युवती ने बताया, ‘सफर करना बहुत बुरा अनुभव होता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किसी समय और किस साधन से सफर कर रहे हैं. मुझे अलर्ट, तैयार रहना होता है और मैं कभी भी अपना फोन बंद नहीं करती हूं. हर समय मुझे अपनी सुरक्षा का डर लगा रहता है.’


इस पैनल ने भी 2017 के रॉयटर्स फाउंडेशन सर्वे के नतीजों को पुष्‍ट किया. रॉयटर्स फाउंडेशन सर्वे में दिल्‍ली को दुनिया में महिलाओं के लिए चौथा सबसे खतरनाक शहर बताया गया था. उपराज्‍यपाल ने पिछले साल इस पैनल का गठन किया था और इसे महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जड़ का पता लगाने को कहा गया था. पैनल ने बताया कि कॉलेज कैंपस, सार्वजनिक यातायात और सुनसान जगहों को महिलाओं के लिए असुरक्षित बताया गया.


दो महिलाओं ने सफर के दौरान होने वाली समस्‍याओं के बारे में बताया. ओखला मेट्रो स्‍टेशन के बाहर एक लड़की ने बताया, ‘यदि मैं मजबूत और दृढ़ दिखती हूई भावशून्‍य चेहरे के साथ चलती हूं तो मुझे लगता है कि हमले या छेड़छाड़ से बच जाऊंगी.’ एक अन्‍य लड़की ने बताया, ‘भले ही मैं इस रास्‍ते से रोजाना सफर करती हूं लेकिन मुझे खुद को लगातार याद दिलाना पड़ता है कि सब ठीक है, मैं सुरक्षित हूं.’


दिल्‍ली पुलिस के स्‍पेशल कमिश्‍नर संजय बेनीवाल ने न्‍यूज18 से बात करते हुए महिलाओं की समस्‍याओं के कई कारण बताए. उन्‍होंने कहा, ‘भीड़भाड़ वाली बसों या बस व मेट्रो स्‍टेशन पर अंधेरे की वजह से महिलाएं आसान शिकार बन जाती है.’


इससे उनका सफर महंगा हो जाता है और इससे उनकी जेब पर भी असर पड़ता है. इस अध्‍ययन में बताया गया कि किस तरह से महिलाएं सफर की सुरक्षा की पढ़ाई की गुणवत्‍ता से तुलना करती हैं.


दक्षिण दिल्‍ली में खाना बनाने का काम करने वाली रीना मुखर्जी इसी तरह का एक उदाहरण हैं. उनकी बेटी के 12वीं में अच्‍छे नंबर आए थे और उसका दक्षिण दिल्ली के अच्‍छे कॉलेज में दाखिला हो गया था लेकिन लंबे सफर के डर से रीना ने अपनी बेटी का दाखिला वहां नहीं कराया. अभी उनकी बेटी दयाल सिंह कॉलेज में पढ़ती है.


2015 में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘हिम्‍मत’ ऐप लॉन्‍च की थी. इस ऐप के जरिए यूजर संकट होने पर पुलिस, दोस्‍तों और परिवार के लोगों को अलर्ट भेज सकता था. हालांकि संसदीय समिति ने पाया कि यह ऐप अपने लक्ष्‍य में असफल रही है क्‍योंकि काफी कम लोग इसका उपयोग कर रहे हैं. अब इस ऐप में बदलाव किए गए हें और यह हिंदी व अंग्रेजी में भी उपलब्ध है. साथ ही इसमें रजिस्‍ट्रेशन भी आसान हो गया है.


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बंगाल: अमित शाह से मुलाकात एक दिन बाद TMC में शामिल हुए 4 परिवार


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भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह के ‘जनसंपर्क अभियान’ के तहत पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में ग्रामीण परिवारों से मिलने के एक दिन बाद चार परिवार तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. तृणमूल के नेताओं ने इन परिवारों को मीडिया के सामने पार्टी का झंडा सौंपा. उन्‍होंने दावा किया कि भोलेभाले गांववालों को शाह ने बीजेपी में शामिल होने के लिए धमकाया.पुरुलिया में रहने वाले पुचु राजभर ने कहा कि वह राजनीति में नहीं है लेकिन तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेता ममता बनर्जी के प्रति उसका झुकाव है. राजभर से गुरुवार को अमित शाह ने मुलाकात की थी. उसने दावा किया कि शाह के जाने के बाद वे तृणमूल से मदद लेने कोलकाता आ गए थे. उसने कहा, ‘हम अपने आप शहर आए हैं और हम जानते हैं कि दीदी हमें धमकियों से बचाने आएंगी.’


पुरुलिया जिले के चार आदिवासियों ने आरोप लगाया है कि भाजपा उन पर पार्टी में शामिल होने का दबाव बना रही है और उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सुरक्षा की मांग की. तृणमूल नेता मदन मित्रा ने कहा कि भाजपा के दबाव के बाद अदिवासी अपनी असुरक्षा की भावना से मुख्यमंत्री को अवगत कराने के लिए कालीघाट स्थित तृणमूल कांग्रेस कार्यालय पहुंचे. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने आदिवासियों से मुलाकात की या नहीं.


मित्रा ने ग्रामीणों को मीडिया के समक्ष पेश किया और दावा किया कि वे शाह और उनके अंगरक्षकों की मौजूदगी से भयभीत हो गए और इसलिए वे सुरक्षा मांगने के लिए बनर्जी के कालीघाट आवास पहुंचे. मित्रा ने कहा कि उनके परिवार को भाजपा मानसिक यातनाएं दे रही है. तृणमूल के राज्य सभा सदस्य शांतनु सेन ने कहा कि चारों ग्रामीण कभी राजनीति में शामिल नहीं रहे और शाह की यात्रा से मानसिक रूप से आघात और दबाव में हैं. वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा ने इन आरोपों को खारिज किया.


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सुषमा स्वराज के पति को यूजर ने किया ट्वीट, 'आज घर आए तो उन्हें पीटना'


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पासपोर्ट विवाद को लेकर ट्विटर पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्रोल करने का सिलसिला थम नहीं रहा है. शनिवार को एक यूजर ने सुषमा के पति स्वराज कौशल को ट्वीट कर बीजेपी और विदेश मंत्री पर मुस्लिमों के तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए कौशल से कहा कि शाम को जब सुषमा घर आएं तो उनकी पिटाई कर उन्हें समझाएं.स्वराज कौशल ने एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया जिसमें लिखा था, ‘आज रात जब वह घर आएं तो आप उन्‍हें पीटें और समझाएं कि मुस्लिम तुष्‍टीकरण न करें. उन्‍हें बताएं कि मुसलमान बीजेपी को कभी वोट नहीं देगा.’


विदेश मंत्री ने भी स्वराज के इस ट्वीट को लाइक किया है. वहीं मुकेश गुप्ता नाम के इस शख्स के एक और ट्वीट को लाइक किया है. इस ट्वीट में उसने लिखा, ‘किसी न किसी को सुषमा को सीधा करना होगा. उन्हें यकीन दिलाना होगा कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं करेंगे. गवर्नर यह केवल आप कर सकते हैं. आगे बढ़ो, उन्हें फिक्स करो. करोड़ों भारतीयों की दुआ लगेगी.’


इससे कुछ ही दिन पहले सुषमा को पासपोर्ट जारी करने को लेकर विवाद के सिलसिले में ट्रोल किया गया था. यह पासपोर्ट मुस्लिम शख्‍स से विवाह करने वाली तन्वी सेठ को जारी किया था. इस दंपति ने लखनऊ के पासपोर्ट सेवा केन्द्र में कार्यरत विकास मिश्रा पर उन्हें पासपोर्ट आवेदन को लेकर अपमानित करने का आरोप लगाया था. विवाद के बाद मिश्रा का ट्रांसफर कर दिया गया.



इस दंपति ने दावा किया कि मिश्रा ने महिला के पति से कहा कि वह हिन्दू धर्म अपना ले. अधिकारी पर यह भी आरोप लगाया कि उसने महिला को एक मुस्लिम से विवाह करने को लेकर आड़े हाथ लिया. बाद में पुलिस एवं एलआईयू (स्थानीय खुफिया इकाई) की रिपोर्ट में पाया गया कि महिला ने जो पता दिया था, वह उस जगह पिछले एक साल से नहीं रह रही थी.


सोशल मीडिया के एक वर्ग ने मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई के लिए सुषमा एवं मंत्रालय पर हमला बोला और कहा कि वह तो महज अपनी ड्यूटी कर रहा था. इस बारे में जो भी ट्वीट किये गये, उनमें से कई को सुषमा ने फिर से ट्वीट किया.


यह पूछे जाने पर कि क्या मंत्रालय ट्रोल करने वालों के खिलाफ किसी कार्रवाई पर विचार कर रहा है, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, ‘विदेश मंत्रालय ने इस प्रकार के दुर्भावनापूर्ण ट्वीट और ट्रोल करने का अपने तरीके से जवाब दिया था. मुझे नहीं लगता कि मेरे पास इस बारे में कहने के लिए कुछ और है.’


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नरेंद्र मोदी को कांग्रेस का चैलेंज, 'ट्रोलर्स को अनफॉलो कर बनें असली पीएम'


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कांग्रेस ने शनिवार को सोशल मीडिया पर ‘अनफॉलो ट्रोल्‍स चैलेंज’ शुरू किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसमें सबसे पहले टैग किया. इसमें कहा गया कि पीएम मोदी सोशल मीडिया पर गाली, धमकी देने और प्रताड़ित करने वाले लोगों को अनफॉलो करें.कांग्रेस की नेशनल मीडिया कॉर्डिनेटर राधिका खेरा ने पीएम के अलावा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को नॉमिनेट किया.


खेरा ने ट्वीट किया, ‘इस सोशल मीडिया दिवस पर सभी यूजर्स प्रण लें कि वह वर्चुअल वर्ल्‍ड को साफ-सुथरा और गाली मुक्‍त रखेंगे. गाली देने वाले ट्रोल्‍स को अनफॉलो करने के लिए दो लोगों को नॉमिनेट करते हुए इसकी शुरुआत करें. मैं नरेंद्र मोदी और पीयूष गोयल को नॉमिनेट करती हूं.’



कांग्रेस के टि्वटर अकाउंट से ट्वीट किया गया, ‘ऑनलाइन ट्रोल्‍स से परेशान होकर कांग्रेस सोशल मीडिया टीम की महिलाओं (और कुछ पुरुषों) ने इस सोशल मीडिया दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सामूहिक अर्जी के रूप में एक वीडियो पोस्‍ट किया है.’




इस वीडियो में कुछ महिलाएं विदेशी बैंड द बीटल्‍स के गाने ‘लेट इट बी’ का अपना वर्जन गा रही हैं. वे पीएम मोदी से वास्‍तविक प्रधानमंत्री बनने और ट्रोल्‍स को अनफॉलो करने की अपील करती दिख रही हैं.


बता दें कि 30 जून को सोशल मीडिया दिवस मनाया जाता है. एक विदेशी मनोरंजन कंपनी ने इसकी शुरुआत की थी.


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...तो एंटी क्लॉक चलने वाली घड़ियों से दूर होंगी दुनिया की समस्याएं!


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आपके घर या दफ्तर में जो घड़ी टंगी है, वो गलत है. आप की कलाई पर जो घड़ी बंधी है, वो गलत है. अब तक आप जिन घड़ियों को सही मानकर वक्त देखा करते थे, वो सब गलत हैं. ये दावा उस आदिवासी समुदाय ने किया है, जिन्होंने सालों पहले हमारी घड़ी को देखना बंद कर दिया है. उन्होंने घड़ी को उल्टा देखना शुरू कर दिया है, और उनकी माने तो उल्टी घड़ी से ही दुनिया का मंगल हो सकता है.नीचे तस्वीर में जरा गौर से देखिए, क्या आप बता सकते हैं कि इस घड़ी में कितने बजे हैं? दिमाग चकरा गया ना. आज तक आप जिन घड़ियों को देखने के आदी रहे हैं, ये उससे बिल्कुल उल्टी है. घड़ी उल्टी तो चल ही रही है, घड़ी में नंबर भी उल्टे लिखे हुए हैं. गुजरात के एक बड़े हिस्से में यही घड़ी आपको घर-घर में दिखाई देगी. दुकानों पर यही घड़ी बिकती दिखाई देगी. उल्टी दिशा में चलने वाली इस घड़ी को यहां का आदिवासी समुदाय बिल्कुल सही मानता है. इस घड़ी का इतना जबरदस्त असर है कि सरकारी दफ्तरों में भी आदिवासी घड़ी टंगी दिख जाएगी.



आखिर ये घड़ी उल्टी दिशा में क्यों चल रही है? ये उल्टी घड़ी हर घर-दफ्तर में क्यों दिख रही है?किसने बनाई ये उल्टी घड़ी? और बाकी दुनिया से अलग उल्टी चलने वाली घड़ी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इन्हीं सवालों की पड़ताल करने न्यूज18 की टीम गुजरात के उन इलाकों की ओर रवाना हुई, जहां से उल्टी घड़ी की मांग बढ़ने की खबर आ रही थी. हमारी पड़ताल की शुरुआत गुजरात के दाहोद जिले से हुई.



न्यूज18 की टीम को पता चला कि दाहोद जिले के आदिवासी इलाकों में उल्टी घड़ी एक मुहिम की शक्ल अख्तियार कर चुकी है. उन इलाकों की ओर बढ़ते हुए हमें विकास का असर साफ दिखाई दे रहा था. पक्की सड़कें और बिजली के तार बता रहे थे कि ये बाकी दुनिया से कटा हिस्सा नहीं है, लेकिन यहां समय की धारा बाकी दुनिया से अलग उल्टी दिशा में बह रही है.


तकरीबन दो हजार लोगों के इस छोटे से गांव के हर घर में उल्टी घड़ी टंगी है. इस घड़ी को देखकर हमारे लिए भी वक्त का पता लगा पाना मुश्किल था. आम तौर पर हम जो घड़ी इस्तेमाल करते हैं, उसके ऊपर के आधे हिस्से पर नजर डालें तो पता चलेगा कि घड़ी की सुइयां बाएं से दाएं की ओर चलती हैं. लेकिन आदिवासी घड़ी के ऊपर के आधे हिस्से में घड़ी की सुइयां दाएं से बाएं जाती दिख रही हैं.



हमने लोगों से बातचीत की तो उन्होंने हमें स्कूल जाकर बात करने की सलाह दी. पता चला कि स्कूल में बकायदा आदिवासी घड़ी के बारे में पढ़ाया-समझाया जाता है. ये दाहोद प्राइमरी स्कूल के 7वीं क्लास के बच्चे हैं. यहां शिक्षक बच्चों को बता रहे हैं कि आदिवासी घड़ी ही सही घड़ी है, और दूसरी घड़ी उनके किसी काम की नहीं है. दोनों घड़ियों का फर्क बताने के लिए क्लास में आदिवासी घड़ी भी है और वो घड़ी भी है जिसे हम और आप इस्तेमाल करते हैं. यहां हमें टीचर ने बताया कि उल्टी चलने वाली घड़ी आदिवासी समुदाय की पहचान से जुड़ी है.



 


शिक्षक बाबू भाई निनामा ने बताया कि बच्चों को शुरुआत से सिखाने की वजह है कि वो उनका कल्चर को समझ पाए. आदिवासियों का कल्चर प्रकृति के साथ रहा है. उनको उनकी दिशा बताना है आज लोग अपना कल्चर भूलते जा रहे है. यूएन ने भी कहा है कि विश्व को ग्लोबल वार्मिंग से बचना है तो आदिवासियों के कल्चर को बताना जरूरी है.


प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने की टीचर की ये दलील वाजिब भी है. विकास की अंधी दौड़ के बीच आदिवासी आज भी कुदरती तरीके से जीने के आदी हैं. पहाड़, तालाब, खेत-खलिहान, पालतू जानवर उनकी जिंदगी के अहम हिस्से हैं. वो आज भी उन परम्पराओं और संस्कृतियों से जुड़े हैं, जो सैकड़ों साल पहले से चली आ रही हैं.


आदिवासियों की दलील है कि हमारी धरती सूर्य के चारों ओर दाईं से बाईं ओर परिक्रमा करती है.
अनाज पीसने के लिए चक्की को भी दाएं से बाएं घुमाया जाता है. विवाह के वक्त फेरे भी दाएं से बाएं लिए जाते हैं. आदिवासियों के पारंपरिक नृत्य के दौरान कलाकार दाएं से बाएं घूमते हैं. यहां तक कि खेत जोतने वाले बैल भी जुताई के दौरान दाएं से बाएं तरफ घूमते हैं. लिहाजा घड़ी के सुइयों के चलने की दिशा भी दाएं से बाएं होनी चाहिए.


आदिवासी समुदाय का मानना है कि दुनिया की ज्यादातर समस्याओं की वजह यही है कि लोग वक्त की उल्टी दिशा को तरजीह दे रहे हैं. आदिवासियों के मुताबिक जब तक दुनिया उनकी एंटी क्लॉक चलने वाली घड़ी नहीं अपनाएगी, दुनिया की समस्याएं दूर नहीं होंगी.


आदिवासी नेता भंवरलाल परमार के मुताबिक होली हो चाहे पीपल पूजा हो चाहे, मंदिर हो चाहे आरती हो आप लेफ्ट साइड से करते है जबकि हैम राइट साइड से करते है. अब यह समय आ गया है कि यह प्रूफ करना हैं कि आप सही है या हम? अगर हम गलत है तो पृथ्वी को, चंद्र को उल्टा घुमाकर दिखाइए, बेल को उल्टा चलाकर दिखाइए, हम साढ़े आठ प्रतिशत लोग प्रकृति के अनुसार घूम रहे है तो आप लोग क्यो उल्टा घूम रहे हो?


सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी समुदायों में भी उल्टी घड़ी एक जनआंदोलन बन चुकी है. इन घड़ियों की शुरुआत कब हुई, इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है.



शुरू में इस घड़ी को देखना अटपटा था, लेकिन अब तो हालत ये है कि आदिवासियों ने शहरी घड़ी देखना सालों पहले बंद कर दिया है. आदिवासियों के मुताबिक यही घड़ी प्राकृतिक घड़ी है. उल्टी घड़ी की पड़ताल में जुटी न्यूज18 की टीम दाहोद के एक सरकारी दफ्तर का मुआयना करने पहुंची. यहां के जिला पंचायत भवन में कदम रखते ही हम चौंक गए, क्योंकि यहां भी दीवार पर आदिवासी घड़ी टंगी दिखी.



न्यूज18 ने दाहोद के एक सरकारी दफ्तर में टंगी उल्टी घड़ी के बारें में सरकारी कर्मचारी विल्सन संगाडा से बातचीत की. उनसे हुई बातचीत के अंश इस प्रकार हैं–


सवाल: कितने बजे है विल्सन?
विल्सन: अभी एक बजने में10 मिनट बाकी है.
सवाल: आपको कन्फ्यूजन नही होता!
विल्सन: नही,पहले कंफ्यूसन होता था लेकिन अब आदत हो गई है.
सवाल: क्यों लगाये इस घड़ी को?
विल्सन: आदिवासियों का यह प्रतिक है.


अब हमारे सामने सवाल ये था कि ये घड़ियां आदिवासियों तक पहुंचती कैसे हैं. इसे कौन बनवाता है, कहां तैयार होती हैं उल्टी दिशा में चलने वाली घड़ियां. हमें पता चला कि पास के बाजार में एक आदिवासी दुकानदार इन घड़ियों को बेच रहा है.



आदिवासी समुदाय के राजेश भाँभोर ने कहा है कि यह समाज की संस्कृति का प्रतीक है. हमारे समाज के लोगों को प्रकृति के पास दोबारा लाने का प्रयास है. युवाओं में खास जनजागरण हो रहा है.


राजेश भांभोर ने बताया कि ऐसी घड़ियां गुजरात के तापी जिले में तैयार हो रही हैं. हमारी टीम ने तापी का रुख किया. वहां लालभाई नाम के एक आदिवासी कार्यकर्ता की देखरेख में उल्टी दिशा में चलने वाली घड़ियां तैयार हो रही हैं. यहां से अब तक 15 हजार से ज्यादा घड़ियां गुजरात और दूसरे राज्यों के आदिवासी इलाकों में जा चुकी हैं. अब तैयारी उल्टी चलने वाली हाथ घड़ी बनाने की है.



आदिवासी कार्यकर्ता लालभाई के मुताबिक घड़ियों की मांग बढ़ती जा रही है.अबतक 12 से 15 हजार घड़ियां घर घर पहुंचाई जा चुकी हैं.


लालभाई के मुताबिक युवाओं में इस प्राकृतिक घड़ी को लेकर दीवानगी दिख रही है. फेसबुक के जरिए भी इसका प्रचार किया जा रहा है और आदिवासी घड़ी दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंचाई जा रही है. यहीं हमारी मुलाकात उस शख्स से हुई जो रहने वाले तो झारखंड के हैं लेकिन इस घड़ी को उन्होंने देश के कई राज्यों तक फैलाने में अहम भूमिका निभाई है.



मुकेश बिरवा की मुहिम आदिवासी इलाकों में रंग दिखाने लगी है, लेकिन उनकी ख्वाहिश है कि एक दिन ऐसा आएगा जब पूरे देश में इसी घड़ी का इस्तेमाल होगा और हर कोई कुदरत के साथ तालमेल बिठाना सीख जाएगा.


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