Wednesday, 31 January 2018

'BUDGET से उतनी ही उम्मीदें, जितनी दिल्ली को केजरीवाल से'


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बजट 2018 कई मायनों में खास होने के कयास लगाए जा रहे हैं. जीएसटी लागू होने के बाद ये पहला आम बजट है. इसे लेकर हर जगह चर्चा का बाज़ार गर्म है, शहर से लेकर गांव तक, हर कहीं लोग बजट को लेकर उत्सुक हैं. लेकिन ये उत्सुक्ता, ज़मीन से ज़्यादा सोशल मीडिया पर दिख रही है. बजट को लेकर सोशल मीडिया में लोग अपनी-अपनी उम्मीदें जता रहे हैं.वित्त मंत्री अरुण जेटली आज संसद में 2018-19 के लिए आम बजट पेश करेंगे. यह उनकी सरकार का पांचवां बजट होगा. यह बजट ऐसे समय में पेश किया जा रहा है जब आने वाले महीनों में आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे तीन प्रमुख राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकारें हैं. अगले साल यहां लोकसभा चुनाव भी होने हैं. ऐसे में उम्मीद है कि इस बजट में ग्रामीण क्षेत्रों को खुश करने के लिए नई योजनाएं लाई जा सकती हैं, तो मनरेगा, ग्रामीण आवास, सिंचाई परियोजनाओं व फसल बीमा जैसे मौजूदा कार्यक्रमों के लिए आवंटन में बढ़ोतरी भी देखने को मिल सकती है.


जेटली ने राजकोषीय घाटे को मौजूदा वित्त वर्ष में घटाकर जीडीपी के 3.2 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा था. अगले वित्त वर्ष 2018-19 में इसे घटाकर तीन प्रतिशत किया जाना है. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बजट को लेकर बड़ी उम्मीदें नहीं पालने की नसीहत पहले ही दे चुके हैं. उन्होंने संकेत दिया था कि बजट में लोकलुभावन कदमों पर जोर नहीं होगा. उन्होंने कहा था, यह एक भ्रम है कि आम आदमी छूट चाहता है. जीएसटी लागू होने के बाद यह पहला आम बजट होगा, जिस पर विश्लेषकों की इसलिए भी निगाह है क्योंकि वे देखना चाहते हैं कि जेटली इकोनॉमिक ग्रोथ को बल देने के लिए क्या-क्या उपाय करेंगे.


चर्चा है कि शेयरों में निवेश से होने वाले पूंजीगत लाभ पर कर छूट समाप्त हो सकती है. यह भी देखना होगा कि क्या जेटली कॉरपोरेट कर में कमी लाने के अपने वादे को पूरा करते हैं या नहीं. फिर इनकम टैक्‍स छूट लिमिट के साथ 80सी में भी बदलाव किया जा सकता है. जानकारों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाने के लिए प्रोत्साहनों की घोषणा हो सकती है तो आंत्रप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप के लिए कुछ घोषणाएं हो सकती हैं.देखिए सोशल मीडिया में लोग बजट को लेकर क्या कह रहे हैं:










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पश्चिम बंगाल उपचुनाव Result 2018: जानें दोनों सीटों का सियासी गणित


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अगर लोकसभा-विधानसभा के चुनावी आंकड़ों को देखें तो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आंकड़ों में सब पर भारी नजर आ रही है. बात लोकसभा की हो या फिर विधानसभा की सभी जगह आंकड़ों में टीएमसी भारी है.अगस्त 2017 में हुए विधानसभा के उपचुनावों में तो सबांग विधानसभा में हुए उपचुनाव में भी टीएमसी का पलड़ा भारी रहा था. इस उपचुनाव में टीएमसी की उम्मीदवार गीता रानी भुइयां को कुल 106179 वोट मिले थे, जबकि माकपा पार्टी से उनकी निकटतम उम्मीदवार रीता मंडल को 41,987 वोट हासिल हुए थे. जबकि भारतीय जनता पार्टी की अंतरा भट्टाचार्य को सिर्फ 37,479 वोट मिले और कांग्रेस प्रत्याशी चिरंजीब भौमिक को 18,060 वोट से संतोष करना पड़ा था.


अगर पश्चिम बंगाल विधानसभा में नजर दौड़ाएं तो 2016 में 294 सीट में से टीएमसी को 211 सीट मिली थीं. वहीं कांग्रेस को 44 और अन्य को 39 सीट मिली थीं. जबकि वोट शेयर टीएमसी को 45.6 प्रतिशत मिला था.


इसी तरह से 2014 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी को 42 में से 34 सीट मिली थीं. वहीं कांग्रेस को 4 और सीपीआईएम, भाजपा को 2-2 सीट पर संतोष करना पड़ा था. लोकसभा चुनावों में टीएमसी को 39.8 प्रतिशत वोट मिला था.


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Union Budget 2018: बड़े संकट में PM मोदी, बजट में नहीं लिए ये 10 फैसले तो बिगड़ सकती है सरकार की हेल्थ


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4-युवाओं को मिले रोजगार : देश की बड़ी आबादी 35 साल से नीचे के लोगों की है. स्किल डिवेलेपमेंट, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी बातें महज बातें ही न रहें, तो जरूर फायदा हो सकता है लेकिन प्रत्यक्षत: सरकार इस मुद्दे पर बहुत सफल नहीं रही है.


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अलवर के पांच वोट बने मुसीबत, दो बूथों पर वीवीपैट की पर्चियों से भी होगी गिनती


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अलवर लोकसभा उपचुनाव में मतदान के दौरान पोलिंग टीम की एक बड़ी गलती सामने आई है. यह गलती इतनी बड़ी है कि अगर कोई प्रत्याशी एक-दो वोट से हारता है, तो विवाद बढ़ जाएगा. दरअसल, पोलिंग टीम मॉक पोल के दौरान डाले गए वोटों को ईवीएम में से हटाना भूल गई थी. इस गलती की वजह से मॉक वोट भी मुख्य वोट में काउंट हो रहे हैं.यह मामला मुंडावर के ढहलावास व राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ के ठूमरेला मतदान केंद्र का बताया गया है. जानकारी मिलने के बाद निर्वाचन अधिकारियों ने सभी प्रत्याशियों को बुलाकर यह तय किया कि मॉक पोल के पांच-पांच वोटों को कम करके मतगणना की जाएगी. हैरानी की बात ये है कि ऐसी भूल दो बूथों पर हुई है.


प्रत्याशियों से चर्चा के बाद यह तय हुआ है कि दोनों बूथों पर मॉक पोल के वोट कम करके वोटों की गिनती होगी, फिर भी किसी विवाद से बचने के लिए वीवी पैट पर्चियों के माध्यम से भी की गिनती होगी. जिला निर्वाचन अधिकारी राजन विशाल ने कहा है कि चुनाव आयोग ने दोनों बूथों पर मतगणना वीवी पैट की पर्चियों से कराने को कहा है.  अलवर लोकसभा सीट पर 29 जनवरी को मतदान हुए थे.


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Union Budget 2018: ये है बजट का चुनावी कनेक्शन, बीजेपी के इस गणित में उलझ सकती है कांग्रेस.!


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दरअसल, हर पार्टी विस्तार चाहती है, ऐसे में यह बजट इन राज्यों के वोटर्स का मूड भी बदल सकता है. मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और छत्‍तीसगढ़ में भाजपा सत्ता में है. अगर बजट लोक लुभावन नहीं हुआ तो, सत्ता के हाथों से फिसलने का डर, जरूर पार्टी को सता रहा होगा.


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कर्नाटक की केंद्रीय बजट से ये हैं उम्मीदें, चुनावों पर पड़ सकता है असर


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विजयसारथी.केंद्र सरकार से बजट को लेकर कर्नाटक की उम्मीदें जरूर होंगी. आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मोदी सरकार का रुख देखने वाला होगा. फरवरी में होने वाले चुनावों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि केंद्र का बजट काफी कुछ निर्णायक रहने वाला है. इस साल के केंद्रीय बजट से कर्नाटक को उम्मीद है कि राज्य में चलने वाली इंटरसिटी ट्रेनों को बढ़ाया जाएगा. नए रेल मार्ग खोले जाएंगे. चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो सरकार जरूर ये चाहेगी कि सुपरफास्ट ट्रेंनों की संख्या बढ़ाई जाए. शहरी क्षेत्रों में मेट्रो विनिर्माण पर ध्यान दिया जाए.


उत्तरी कर्नाटक पर हो खास ध्यान
कुदाची-बागलकोट पर नया रूट विकसित किया जाए. होस्पेट-बेंगलूर इंटरसिटी ट्रेनों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान दिया जाए. गुनतकल-बीजापुर-बेल्लरी रूट पर इंटरसिटी ट्रेनों का रेगुलेशन किया जाए.रायचूर में डिविजनल ऑफिस का निर्माण किया जाए.


मलनाड क्षेत्र
शिवमोग्गा होन्नावर रूट पर काम किया जाए. शिवमोग्गा-बेंगलुरु रूट पर ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाए. शिवमोग्गा कदूर और चिकमगलुरु और हासन रूट पर का निर्माण भी बजट की प्राथमिकता हो सकती है.


चिकमगलुरु सकलेशपुर मार्ग के विस्तार पर ध्यान दिया जाए. थैलेचेरी-मैसूर ट्रेन मार्ग का विरोध भी हो रहा है क्योंकि कूर्ग जिले में वन क्षेत्र पड़ता है, जो नए विनिर्माण की वजह से खतरे में पड़ सकता है. सरकार कुछ सुलझा हुआ फैसला इस क्षेत्र में कर सकती है.
मध्य कर्नाटक
हैदराबाद, चित्रदुर्गा और मैसुर को जोड़ने वाले नए रूट को विकसित किया जाए. यशवंतपुर-जोधपुर मार्ग को डी ग्रेड से बी ग्रेड में अपडेट करने की मांग उठ सकती है. हुबली से बेंगलुरु जाने वाली सभी ट्रेनें धारवाड़ से होकर जाएं.


पुराना मैसूर क्षेत्र
मैसूर-दिल्ली स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस की फ्रीक्वेंसी सप्ताह में दो बार की जाए. मुंबई बेंगलुरु उद्यान एक्सप्रेस को बढ़ाकर मैसूर से कनेक्ट किया जाए. वाराणसी से मैसूर को जोड़ा जाए. सेश्रवणबेलगोला के रास्ते हासन और बेंगलुरू के मध्य दौड़ने वाली ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाए.
अब कर्नाटक की अपेक्षाओं पर केंद्र सरकार कहां तक खरा उतरती है यह तो बजट की घोषणा के बाद ही पता चलेगा. लेकिन केंद्र सरकार इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए बजट का आवंटन करती है तो आने वाले विधानसभा चुनावों में सीधा फायदा मिलता नजर आ सकता है.


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पश्चिम बंगाल विधानसभा में बजट पेश, किसानों, महिलाओं, दिव्यांगों को दी गई राहत


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पश्चिम बंगाल विधानसभा में 2018-19 का बजट बुधवार को बजट पेश किया गया. कुल 2,14,958 करोड़ रुपये बजट में कृषि क्षेत्र के लिये कई राहत उपायों की घोषणा की गयी है. वित्त मंत्री अमित मित्रा ने अपने बजट भाषण में ग्रामीण क्षेत्र के लिये स्टांप ड्यूटी शुल्क के भुगतान में राहत, ग्रीन टी पत्तियों पर कृषि कर और उपकर से छूट, किसान पेंशन तथा उनकी सहायता के लिये कोष के गठन की घोषणा की.गरीबों की मदद करना बजट का मुख्य उद्देश्य
बजट पर अपनी प्रतिक्रिया में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि इसमें किये गये प्रस्तावों का मकसद गरीबों की मदद करना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है. राज्य में अगले तीन-चार महीनों में पंचायत चुनाव होने हैं.


महिलाओं पर है खास ध्यानबजट में महिलाओं के लिये कई उपायों की घोषणा की गयी. इसमें कन्याश्री छात्रवृत्ति में वृद्धि तथा रूपश्री योजना के तहत शादी-विवाह के लिये मदद शामिल हैं. इस पर 1,500 करोड़ रुपये का शुरूआती व्यय होगा. सरकार ने दिव्यांगों के लिये पेंशन 750 रुपये मासिक से बढ़ाकर 1,000 रुपये महीना कर दिया है. इससे दो लाख लोगों को लाभ होगा. इस योजना के लिये 250 करोड़ रुपये का निर्धारण किया गया है.


ग्रामीण क्षेत्रों में घटी स्टांप ड्यूटी
बजट में ग्रामीण क्षेत्रों में 40 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये तक की संपत्ति पर स्टांप ड्यूटी 6 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है. शहरी क्षेत्रों के लिये भी स्टांप ड्यूटी 7 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया गया है.


किसानों के लिए अतिरिक्त सहायता कोष
कुल 2,14,958 करोड़ रुपये के बजट में सरकार ने किसानों के लिये 100 करोड़ रुपये का सहायता कोष बनाने का प्रस्ताव किया है. इस कोष में से किसानों को उस समय मदद दी जाएगी जब वे संकट में होंगे. साथ ही किसानों का पेंशन 750 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये मासिक करने का प्रस्ताव है.


मित्रा ने कहा कि माल एवं सेवा कर के प्रतिकूल प्रभाव के बावजूद 8.92 लाख लोगों के लिये रोजगार सृजित किये गये. मुख्यमंत्री ने कहा कि बजट में किये गये प्रस्तावों का मकसद गरीबों की मदद करना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है.


उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि बजट में खेती-बाड़ी पर विशेष जोर दिया गया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि बजट से रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे.


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देश की जांच एजेंसियों का दुरुपयोग होने से भय का माहौल: यशवंत सिन्हा


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राष्ट्रमंच गठित करने वाले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने बगैर नाम लिए केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोलते हुए कहा कि देश में भय का माहौल है. देश की जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है. मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में एनटीपीसी के खिलाफ चल रहे आंदोलन में हिस्सा लेने आए सिन्हा ने बुधवार को जबलपुर में संवाददाताओं से चर्चा करते हुए कहा कि देश की जांच एजेन्सियों का दुरूपयोग किया जा रहा है. एक अलग मानसिकता रखने वालों के खिलाफ जांच एजेन्सियों का उपयोग हो रहा है. जिसके कारण पूरे देश में भय का माहौल है.देश का नागरिक होना भाजपा के सदस्य होने से ऊपर है
उन्होंने कहा कि देश का नागरिक होना भाजपा के सदस्य होने से ऊपर है. देश के नागरिक होने के कारण वह किसानों की लड़ाई लड़ रहे हैं. दिल्ली और भोपाल में बैठे लोग किसानों की जमीनी स्थिति व दशा से अनजान हैं. ऐसा लगता है कि देश में किसानों की किसी को चिंता ही नहीं है.


सरकार की विफलता की क्या है वजहउन्होंने कहा कि सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण में बेरोजगारी, शिक्षा व किसानों की समस्या का उल्लेख किया गया है. यह समस्या एक दिन में तो उत्पन्न नहीं हुई है. इसका स्पष्ट अर्थ है कि पिछले तीन वर्षो में सरकार इन मुद्दो पर विफल रही है.


पार्टी की गलत नीतियों के हैं खिलाफ
पार्टी के विरोध में बयानबाजी करने के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उनका आन्दोलन किसी व्यक्ति व पार्टी के खिलाफ नहीं है. उनका विरोध नीतियों के खिलाफ है, वह पार्टी के सदस्य हैं. वह पार्टी नहीं छोड़ेंगे, पार्टी चाहे तो उन्हें हटा सकती है.


राष्ट्रमंच अराजनैतिक संगठन है
राष्ट्र मंच के संबंध में उन्होंने बताया कि यह एक अराजनैतिक संगठन है. इसमें विभिन्न पार्टी के सदस्य सहित पूर्व मंत्री व सांसद शामिल हैं. यह एक आन्दोलन है, जो देश के किसान, बेरोजगारों के साथ है. सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं के राष्ट्र मंच में शामिल होने के विषय में उन्होंने कहा कि यह एक संवेदनशील मामला है. इसका वह समय आने पर खुलासा करेंगे.


धरना दे रहे किसानों के साथ प्रशासन का व्यवहार अमानवीय
उन्होंने कहा कि नरसिंहपुर के गाडरवारा में एनटीपीसी प्लॉट के खिलाफ धरना दे रहे किसानों के साथ प्रशासन ने अमानवीय व्यवहार किया है. प्रशासन की कार्यवाही का जवाब हम देंगे. उन्होंने कहा कि इसके लिए प्रदेश सरकार भी दोषी है. इस वर्ष मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की हालत पर पूछे गए सवाल पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.


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Union Budget 2018: बनती-बिगड़ती अर्थव्यवस्था के बीच कैसा होगा देश का बजट?


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चुनाव का बजट से बहुत गहरा रिश्ता है. जनता अगर मौजूदा बजट से खुश नहीं है, तो शायद ही सत्तारूढ़ पार्टी को, अपने यहां कमान संभालने की इजाजत दे. केंद्र सरकार के लिए इसलिए 2018-19 का बजट बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है. इस साल राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा लिए गए हर फैसले के मायने बहुत खास साबित होने वाले हैं.एक अनार सौ बीमार
करदाताओं को सरकार से छूट चाहिए. सरकार किसानों की आमदनी दोगुनी करने की जुमलेबाजी पहले कर चुकी है, इसलिए किसानों की उम्मीद भी सरकार से है. केंद्र सरकार द्वारा कई बार युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने की बात कही गई है, इसलिए युवा भी इस उम्मीद में है कि उन्हें रोजगार मिलेगा. विकास का इतना दावा केंद्र सरकार ने किया है कि उस पर विकास की दर और विदेशी निवेश आकर्षित करने का बोझ भी बढ़ गया है. ऐसे में वित्त मंत्री अरुण जेटली के लिए बजट को समावेशी बना पाना
मुश्किल जरूर साबित होने वाला है.लोकसभा चुनावों ने भी आहट दे दी है
2019 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. यह बजट मोदी सरकार के वर्तमान कार्यकाल का आखिरी फुल बजट है. अगर इसे चुनावी बजट कहें तो गलत नहीं होगा. ऐसे में वोटर्स का ध्यान अपनी ओर खींचने की भरपूर कोशिश मोदी सरकार की होगी. अगर प्रधानमंत्री मोदी के हालिया एक टीवी पर दिए गए साक्षात्कार पर गौर करें तो उन्होंने यह संकेत भी दिया है कि यह बजट लोक लुभावन बजट नहीं होगा और सरकार अपने सुधारवादी एजेंडे पर काम करेगी. अगर ऐसा होगा तो वाकई सरकार की यह एक
अच्छी पहल होगी.


राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को कैसे साधेगी पार्टी?
मेघायल, त्रिपुरा, नगालैंड, कर्नाटक और मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. हर पार्टी विस्तार चाहती है, ऐसे में यह बजट इन राज्यों के वोटर्स का मूड भी बदल सकता है. मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और छत्‍तीसगढ़ में भाजपा सत्ता में है. अगर बजट लोक लुभावन नहीं हुआ तो, सत्ता के हाथों से फिसलने का डर, जरूर पार्टी को सता रहा होगा.


करदाताओं की मांग
यह जनता की प्रवृत्ति है कि वह कम टैक्स पर ज्यादा काम चाहती है. अलग-अलग संस्थानों द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि टैक्स पर छूट कम से कम 3 लाख रुपए तक की जाए. नए कर प्रणाली जीएसटी की वजह से अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह उबर नहीं पाई है. मध्यम वर्ग को राहत देना वित्त मंत्रालय की पहली प्राथमिकता हो सकती है. सरकार निवेश पर छूट का दायरा बढ़ा सकती है. बता दें कि 1.5 लाख रुपए तक ही टैक्स से छूट मिलती है.


इन वादों को पूरा किए बिना नहीं आएंगे जनता के अच्छे दिन-
कर में छूट
अतिरिक्त कर देना किसी को नहीं पसंद है. लोग टैक्स बचाने के लिए क्या क्या नहीं करते. यह कहना गलत नहीं होगा कि लोग सरकार भी बदल सकते हैं. यह देखने वाली बात होगी कि टैक्स में किस सीमा तक छूट मिलेगी.


सरकार को सुधारनी होगी स्वास्थ्य स्कीम
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित जन धन योजना से करीब 30 करोड़ और सुरक्षा बीमा योजना से करीब 18 करोड़ लोग जुड़े. इस तरह की योजना से देश की 25 फीसदी आबादी को लाभ पहुंच सकता है, लेकिन इसके लिए सरकार को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन योजनाओं को सरकार लॉन्च कर रही है, उसका क्रियान्वयन किस तरह से सरकार कर पा रही है.
किसानों के लिए ले आएं अच्छे दिन
50 फीसदी से ज्‍यादा आबादी कृषि पर निर्भर है. सरकार बनाने से पहले ही मोदी ने दावा किया था कि उनकी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देगी. अगर सरकारी आंकड़ों और आर्थिक सर्वेक्षणों पर गौर करें तब भी मोदी सरकार इस मसले पर विफल नजर आई.
युवाओं को मिले रोजगार
देश की बड़ी आबादी 35 साल से नीचे के लोगों की है. स्किल डिवेलेपमेंट, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी बातें महज बातें ही न रहें, तो जरूर फायदा हो सकता है लेकिन प्रत्यक्षत: सरकार इस मुद्दे पर बहुत सफल नहीं रही है.
स्टॉक मार्केट को मैनेज करे बजट
कॉरपोरेट टैक्स में कटौती और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स पर मार्केट की नजर है. कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की उम्मीद कम है. लेकिन अगर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स को एक साल से बढ़ाकर 3 साल कर दिया जाता है, तो ये मार्केट के लिए बहुत ज्यादा निगेटिव साबित होगा. हालांकि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगाने के बाद अगर सरकार शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स को हटा दें तो यह मार्केट के लिए पॉजिटिव रहेगा. शेयर बाजार अब काफी महंगे हो चुके हैं. इसलिए मौजूदा स्तर पर एक गिरावट आने की पूरी संभावना है. हालांकि, मार्केट के लिए संकेत पॉजिटिव हैं. फिलहाल मार्केट की नजर बजट पर है. इसके बाद बाजार इस साल 8 राज्यों में होने वाले चुनावों पर फोकस करेगा.
क्या कहती है इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट? 
हर साल जॉब मार्केट में आ रहे लगभग 1.5 करोड़ युवाओं के समक्ष गहराती रोजगार की समस्‍या अब केंद्र सरकार की सबसे बड़ी सरदर्दी बन गई है. हालांकि 29 जनवरी को संसद में पेश आर्थिक सर्वे में इस मामले में सरकार की तरफ से कोई साफ तस्‍वीर नहीं रखी गई. सर्वे में युवाओं को ट्रेनिंग देकर जॉ‍ब के लिए तैयार करने की बात तो जरूरी की गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह ट्रेनिंग किस तरह की होगी और रोजगार के अवसर कहां निकलने जा रहे हैं. सर्वे में यह भी नहीं बताया गया कि फिलहाल कितने लोगों को जॉब की जरूरत है और कहां पर उन्‍हें जॉब मिलेगी. यहां तक कि यह भी साफ नहीं हुआ कि देश में बेरोजगारी है भी या नहीं.
स्किल इंडिया पर फोकस करना जरूरी 
हालांकि इस सर्वे में में सुझाव दिया गया है कि सरकार को मध्‍यम अवधि में शिक्षित और स्‍वस्‍थ लेबर फोर्स तैयार करने की दिशा में काम करना चाहिए. मोदी सरकार को स्किल इंडिया प्रोग्राम पर खास तौर पर फोकस करना चाहिए. इंडस्‍ट्री की यह काफी समय से शिकायत रही है कि भारत के शिक्षा संस्‍थानों से निकलने वाले युवाओं में नौकरी पाने लायक स्किल नहीं होती है.


बेहतर नहीं है आर्थिक विकास की दर 
फाइनेंशिल ईयर 2017-18 में जीडीपी में 6.5 फीसदी की बढ़त स्थिर रह सकती है. यह मोदी सरकार के कार्यकाल का सबसे निचला स्तर होगा. ऐसे में मोदी सरकार के सामने जीडीपी ग्रोथ को सुधारना बड़ी चुनौती है. इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2019 में वित्तीय घाटे (फिस्‍कल डेफिसिट) के लक्ष्य में मामूली बढ़त संभव है.
वित्तीय घाटे से उबरने की चुनौती
सरकार के वित्तीय घाटे का गणित बिगड़ सकता है. सरकार ने हाल में ही जनवरी-मार्च के बीच बाजार से कुल 93 हजार करोड़ रुपये कर्ज लेने का एलान किया. इसका मतलब ये है कि सरकार अपने तय लक्ष्य से 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज लेगी. वित्तीय घाटा बढ़ने की आशंका के सरकार सरकार जनवरी-मार्च में कुल 93000 करोड़ का कर्ज लेगी जिसमें 50000 करोड़ अतिरिक्त कर्ज होगा. सरकार गिल्ट्स के जरिए ये कर्ज लेगी. सरकार मार्च के अंत तक टी-बिल्स घटाएगी. आरबीआई ने कहा है कि सरकार 1.79 लाख करोड़ के टी-बिल्स जारी कर सकती है. जनवरी-मार्च के बीच टी-बिल्स जारी हो सकते हैं.
जनवरी तक कर्ज के हैं ये आंकड़े
सरकार ने 26 दिसंबर तक 5.21 लाख करोड़ रुपये का ग्रॉस मार्केट कर्ज लिया है. 26 दिसंबर तक सरकार का नेट मार्केट कर्ज 3.81 लाख करोड़ रुपये रहा है. जानकारों के मुताबिक ज्यादा उधारी का मतलब ये हैं कि 3.2 फीसदी वित्तीय घाटे का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल होगा. वित्तीय घाटे में 0.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी संभव है. इससे आरबीआई द्वारा रेपो की दरों में कटौती की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी. जीएसटी में टैक्स छूट में अब कमी संभव नहीं होगी. इसके साथ ही अब जीएसटी में टैक्स चोरी पर सख्ती हो सकती है. सरकार पर कमाई बढ़ाने और खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ेगा.
क्रूड ऑयल की कीमतें
मोदी सरकार के लिए क्रूड की कीमतें किसी समस्या से कम नहीं. इकोनॉमिक सर्वे में भी फाइनेंशियल ईयर 2018-19 में क्रूड की कीमतों में 12% बढ़ोत्तरी का अनुमान जताया गया है. इससे साफ है कि अगर ऐसा होता है तो यह इकोनॉमी के लिए नुकसानदेह साबित होगा. मौजूदा ब्रेंट क्रूड की कीमतें 70 से 71 डॉलर के बीच हैं. ऐसे में अगर 12 फीसदी कीमतें और बढ़ती हैं तो ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. इससे महंगाई और बढ़ सकती है.
अरुण जेटली का बजट कितना समावेशी होगी यह तो बजट लॉन्च होने के बाद ही पता चलेगा लेकिन उनकी मुश्किलों का अंदाजा काफी पहले ही हो रहा है.


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