READ MOREचुनाव का बजट से बहुत गहरा रिश्ता है. जनता अगर मौजूदा बजट से खुश नहीं है, तो शायद ही सत्तारूढ़ पार्टी को, अपने यहां कमान संभालने की इजाजत दे. केंद्र सरकार के लिए इसलिए 2018-19 का बजट बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है. इस साल राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा लिए गए हर फैसले के मायने बहुत खास साबित होने वाले हैं.एक अनार सौ बीमार
करदाताओं को सरकार से छूट चाहिए. सरकार किसानों की आमदनी दोगुनी करने की जुमलेबाजी पहले कर चुकी है, इसलिए किसानों की उम्मीद भी सरकार से है. केंद्र सरकार द्वारा कई बार युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने की बात कही गई है, इसलिए युवा भी इस उम्मीद में है कि उन्हें रोजगार मिलेगा. विकास का इतना दावा केंद्र सरकार ने किया है कि उस पर विकास की दर और विदेशी निवेश आकर्षित करने का बोझ भी बढ़ गया है. ऐसे में वित्त मंत्री अरुण जेटली के लिए बजट को समावेशी बना पाना
मुश्किल जरूर साबित होने वाला है.लोकसभा चुनावों ने भी आहट दे दी है
2019 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. यह बजट मोदी सरकार के वर्तमान कार्यकाल का आखिरी फुल बजट है. अगर इसे चुनावी बजट कहें तो गलत नहीं होगा. ऐसे में वोटर्स का ध्यान अपनी ओर खींचने की भरपूर कोशिश मोदी सरकार की होगी. अगर प्रधानमंत्री मोदी के हालिया एक टीवी पर दिए गए साक्षात्कार पर गौर करें तो उन्होंने यह संकेत भी दिया है कि यह बजट लोक लुभावन बजट नहीं होगा और सरकार अपने सुधारवादी एजेंडे पर काम करेगी. अगर ऐसा होगा तो वाकई सरकार की यह एक
अच्छी पहल होगी.
राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को कैसे साधेगी पार्टी?
मेघायल, त्रिपुरा, नगालैंड, कर्नाटक और मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. हर पार्टी विस्तार चाहती है, ऐसे में यह बजट इन राज्यों के वोटर्स का मूड भी बदल सकता है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा सत्ता में है. अगर बजट लोक लुभावन नहीं हुआ तो, सत्ता के हाथों से फिसलने का डर, जरूर पार्टी को सता रहा होगा.
करदाताओं की मांग
यह जनता की प्रवृत्ति है कि वह कम टैक्स पर ज्यादा काम चाहती है. अलग-अलग संस्थानों द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि टैक्स पर छूट कम से कम 3 लाख रुपए तक की जाए. नए कर प्रणाली जीएसटी की वजह से अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह उबर नहीं पाई है. मध्यम वर्ग को राहत देना वित्त मंत्रालय की पहली प्राथमिकता हो सकती है. सरकार निवेश पर छूट का दायरा बढ़ा सकती है. बता दें कि 1.5 लाख रुपए तक ही टैक्स से छूट मिलती है.
इन वादों को पूरा किए बिना नहीं आएंगे जनता के अच्छे दिन-
कर में छूट
अतिरिक्त कर देना किसी को नहीं पसंद है. लोग टैक्स बचाने के लिए क्या क्या नहीं करते. यह कहना गलत नहीं होगा कि लोग सरकार भी बदल सकते हैं. यह देखने वाली बात होगी कि टैक्स में किस सीमा तक छूट मिलेगी.
सरकार को सुधारनी होगी स्वास्थ्य स्कीम
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित जन धन योजना से करीब 30 करोड़ और सुरक्षा बीमा योजना से करीब 18 करोड़ लोग जुड़े. इस तरह की योजना से देश की 25 फीसदी आबादी को लाभ पहुंच सकता है, लेकिन इसके लिए सरकार को पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन योजनाओं को सरकार लॉन्च कर रही है, उसका क्रियान्वयन किस तरह से सरकार कर पा रही है.
किसानों के लिए ले आएं अच्छे दिन
50 फीसदी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है. सरकार बनाने से पहले ही मोदी ने दावा किया था कि उनकी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देगी. अगर सरकारी आंकड़ों और आर्थिक सर्वेक्षणों पर गौर करें तब भी मोदी सरकार इस मसले पर विफल नजर आई.
युवाओं को मिले रोजगार
देश की बड़ी आबादी 35 साल से नीचे के लोगों की है. स्किल डिवेलेपमेंट, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी बातें महज बातें ही न रहें, तो जरूर फायदा हो सकता है लेकिन प्रत्यक्षत: सरकार इस मुद्दे पर बहुत सफल नहीं रही है.
स्टॉक मार्केट को मैनेज करे बजट
कॉरपोरेट टैक्स में कटौती और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स पर मार्केट की नजर है. कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की उम्मीद कम है. लेकिन अगर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स को एक साल से बढ़ाकर 3 साल कर दिया जाता है, तो ये मार्केट के लिए बहुत ज्यादा निगेटिव साबित होगा. हालांकि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगाने के बाद अगर सरकार शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स को हटा दें तो यह मार्केट के लिए पॉजिटिव रहेगा. शेयर बाजार अब काफी महंगे हो चुके हैं. इसलिए मौजूदा स्तर पर एक गिरावट आने की पूरी संभावना है. हालांकि, मार्केट के लिए संकेत पॉजिटिव हैं. फिलहाल मार्केट की नजर बजट पर है. इसके बाद बाजार इस साल 8 राज्यों में होने वाले चुनावों पर फोकस करेगा.
क्या कहती है इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट?
हर साल जॉब मार्केट में आ रहे लगभग 1.5 करोड़ युवाओं के समक्ष गहराती रोजगार की समस्या अब केंद्र सरकार की सबसे बड़ी सरदर्दी बन गई है. हालांकि 29 जनवरी को संसद में पेश आर्थिक सर्वे में इस मामले में सरकार की तरफ से कोई साफ तस्वीर नहीं रखी गई. सर्वे में युवाओं को ट्रेनिंग देकर जॉब के लिए तैयार करने की बात तो जरूरी की गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह ट्रेनिंग किस तरह की होगी और रोजगार के अवसर कहां निकलने जा रहे हैं. सर्वे में यह भी नहीं बताया गया कि फिलहाल कितने लोगों को जॉब की जरूरत है और कहां पर उन्हें जॉब मिलेगी. यहां तक कि यह भी साफ नहीं हुआ कि देश में बेरोजगारी है भी या नहीं.
स्किल इंडिया पर फोकस करना जरूरी
हालांकि इस सर्वे में में सुझाव दिया गया है कि सरकार को मध्यम अवधि में शिक्षित और स्वस्थ लेबर फोर्स तैयार करने की दिशा में काम करना चाहिए. मोदी सरकार को स्किल इंडिया प्रोग्राम पर खास तौर पर फोकस करना चाहिए. इंडस्ट्री की यह काफी समय से शिकायत रही है कि भारत के शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले युवाओं में नौकरी पाने लायक स्किल नहीं होती है.
बेहतर नहीं है आर्थिक विकास की दर
फाइनेंशिल ईयर 2017-18 में जीडीपी में 6.5 फीसदी की बढ़त स्थिर रह सकती है. यह मोदी सरकार के कार्यकाल का सबसे निचला स्तर होगा. ऐसे में मोदी सरकार के सामने जीडीपी ग्रोथ को सुधारना बड़ी चुनौती है. इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2019 में वित्तीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) के लक्ष्य में मामूली बढ़त संभव है.
वित्तीय घाटे से उबरने की चुनौती
सरकार के वित्तीय घाटे का गणित बिगड़ सकता है. सरकार ने हाल में ही जनवरी-मार्च के बीच बाजार से कुल 93 हजार करोड़ रुपये कर्ज लेने का एलान किया. इसका मतलब ये है कि सरकार अपने तय लक्ष्य से 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज लेगी. वित्तीय घाटा बढ़ने की आशंका के सरकार सरकार जनवरी-मार्च में कुल 93000 करोड़ का कर्ज लेगी जिसमें 50000 करोड़ अतिरिक्त कर्ज होगा. सरकार गिल्ट्स के जरिए ये कर्ज लेगी. सरकार मार्च के अंत तक टी-बिल्स घटाएगी. आरबीआई ने कहा है कि सरकार 1.79 लाख करोड़ के टी-बिल्स जारी कर सकती है. जनवरी-मार्च के बीच टी-बिल्स जारी हो सकते हैं.
जनवरी तक कर्ज के हैं ये आंकड़े
सरकार ने 26 दिसंबर तक 5.21 लाख करोड़ रुपये का ग्रॉस मार्केट कर्ज लिया है. 26 दिसंबर तक सरकार का नेट मार्केट कर्ज 3.81 लाख करोड़ रुपये रहा है. जानकारों के मुताबिक ज्यादा उधारी का मतलब ये हैं कि 3.2 फीसदी वित्तीय घाटे का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल होगा. वित्तीय घाटे में 0.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी संभव है. इससे आरबीआई द्वारा रेपो की दरों में कटौती की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी. जीएसटी में टैक्स छूट में अब कमी संभव नहीं होगी. इसके साथ ही अब जीएसटी में टैक्स चोरी पर सख्ती हो सकती है. सरकार पर कमाई बढ़ाने और खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ेगा.
क्रूड ऑयल की कीमतें
मोदी सरकार के लिए क्रूड की कीमतें किसी समस्या से कम नहीं. इकोनॉमिक सर्वे में भी फाइनेंशियल ईयर 2018-19 में क्रूड की कीमतों में 12% बढ़ोत्तरी का अनुमान जताया गया है. इससे साफ है कि अगर ऐसा होता है तो यह इकोनॉमी के लिए नुकसानदेह साबित होगा. मौजूदा ब्रेंट क्रूड की कीमतें 70 से 71 डॉलर के बीच हैं. ऐसे में अगर 12 फीसदी कीमतें और बढ़ती हैं तो ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है. इससे महंगाई और बढ़ सकती है.
अरुण जेटली का बजट कितना समावेशी होगी यह तो बजट लॉन्च होने के बाद ही पता चलेगा लेकिन उनकी मुश्किलों का अंदाजा काफी पहले ही हो रहा है.
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