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क्या गांधीजी को मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था? शायद उन्हें लगने लगा था कि उनकी हत्या हो सकती है. मृत्यु से पहले से वो लगातार इस बारे में बातें करने लगे थे. वह 79 वर्ष के हो चुके थे. देश आजाद होने वाला था. विभाजन तय हो चुका था. नोआखली में दंगे भड़के हुए थे. गांधी जी डरने लगे थे कि कहीं जीवनभर की मेहनत बेकार न चली जाए. उन्होंने नोआखली में सहयोगी निर्मल बोस से कहा, “मैं असफल होकर नहीं मरना चाहता, सफल व्यक्ति के रूप में दुनिया से विदा लेना चाहता हूं.”‘द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी’ के लेखक रॉबर्ट पेन ने लिखा, “हत्या से पहले एक महीने के दौरान उन्होंने इतनी बार अपनी मृत्यु की बातें कीं कि सहयोगी भी हैरान हो गए कि वह लगातार क्यों ऐसा कह रहे हैं.” उन्होंने यहां तक कहा, “उनकी हत्या किसी हिन्दू के हाथों हो सकती है, क्योंकि मुसलमानों को उनकी हत्या से कोई फायदा नहीं मिलने वाला.” नोआखली में उन्होंने मौत को काफी निकटता से महसूस किया था.
चाहता हूं कर्तव्य का पालन करते हुए मरूं
नोआखली में हर सुबह करीब साढ़े सात बजे गांधी जी की यात्रा शुरू हो जाती थी, यानि वो पैदल ही एक गांव से दूसरे गांव चल देते थे. कई बार उनके पैरों से खून भी निकलने लगता था. इन्हीं दिनों उन्होंने एक मित्र को पत्र लिखा-“मैं कहना चाहूंगा कि अपने कर्तव्य का पालन करते-करते मरूं.”

फाइल फोटो
डरावने सपने दिखने लगे थे
आजादी के बाद जब देश के दो टुकड़े हो चुके थे, तब देश में फिर दंगे भड़क उठे. कोलकाता में शांति स्थापित करके गांधी जी दिल्ली पहुंचे तो ये मुर्दों, बेघरों और लुटे हुए लोगों का शहर बन चुकी थी. उन्हें बिडला हाउस में ठहराया गया. इन दिनों डरावने सपने उन्हें परेशान करने लगे थे. राबर्ट पेन लिखते हैं, “सपनों में वो अपने आपको आतंकी युवाओं की भीड़ के बीच खड़ा पाते. एक बार उन्होंने सपने में बा को देखा, वो उनके कमरे में ही थीं और उन्हें घूर रही थीं.” 09 जनवरी 1948 को उन्होंने कहा, “मेरी भगवान से प्रार्थना है कि मेरी मृत्यु वीरतापूर्वक हो, यदि ऐसा हुआ तो वो मेरी जीत होगी.”
बर्फीली ठंड में बाहर बिस्तर
13 जनवरी को गांधी जी अपने जीवन का अंतिम अनशन शुरू किया. वह जीवन और मृत्यु से उसके उच्चतम स्तर पर खेल रहे थे. समय समय पर वह मृत्यु के बारे में भी चर्चा कर रहे थे. अपनी तुलना ऐसे व्यक्ति से कर रहे थे, जो असाध्य बीमारियों से पीड़ित हो. धीरे धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहा हो. वो खुद को मरने के लिए तत्पर इंसान के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे. जनवरी में यूं भी दिल्ली का मौसम बेहद सर्द होता है और रातें बर्फीली. इस मौसम में भी अनशन के दौरान उन्होंने अपना बिस्तर बाहर बगीचे में लगवा दिया था.
हत्या की कोशिश होने लगी थी
17 जनवरी को उन्होंने अनशन खत्म किया. उसके बाद एक दिन जब वह सुबह प्रार्थनासभा कर रहे थे तभी अचानक वहां एक विस्फोट हुआ. भीड़ में डर और घबराहट फैल गई. उन्होंने धमाके से डर गईं मनुबेन से कहा, “तुम तब क्या करोगी अगर कोई सचमुच तुम्हें या मुझे आकर गोली मार दे.” गांधी जी को आभास हो गया था कि ये उन्हें मार डालने का असफल प्रयास था. पूरे दिन गांधी जी के साथ रहने वाले बृजलाल चांदीवाला ने लिखा, “मैने ध्यान दिया कि गांधी जी दिन पर दिन जीवन के प्रति अपनी रुचि खोते जा रहे थे.”

फाइल फोटो
मेरे मुंह से अंतिम शब्द राम राम निकलें
जीवन के आखिरी दिनों में गांधी जी कई स्तरों पर जी रहे थे. एक ओर अपनी हिंसक हत्या के प्रति उदासीन थे तो दूसरी ओर ये विचार उन पर हावी भी रहता था. गांधी जी जानते थे कि किसी भी क्षण कोई दूसरा बारूदी विस्फोट या हथगोले से हमला हो सकता है. विस्फोट के दो दिन बाद यानि 22 जनवरी को उन्होंने मनुबेन को पास बिठाया और कहने लगे, “मेरी कामना है कि मैं हत्यारों की गोलियां झेलता हुआ तुम्हारी गोद में मरूं,मेरे मुंह से राम-नाम का जाप हो रहा हो और चेहरे पर मुस्कुराहट हो.” गांधी जी हत्या हुई तो बिल्कुल ऐसा ही हुआ-जैसे वो पहले से जानते रहे हों कि क्या होना है.
राजकुमारी अमृत कौर से क्या कहा
24 जनवरी को उन्होंने राजकुमारी अमृत कौर से कहा, “यदि मुझको किसी सनकी की गोलियों से ही मरना है तो मुझे ये हंसते हुए करना होगा, उसके प्रति मेरे मन में कोई घृणा या क्रोध नहीं होना चाहिए. मेरे हृदय और ओठों पर ईश्वर विराजमान होना चाहिए. यदि कुछ होता है तो तुम एक भी आंसू नहीं बहाओगी.”

फाइल फोटोgan
निधन से पहले की रात भी मृत्यु की बात
निधन से एक दिन पहले की रात जब मनुबेन उनके सर की मालिश कर रही थीं तब गांधी जी ने फिर मृत्यु के बारे में चर्चा की. गांधी जी बहुत गंभीरता से कह रहे थे, “यदि मैं किसी लंबी बीमारी या किसी छोटी सी चोट से मर जाऊं तो तुम चिल्ला चिल्लाकर पूरे संसार को बता देना कि मैं एक झूठा महात्मा था. अगर पहले जैसा विस्फोट दोबारा होता है या कोई मुझे गोली मार देता है और उसकी गोलियां मैं अपनी वस्त्र विहीन छाती पर झेलता हूं, मेरे मुंह से आह के स्थान पर राम का नाम निकले, केवल तब तुम समझना कि मैं सच्चा महात्मा हूं. गांधी जी ने ये शब्द रात को दस बजे कहे और एक घंटे बाद सो गए.”अगले दिन फिर उनकी हत्या हो गई.
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