Monday, 29 January 2018

इन वजहों से एक साथ नहीं हो सकते लोकसभा-विधानसभा चुनाव


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लोकसभा चुनावों में सिर्फ एक साल बचा है. मोदी सरकार अपना आखिरी आम बजट भी जारी करने जा रही है. सोमवार को संसद में अभिभाषण देते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने पर जोर दिया. राष्ट्रपति के मुताबिक, बार-बार चुनाव होने से विकास की रफ्तार में बाधा आती है, क्योंकि अधिकारियों को चुनावों में हाथ बटांना पड़ता है. लेकिन, मौजूदा हालात को देखते हुए लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की संभावना काफी कम है.पीएम मोदी कई बार कह चुके हैं कि चुनावी खर्चों और साल दर साल चुनावी मूड में रहने के कारण सरकार सुधार प्रक्रिया जारी नहीं रख पाती. सरकारें बदली नहीं कि नीतियां बदल जाती हैं. 1951 से 1967 तक एक साथ चुनावी प्रक्रिया जारी रही थी, लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव पहले करवा लिए, जिसके बाद पूरी व्यवस्था ही बदलती चली गई.


इसलिए पीएम मोदी ने एक साथ चुनाव कराने का ये शगूफा छेड़ा है. चुनाव आयोग ने भी संकेत दे दिए हैं कि अगर सभी दल चाहें, तो एक साथ चुनाव प्रक्रिया पूरी की जा सकती है.


यहां तक की संघ से जुडी मुंबई की रामभाऊ म्हालगी ने भी इस मुद्दे पर राष्ट्रीय परिचर्चा आयोजित की है, जिसमें तमाम दलों के लोगों को बुलाया गया है. देखने वाली बात होगी कि कौन सी पार्टियां इसमें शामिल होती हैं? लेकिन, इतना तो तय है कि इस वक्त जब बीजेपी एक के बाद एक चुनावी जीत हासिल करती जा रही है, ऐसे में कांग्रेस समेत कोई भी दल एक साथ चुनावों पर सहमति नहीं जताएगा.बीजेपी के लिए ‘पैंडुलम स्टेट’ है राजस्थान
इस साल तीन बीजेपी शासित राज्यों में चुनाव हैं. इसमें राजस्थान ‘पैंडुलम स्टेट’ माना जाता रहा है, क्योंकि हर पांच साल बाद यहां सरकार बदल जाती है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल से बीजेपी की सरकार है, जहां विरोधी लहर का असर हो सकता है. इसलिए राजनीतिक पंडितों के साथ-साथ विपक्ष को भी लग रहा है कि लोक लुभावन बजट और ऐलानों के बाद सरकार जल्दी चुनाव कराने के मूड में है.


बीजेपी का मूड जो भी हो, लेकिन एक बात तो साफ है कि जीएसटी और नोटबंदी का असर गुजरात में मोदी सरकार देख चुकी है. पीएम मोदी जानते हैं कि अगले साल तक सरकार के कड़े फैसलों का सकारात्मक असर शुरू हो जाएगा. इसलिए आम चुनावों की तारीखें बदलने के आसार कम ही नजर आ रहे हैं.


मोदी-शाह कभी नहीं रहे जल्द चुनाव कराने के पैरोकार
सूत्रों की मानें, तो न तो पीएम मोदी और न ही अमित शाह वक्त से पहले चुनाव कराने के पैरोकार रहे हैं. उनका मानना है कि जब जनता ने उन्हें 5 सालों के लिए चुन कर भेजा है, तब वक्त से पहले चुनावों का कोई मतलब नहीं है. बीजेपी के शीर्ष पदस्थ सूत्र बताते हैं कि बहस इस बात पर हो रही है कि सभी चुनाव एक साथ कैसे संभव होंगे?


हकीकत तो यही है कि अगर मौजुदा हालात में 18 बीजेपी शासित राज्य भी साथ चुनावों के लिए तैयार हो जाएं, तो बाकी राज्यों की सहमति मिलना आसान नहीं है. चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त कर चुनाव कराने से तो किरकिरी ही होगी.


फिलहाल, पार्टी आलाकमान और पीएम मोदी की नजर कर्नाटक और पूर्वोत्तर के तीन राज्यों मे हो रहे विधानसभा चुनावों पर है. इसलिए सरकार और पार्टी की पूरी ताकत इन राज्यों पर ही लगी है.


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Article source: http://hindi.news18.com/news/sports/cricket/bcci-is-following-the-right-process-says-virat-kohli-on-anil-kumble-s-contract-999349.html

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