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मन चंगा तो कठौती में गंगा. यह उक्ति है प्रसिद्ध संत रविदास की. उत्तर भारत में 15 से 16वीं शताब्दी के बीच भक्ति आंदोलन का दौर चला. इस दौर में रविदास अपनी सादगी और कविता की वजह से इतने प्रसिद्ध हुए कि लोगों ने उन्हें संत की उपाधि दे दी. संत रविदास को कई जगह रैदास नाम से संबोधित किया गया है. कई विद्वानों का मानना है कि संत रैदास का जन्म 31 जनवरी, 1433 ईस्वी में, माघ पूर्णीमा के दिन हुआ था. अपनी रचनाओं के माध्यम से संत रविदास ने न केवल सामाजिक समता को बढ़ावा दिया बल्कि उस समय में व्याप्त बुराइयों पर भी खूब लिखा.
ऐसे संत जो व्यावहारिक दर्शन पर विश्वास करते थे
संत कबीर की ही तरह रैदास भी जनवाणी में लिखने वाले संत थे. यह भक्ति काल की विशेषता रही है कि कवियों ने वही लिखा जो उस युग की प्रचलित भाषा थी. ऐसा लोग कहते हैं कि रविदास ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखा के बीच पुल की तरह थे. उनकी रचनाओं में एक ओर जहां अबूझ दर्शन होता था वहीं आसानी से समझ में आ जाने वाला सरल काव्य भी होता था.गुरुभाई थे कबीर संत रविदास कबीर के गुरुभाई थे. दोनों ही स्वामी रामानन्द के शिष्य थे. संत रविदास व्यवहारिक दर्शन पर विश्वास करने वाले व्यक्ति थे. संत होते हुए भी वह अपने गृहस्थ जीवन का पालन करते थे.
संत रविदास का जन्म रग्घू और घुरविनिया दंपति के यहां हुआ. रविदास के पिता मोची थे. बड़े होकर संत रविदास ने भी पैतृक व्यवसाय चुना. रविदास को काम पूजा की तरह लगता था. प्रसिद्धि बढ़ने पर भी उन्होंने कभी अपने व्यवसाय से समझौता नहीं किया. उनके मधुर व्यवहार की वजह से जो भी मिलता बिना उनसे प्रभावित हुए नहीं रह पाता.
जब पिता ने घर से निकाला
रविदास इतने दयालु और परोपकारी थे कि साधू संतों को वह बिना मूल्य के जूते भेंट कर देते थे. उनके पिता को यह बात खटकती थी. एक दिन तंग आकर उनके पिता ने उन्हें पत्नी सहित घर से निकाल दिया. फिर क्या पड़ोस में ही रविदास ने एक कुटिया बनाई और अपने काम के साथ जनसेवा करते रहे.
मन चंगा तो कठौती में गंगा
रविदास के बारे में एक किस्सा बहुत प्रसिद्ध है, एक बार रैदास के शिष्य उनसे गंगा स्नान पर चलने के लिए जिद करने लगे. गंगा स्नान का पर्व था तो शिष्यों की जिद वाजिब भी थी. रविदास ने अपने शिष्यों से कहा कि एक व्यक्ति को मैंने जूते बनाकर देने का वचन दे रखा है. अगर जूते समय से तैयार नहीं हुए तो वचन भंग होगा. काम न कर पाने की वजह से मेरा मन तो यहीं लगा रहेगा. इसलिए जिस काम के लिए मन न तैयार हो उसे नहीं करना चाहिए. और वैसे भी मन चंगा तो कठौती में गंगा.
एक किवदंति भी रैदास के बारे में प्रचलित है कि किसी महिला की अंगूठी गंगा स्नान के समय नदी में गिर गई थी. वह रोती हुई रविदास के पास आई और बताने लगी कि उसकी अंगूठी गंगा में गिर गई. रविदास ने अपनी कठौती में से अंगूठी निकाल कर महिला को दिखाया कि देखो यही तो नहीं. महिला चौंक गई. उसने कहा कि हां यही है. फिर यहीं से कहावत प्रचलित हो गई मन चंगा तो कठौती में गंगा.
ईश्वर भेदभाव नहीं करते
संत रविदास मानते थे कि भगवान एक ही हैं. फिर चाहे उन्हें राम कहो या रहीम. हिंदू-मुसलमान सब एक ही ईश्वर की उपासना करते हैं. तभी तो उन्होंने लिखा-
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा,
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा.
रविदास किसी एक वर्ग के संत नहीं थे. सभी वर्गों के लोग संत रविदास को आध्यात्मिक गुरु के तौर पर अपनाने लगे. तभी तो ऐसी जनश्रुति है कि मीरा भी उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानने लगीं.
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की,
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की.
रविदास को जाति-पाति से कोई मतलब न थे. उनके लिए सब एक समान थे. तभी तो उन्होंने लिखा कि-
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात.
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात.
आज के समय में रविदास और उनकी दी हुई शिक्षा बहुत प्रासंगिक है. उनकी दी हुई शिक्षाओं को अगर आज का समाज अपना ले तो सामाजिक विषमताएं कभी न बढ़ें.
Article source: http://hindi.news18.com/news/bihar/bhagalpur/fifty-six-years-old-man-did-not-have-hair-cut-from-twenty-four-years-963877.html
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