Friday, 1 June 2018

किसान आंदोलन: पंजाब कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने किया किसान हड़ताल का समर्थन


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पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू किसान आंदोलन के समर्थन में आ गए हैं. पूर्व क्रिकेटर सिद्धू फतेहगढ़ साहिब के एक गांव में पहुंचे और गांव में किसान से सब्जियां और दूध खरीदा. इस दौरान नवजोत सिंह सिद्धू ने सब्जियों और दूध के लिए दो हाजर रुपए का भुगतान भी किया. दरअसल पंजाब में भी किसान शुक्रवार से 10 दिन की छुट्टी पर चले गए हैं. किसान 1 से 10 जून तक शहरों में फल-सब्जियों और दूध की सप्लाई नहीं करेंगे.अधिकतर जगहों पर किसान शुक्रवार को शहरों में दूध और सब्जियां लेकर नहीं आए. किसानों ने ऐलान किया कि शहर के लोग गांव में आकर दूध और सब्जियां खरीद सकते हैं. इसी क्रम में किसानों के आंदोलन का समर्थन करने के लिए पंजाब के स्‍थानीय निकाय मंत्री नवजाेत सिंह सिद्धू एक गांव में पहुंचे और एक किसान से दूध आैर सब्जियां खरीदीं.


किसानों ने 1 से 10 जून तक शहरों में दूध और सब्जियों की सप्‍लाई रोकने के साथ ही शहर की दुकानों, शोरूम और सुपर बाजार का रुख नहीं करने का भी निर्णय किया है. किसानों ने कहा है कि अगर शहरी के लोगों को फल-दूध या सब्जी चाहिए तो उन्हें गांवों का रुख करना पड़ेगा.

'सब्‍जी या दूध के बिना कोई मरेगा नहीं लेकिन किसान ने खेती बंद कर दी तो क्‍या होगा'


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राष्‍ट्रीय मजदूर किसान संघ के अध्‍यक्ष शिवकुमार शर्मा ‘कक्‍काजी’ ने लोगों से किसानों की हालत को लेकर गंभीरता से सोचने को कहा. उन्‍होंने शुक्रवार से शुरू हुई किसानों की 10 दिन की हड़ताल पर माफी मांगते हुए लोगों से कहा कि सोचिए यदि किसान फसल उगाना बंद कर देगा तो क्‍या होगा. बता दें कि किसानों ने एक से 10 जून तक गांवों से शहरों में दूध और सब्जियों की आपूर्ति बंद करने का फैसला किया है. इस हड़ताल में मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र,पंजाब, राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और छत्‍तीसगढ़ के किसान शामिल हैं.पत्रकारों से बातचीत में कक्‍काजी ने कहा कि 46 हजार किसानों की मौत जनता की परेशानी से ज्‍यादा गंभीर मसला है. उन्‍होंने कहा, ‘दूध या सब्जियों के बिना किसी की मौत नहीं होगी लेकिन मामले की गंभीरता को समझिए यदि हमने फसलें उगाना शुरू कर दिया तो क्‍या होगा. इससे पहले किसानों के 110 संगठन हमारे प्रदर्शन को समर्थन दे रहे थे लेकिन अब बीजेपी के सहयोगी एक-दो संगठनों को छोड़कर बाकी सब हमारे साथ हैं.’


यह प्रदर्शन मध्‍य प्रदेश के मंदसौर में पिछले साल हुए किसानों के आंदोलन की पहली बरसी पर हो रहा था. इस आंदोलन में छह मई 2017 को पुलिस गोलीबारी में छह किसानों की जान गई थी. 2017 में हुए किसान आंदोलन का नेतृत्‍व भी कक्‍काजी ने ही किया था.उन्‍होंने कहा कि एमएसपी की कमी, खराब मौसम, मंडियों में बिचौलिए, कीमतों में कमी और बीमा में गड़बडी से मध्‍य प्रदेश के किसान परेशान हैं. इस साल फरवरी में सरकारी एजेंसियों को चना खरीदना था लेकिन इसकी खरीद मई में जाकर हुई. उन्‍होंने आरोप लगाया कि कड़ी धूप में फसल बेचने के इंतजार में पांच किसानों की मंडी में मौत हो गई. बकौल कक्‍काजी, ‘इस बार हम गांव बंद प्रदर्शन पर डटे हुए हैं और इस दौरान कुछ भी अप्रिय होता है तो इसके जिम्‍मेदार मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान होंगे.’


शिवराज के कार्यकाल पर तीखा हमला बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि बीजेपी के 15 साल के शासन में किसानों का एक लाख रुपये का लोन 15 लाख रुपये तक पहुंच गया.


हम उत्‍पादन पर डेढ़ गुना कीमत, एक बार में कर्ज माफी, छोटे किसानों को तय कमाई और प्‍याज, आलू, लहसुन, दूध और सब्जियों को समर्थन मूल्‍य के दायरे में लाने की मांग करते हैं.


उन्‍होंने कहा कि किसी भी राजनेता को प्रदर्शन का श्रेय नहीं लेने दिया जाएगा लेकिन राजनीतिक दल इसका समर्थन करने को आजाद हैं. यदि मांगें नहीं मानी गई तो 11 जून की बैठक में राष्‍ट्रीय मजदूर किसान संघ भविष्‍य की योजना पर फैसला लेगा.


किसानों के प्रदर्शन के पहले दिन नीमच और मंदसौर में हालात सामान्‍य रहे. यहां पर दूध, सब्‍जी और फलों की सप्‍लाई आंशिक रूप से प्रभावित हुई. पुलिस ने कस्बों और हाइवे पर कड़ी निगरानी रखी. यह दोनों शहर पिछले साल हुए किसान आंदोन के केंद्र में थे. देवास में दूध सप्‍लाई पर असर पड़ा लेकिन दूध प्‍लांटों ने कमी की भरपाई कर दी और पुलिस सुरक्षा में दूध के टैंकर गांवों में भेजे गए. मालवा-निमाड़ इलाके में सब्जियों के दामों में कमी आई, यहां पर पिछले कुछ दिनों में सब्‍जी के दाम बढ़ गए थे.

मुंबई के सिंधिया हाउस में लगी आग, 5 लोगों के फंसे होने की आशंका


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मुंबई के सिंधिया हाउस की तीसरे मंजिल पर आग लग गई है. इस फ्लोर पर इनकम टैक्स इंवेस्टिगेशन का ऑफिस है. आग लगने की सूचना के साथ ही बिल्डिंग से लोगों को बाहर निकाला गया हालांकि वहां अब भी पांच लोगों के फंसे होने की आशंका है. फायर ब्रिगेड की पांच गाड़ियां आग लगाने की कोशिश में जुट गई हैं.बताया जा रहा है कि आग फैलकर चौथी मंजिल पर भी पहुंच गई है. कुछ लोग आग से बचने के लिए छत पर पहुंच गए हैं.


बताया जा रहा है कि इस ऑफिस में देश के कई अहम और चर्चित केसों के दस्तावेज भी हैं. नीरव मोदी, विजय माल्या और आईपीएल केस से संबंधित कई जरूरी दस्तावेज इसी बिल्डिंग में हैं. घटना के विस्तृत ब्यौरे की प्रतीक्षा है. दमकल विभाग मौके पर पहुंच गया है.

बसपा के 'हाथी' से 'हाथ' मिलाने को बेचैन क्यों है कांग्रेस?


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उप चुनावों में ‘गठबंधन’ के सुखद परिणाम देखते हुए कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है. कांग्रेस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा से हाथ मिलाकर भाजपा को सत्ता से बेदखल करना चाहती है. क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले इन राज्यों को जीतना उसके लिए जीने-मरने का सवाल है. संभावना है कि इन राज्यों के विधानसभा चुनाव में दोनों मिलकर लड़ें. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जब बसपा का ‘हाथी’ और कांग्रेस का ‘हाथ’ साथ-साथ आएंगे तो क्या होगा?दरअसल, यूपी से बाहर इन तीनों राज्यों में बसपा का अच्छा जनाधार माना जाता है. उसकी वजह वहां की दलित आबादी है. मायावती ऐसी दलित नेता मानी जाती हैं जिनके इशारे पर ये वोटबैंक शिफ्ट हो सकता है. मध्य प्रदेश में 15.6, राजस्थान में 17.83 और छत्तीसगढ़ में 11.6 फीसदी दलित आबादी है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में तो बसपा राजनीतिक समीकरण बिगाड़ने की हैसियत रखती है.


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मध्य प्रदेश में एक बार में बसपा के 11 और राजस्थान 6 विधायक रह चुके हैं, जबकि मायावती ने अपना पूरा ध्यान यूपी पर लगा रखा है. ऐसे में इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन बसपा-कांग्रेस दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन होता है तो संभावना इसे 2019 के लोकसभा चुनाव तक बरकरार रहने की होगी. दलित वोट हर राज्य में हैं. इसलिए कांग्रेस के साथ गठबंधन से मुस्लिम-दलित गठजोड़ बनेगा, जो बीजेपी के लिए नुकसानदायक साबित होगा.बसपा से गठबंधन न करने का हिमाचल और गुजरात में कांग्रेस को नुकसान हो चुका है. इस बात को बसपा के वरिष्ठ नेता उम्मेद सिंह भी मानते हैं. तब बसपा खुद गठबंधन करना चाहती थी लेकिन अब कांग्रेस की मजबूरी ज्यादा है. सिंह के मुताबिक “पार्टी ने अपने लिए गुजरात में 25 और हिमाचल में कांग्रेस की हारी हुई 10 सीटें मांगी थीं. लेकिन उसने नहीं दिया. कांग्रेस को भ्रम था कि वह गुजरात चुनाव जीत जाएगी. उसका बसपा से गठबंधन होता तो वहां बीजेपी की सरकार नहीं बनती. कांग्रेस को यह सच्चाई समझनी चाहिए. गठबंधन न होने से नुकसान कांग्रेस को हुआ.”


दरअसल, अब ये माना जा रहा है कि गोरखपुर, फूलपुर में मायावती की अपील पर दलित वोट गठबंधन के पक्ष में शिफ्ट हुआ है. कैराना में तो मायावती मौन रहीं फिर भी गठबंधन बीजेपी पर भारी पड़ा. ऐसे में बीजेपी पर विजय पाने के लिए कांग्रेस को दलित वोटों की दरकार है, इसलिए बसपा उससे अपनी शर्तों पर ही समझौता करना चाहती है. कुछ भी हो जेडीएस नेता कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में मायावती और सोनिया गांधी की नजदीकी बीजेपी की बेचैनी को बढ़ाने वाली थी. ये तस्वीर भी बता रही है कि बसपा और कांग्रेस में गठबंधन कोई बड़ी बात नहीं.


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मायावती पर ‘बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती’ नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं “बसपा के राजनीतिक उदय के समय उसमें कई राज्यों के दलितों ने अपना नेता खोजा था, लेकिन मायावती ने न तो ध्यान दिया और न ही कांग्रेस और बीजेपी की तरह क्षेत्रीय नेता पैदा किए. जिसके सहारे उनकी राजनीति आगे बढ़ सकती थी. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के  आगे बढ़ने का बहुत स्कोप था लेकिन क्षत्रपों के अभाव में वह धीरे-धीरे जनाधार खोती गई. यही वजह है कि चंद्रशेखर और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं का उभार हो रहा है जो मायावती की सियासी जमीन खा सकते हैं. हालांकि ये इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में कितने सफल होंगे यह नहीं कहा जा सकता.”


राजनीति संभावनाओं का खेल है. कांग्रेस को इन तीन राज्यों में भाजपा को सत्ता हटाने के लिए बसपा में संभावना दिख रही है. वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया इसकी तस्दीक करते हैं. वह कहते हैं “ये कांग्रेस के अस्तित्व की लड़ाई है. इन राज्यों में कभी कांग्रेस बहुत मजबूत थी लेकिन अब वो संघर्ष कर रही है. ऐसे में उसे बसपा का साथ चाहिए. उसने गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में उदाहरण देखा है कि अगर वोटों का बिखराव रोकना है तो गठबंधन करना पड़ेगा. सत्ता पाने की छटपटाहट दोनों में है, क्योंकि ज्यादा दिन सत्ता से दूरी इन पार्टियों की सेहत के लिए ठीक नहीं है. इसलिए एक साथ आना दोनों की जरूरत भी है मजबूरी भी.”


बताया जाता है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ मायावती से संपर्क कर रहे हैं. गठबंधन का फैसला अब मायावती को करना है. हालांकि, मामला सीटों को लेकर उलझने वाला है, क्योंकि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता में रह चुकी है. ऐसे में सीटों पर कैसे फैसला होगा, यह देखना होगा. क्योंकि मायावती सम्मानजनक सीट न मिलने पर अकेले मैदान में उतरने की बात कहती रही हैं.


इन राज्यों में कांग्रेस के लिए है चुनौती


2019 के आम चुनाव से पहले नवंबर-दिसंबर में बीजेपी शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ हैं जैसे अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. एमपी में कुल 230 सीटें हैं. जिनमें बीजेपी के पास 165, कांग्रेस के 58, बहुजन समाज पार्टी के चार और तीन निर्दलीय विधायक हैं.


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राजस्थान की बात करें तो यहां 200 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी के 163 एमएलए हैं. कांग्रेस के 21, बहुजन समाज पार्टी के तीन, नेशनल पीपुल्स पार्टी के चार, नेशनल यूनियनिस्ट जमींदारा पार्टी के दो और सात निर्दलीय विधायक हैं. छत्तीसगढ़ में कुल 90 सीटें हैं. जिनमें बीजेपी के पास 49, कांग्रेस के 39 और एक विधायक बीएसपी का और एक निर्दलीय हैं.

VIDEO: चोरों ने सरकारी शराब पर फेरा हाथ


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 जमशेदपुर के मानगो के उलीडीह थाना क्षेत्र में चोरों ने एक सरकारी शराब दुकान को निशाना बनाया. चोरों ने दुकान से करीब दो लाख की शराब चोरी कर ली. दुकान के मुंशी को घटना का पता तब चला जब वह शुक्रवार सुबह दुकान खोलने पहुंचा. दुकाने के ताले टूटे हुए थे. मुंशी ने कहा कि चूंकि पैसे वह अपने साथ लेकर चला गया था इसलिए नकदी की चोरी नहीं हुई. पुलिस और आबकारी विभाग चोरी गये शराब की बरामदगी में जुटे हुए हैं. 

कैराना उपचुनाव: क्या सच में जाटों ने RLD गठबंधन को वोट दिया?


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यूपी की कैराना लोकसभा सीट पर महागठबंधन समर्थित आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह को 44,618 वोटों से हरा दिया है. 2014 लोकसभा चुनावों में आरएलडी को एक भी सीट नहीं मिली थी ऐसे में तब्बसुम पार्टी की एकमात्र प्रतिनिधि तो हैं ही साथ ही यूपी की तरफ से एकमात्र मुस्लिम सांसद भी बन गई हैं. इस जीत के लिए कैराना में सपा, बसपा, आरएलडी ने अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई थी और अब ऐसा दावा किया जा रहा है कि जाट-मुस्लिम-दलित समीकरण से ये जीत हासिल की गई है. हालांकि सिर्फ 58% वोटिंग के बाद आरएलडी का ये दावा कि पार्टी ने जाट वोट बैंक हासिल कर लिया है कई सवाल खड़े कर रहा है.RLD से अभी भी दूर ही हैं जाट!
कैराना की जीत के बाद आरएलडी के युवराज ये दावा करते नज़र आए कि ‘जिन्ना पर गन्ना’ भारी पड़ गया है. हालांकि कैराना सीट के वोटिंग पैटर्न और इतिहास पर नज़र डालें तो ये 44 हज़ार वोटों की जीत पश्चिमी यूपी में महागठबंधन के लिए ही परेशानियां बढ़ाने वाली नज़र आती हैं. साल 2004 के लोकसभा चुनावों से इस पूरे वोटिंग पैटर्न को देखने से बात कुछ-कुछ समझ में आती है. 2004 के लोकसभा चुनावों तक जाट वोटबैंक का बड़ा हिस्सा आरएलडी के खाते में ही था और इन चुनावों में इस सीट पर 66% वोटिंग हुई थी. आरएलडी की तरफ से अनुराधा चौधरी मैदान में थी और उन्होंने बीएसपी के शाहनवाज़ को 3 लाख 42 हज़ार वोटों से शिकस्त दी थी.


2009 लोकसभा चुनावों की बात करें तो उन चुनावों में भी तब्बसुम हसन ने बीएसपी के टिकट जीत हासिल की थी लेकिन तब आरएलडी एनडीए में थी और उसके सपोर्ट से हुकुम सिंह ने बीजेपी के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा था. दलित-मुस्लिम समीकरण से तब्बसुम जीती तो थीं लेकिन हुकुम सिंह ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. जीत का अंतर 13 हज़ार से भी कम रहा था. इन चुनावों में भी वोटिंग टर्नआउट 58% के आस-पास था और 7 बार कैराना विधानसभा से विधायक रहे हुकुम सिंह का जाटों ने खुलकर सपोर्ट किया था. ये ही वो साल था जब आरएलडी ने अपना जाट वोट बैंक सफलतापूर्वक बीजेपी को ट्रांसफर कर दिया.


2011 में आरएलडी ने यूपीए का हाथ थाम लिया और जाटों के एक बड़े हिस्से ने बीजेपी को वोट देकर खुद को ठगा हुआ महसूस किया. 2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों ने इलाके में जाट बनाम मुस्लिम का समीकरण पैदा कर दिया और गन्ना किसान यूनियन तक ख़त्म हो गई. ‘अजगर’ से ‘मजगर’ पर शिफ्ट हुई आरएलडी के लिए ये बड़ा झटका था क्योंकि जाट वोटबैंक अब बीजेपी की तरफ खिसक गया था और मुसलमान भी सपा के खाते में जाता हुए दिखाई दे रहा था. 2014 के लोकसभा चुनावों में इसका असर भी देखने को मिला और अजीत सिंह अपनी पैतृक सीट बागपत से ही हार गए. कैराना की बात करें तो यहां रिकॉर्ड 73% वोटिंग हुई. जाटों ने आरएलडी को नकार दिया और पार्टी यहां चौथे नंबर पर खिसक गई. बीजेपी के हुकुम सिंह ने सपा के नाहिद हसन को 2 लाख 36 हज़ार वोटों से हरा दिया. तीसरे पर बसपा से कंवर हसन रहे जबकि आरएलडी के करतार सिंह भड़ाना को सिर्फ 42 हज़ार वोट मिले थे.



क्या है कैराना का जातीय समीकरण


कुल वोटर : 16,12989


(अनुमानित)
मुसलमान : 5.5 लाख
दलित : 2 लाख
पिछड़ी जाति (जाट, सैनी, प्रजापति, कश्यप): 4 लाख
गुर्जर : 1 लाख तीस हज़ार
राजपूत: 75 हजार
ब्राह्मण: 60 हजार
वैश्य: 55 हजार


सिर्फ 58% वोटिंग से ये साफ़ है कि लोगों ने 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह इस उपचुनाव को तवज्जो नहीं दी. कांग्रेस, बसपा, सपा और आरएलडी के साथ आने से मुसलमानों का 5 लाख से ज्यादा वोट, दलित के 2 लाख वोट, जाटों के 1 लाख 70 हज़ार और गैर ओबीसी जाटों के ढाई लाख वोटों का एक हिस्सा तबस्सुम के पक्ष में आएगा इसका अनुमान लगाया गया था.


बीजेपी और महागठबंधन के बीच लड़ाई प्रमुख रूप से जाट और गैर जाट ओबीसी वोटों के लिए ही थी. तबस्सुम को 481182 वोट मिले हैं जबकि बीजेपी की मृगांका सिंह को 436564 वोट मिले हैं. बीजेपी के कोर वोट बैंक राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और गैर जाट ओबीसी में सैनी-प्रजापति अगर अपने 100% वोट डाल भी देते तो भी मृगांका 4 लाख तक नहीं पहुंच पाती. इससे सपष्ट है कि सिर्फ 58% वोटिंग में जाटों के एक बड़े हिस्से और ओबीसी-दलित के छोटे ही सही पर एक हिस्से ने भी बीजेपी को वोट दिया है.



बीजेपी नहीं महागठबंधन के लिए भी है रेड अलर्ट
ज्यादातर जानकार इस बात पर सहमत नज़र आ रहे हैं कि गोरखपुर और फूलपुर के बाद कैराना-नूरपुर की हार बीजेपी के लिए अच्छा मैसेज नहीं है. लेकिन कैराना उपचुनाव के वोट शेयर को देखा जाए तो बीजेपी इस बात से आश्वस्त हो जाएगी कि इलाके ने जाट अब भी उससे पूरी तरह नहीं रूठे हैं. गन्ना किसानों के बकाया के मुद्दे को लेकर लोगों में नाराजगी ज़रूर है लेकिन वो अभी भी वोटिंग से जाहिर नहीं हुई है.


उधर महागठबंधन के लिए कैराना उपचुनाव ये संदेश लेकर आया है कि सिर्फ गठबंधन करने और वोटबैंक का अंदाज़ा लगाकर खुश हो आजे की जगह ज़मीन पर काम करने की ज़रुरत बनी हुई है. जयंत-अजीत सिंह के कैराना में लगातार जाटों को फोकस कर रैली और जन सभाएं करने और सपा-बसपा-कांग्रेस के सपोर्ट के बावजूद भी अगर बीजेपी की हार का अंतर सिर्फ 44 हज़ार है तो 2019 में पश्चिमी यूपी की चुनौती काफी बड़ी होने वाली है.


Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/khel/india-pakistan-match-3-461957.html

बेखौफ बदमाशों ने जूस की दुकान में की बमबाजी


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यूपी के इलाहाबाद में बेखौफ बदमाशों के हौसले लगातार बुलंद है. इसकी ताजा तस्‍वीर गुरुवार को देखने को मिली,जब दिन-दहाड़े बदमाशों ने जूस की दुकान में बमबाजी कर दहशत मचा दी.इस घटना के बाद से दुकानदार और इलाके के लोग सकते में हैं.वहीं मौके पर पहुंची पुलिस बदमाशों की तलाश में जुटी है.बमबाजी की यह घटना धूमन गंज थाना क्षेत्र के प्रीतमनगर इलाके की है,जहां जूस की दुकान पर अचानक हुई बमबाजी के चलते ही इलाके में अफरा-तफरी मच गई.सरेआम हुयी बमबाजी की घटना से दुकान का एक कर्मचारी जख्मी हो गया.यह घटना दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गयी, जिसमें साफ दिख रहा है कि बाइक से पहुंचे बदमाशों ने दुकान पर बमबाजी की और फरार हो गए.


बमबाजी की घटना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस बाइक सवार बदमाशों को पकड़ने में जुट गयी है,  लेकिन पुलिस अभी तक बदमाशों का पता नही लगा सकी है. वहीं इस घटना के पीछे दुकानदार ने किसी तरह की पुरानी रंजिश से इनकार किया है.


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