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उप चुनावों में ‘गठबंधन’ के सुखद परिणाम देखते हुए कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है. कांग्रेस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा से हाथ मिलाकर भाजपा को सत्ता से बेदखल करना चाहती है. क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले इन राज्यों को जीतना उसके लिए जीने-मरने का सवाल है. संभावना है कि इन राज्यों के विधानसभा चुनाव में दोनों मिलकर लड़ें. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जब बसपा का ‘हाथी’ और कांग्रेस का ‘हाथ’ साथ-साथ आएंगे तो क्या होगा?दरअसल, यूपी से बाहर इन तीनों राज्यों में बसपा का अच्छा जनाधार माना जाता है. उसकी वजह वहां की दलित आबादी है. मायावती ऐसी दलित नेता मानी जाती हैं जिनके इशारे पर ये वोटबैंक शिफ्ट हो सकता है. मध्य प्रदेश में 15.6, राजस्थान में 17.83 और छत्तीसगढ़ में 11.6 फीसदी दलित आबादी है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में तो बसपा राजनीतिक समीकरण बिगाड़ने की हैसियत रखती है.
दलित बहुल आबादी वाले राज्यों में बसपा
मध्य प्रदेश में एक बार में बसपा के 11 और राजस्थान 6 विधायक रह चुके हैं, जबकि मायावती ने अपना पूरा ध्यान यूपी पर लगा रखा है. ऐसे में इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन बसपा-कांग्रेस दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन होता है तो संभावना इसे 2019 के लोकसभा चुनाव तक बरकरार रहने की होगी. दलित वोट हर राज्य में हैं. इसलिए कांग्रेस के साथ गठबंधन से मुस्लिम-दलित गठजोड़ बनेगा, जो बीजेपी के लिए नुकसानदायक साबित होगा.बसपा से गठबंधन न करने का हिमाचल और गुजरात में कांग्रेस को नुकसान हो चुका है. इस बात को बसपा के वरिष्ठ नेता उम्मेद सिंह भी मानते हैं. तब बसपा खुद गठबंधन करना चाहती थी लेकिन अब कांग्रेस की मजबूरी ज्यादा है. सिंह के मुताबिक “पार्टी ने अपने लिए गुजरात में 25 और हिमाचल में कांग्रेस की हारी हुई 10 सीटें मांगी थीं. लेकिन उसने नहीं दिया. कांग्रेस को भ्रम था कि वह गुजरात चुनाव जीत जाएगी. उसका बसपा से गठबंधन होता तो वहां बीजेपी की सरकार नहीं बनती. कांग्रेस को यह सच्चाई समझनी चाहिए. गठबंधन न होने से नुकसान कांग्रेस को हुआ.”
दरअसल, अब ये माना जा रहा है कि गोरखपुर, फूलपुर में मायावती की अपील पर दलित वोट गठबंधन के पक्ष में शिफ्ट हुआ है. कैराना में तो मायावती मौन रहीं फिर भी गठबंधन बीजेपी पर भारी पड़ा. ऐसे में बीजेपी पर विजय पाने के लिए कांग्रेस को दलित वोटों की दरकार है, इसलिए बसपा उससे अपनी शर्तों पर ही समझौता करना चाहती है. कुछ भी हो जेडीएस नेता कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में मायावती और सोनिया गांधी की नजदीकी बीजेपी की बेचैनी को बढ़ाने वाली थी. ये तस्वीर भी बता रही है कि बसपा और कांग्रेस में गठबंधन कोई बड़ी बात नहीं.
कुमारस्वामी के शपथग्रहण में मायावती और सोनिया गांधी
मायावती पर ‘बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती’ नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं “बसपा के राजनीतिक उदय के समय उसमें कई राज्यों के दलितों ने अपना नेता खोजा था, लेकिन मायावती ने न तो ध्यान दिया और न ही कांग्रेस और बीजेपी की तरह क्षेत्रीय नेता पैदा किए. जिसके सहारे उनकी राजनीति आगे बढ़ सकती थी. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के आगे बढ़ने का बहुत स्कोप था लेकिन क्षत्रपों के अभाव में वह धीरे-धीरे जनाधार खोती गई. यही वजह है कि चंद्रशेखर और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं का उभार हो रहा है जो मायावती की सियासी जमीन खा सकते हैं. हालांकि ये इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में कितने सफल होंगे यह नहीं कहा जा सकता.”
राजनीति संभावनाओं का खेल है. कांग्रेस को इन तीन राज्यों में भाजपा को सत्ता हटाने के लिए बसपा में संभावना दिख रही है. वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया इसकी तस्दीक करते हैं. वह कहते हैं “ये कांग्रेस के अस्तित्व की लड़ाई है. इन राज्यों में कभी कांग्रेस बहुत मजबूत थी लेकिन अब वो संघर्ष कर रही है. ऐसे में उसे बसपा का साथ चाहिए. उसने गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में उदाहरण देखा है कि अगर वोटों का बिखराव रोकना है तो गठबंधन करना पड़ेगा. सत्ता पाने की छटपटाहट दोनों में है, क्योंकि ज्यादा दिन सत्ता से दूरी इन पार्टियों की सेहत के लिए ठीक नहीं है. इसलिए एक साथ आना दोनों की जरूरत भी है मजबूरी भी.”
बताया जाता है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ मायावती से संपर्क कर रहे हैं. गठबंधन का फैसला अब मायावती को करना है. हालांकि, मामला सीटों को लेकर उलझने वाला है, क्योंकि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता में रह चुकी है. ऐसे में सीटों पर कैसे फैसला होगा, यह देखना होगा. क्योंकि मायावती सम्मानजनक सीट न मिलने पर अकेले मैदान में उतरने की बात कहती रही हैं.
इन राज्यों में कांग्रेस के लिए है चुनौती
2019 के आम चुनाव से पहले नवंबर-दिसंबर में बीजेपी शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ हैं जैसे अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. एमपी में कुल 230 सीटें हैं. जिनमें बीजेपी के पास 165, कांग्रेस के 58, बहुजन समाज पार्टी के चार और तीन निर्दलीय विधायक हैं.
क्या नई ताकत के रूप में उभर रही हैं मायावती?
राजस्थान की बात करें तो यहां 200 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी के 163 एमएलए हैं. कांग्रेस के 21, बहुजन समाज पार्टी के तीन, नेशनल पीपुल्स पार्टी के चार, नेशनल यूनियनिस्ट जमींदारा पार्टी के दो और सात निर्दलीय विधायक हैं. छत्तीसगढ़ में कुल 90 सीटें हैं. जिनमें बीजेपी के पास 49, कांग्रेस के 39 और एक विधायक बीएसपी का और एक निर्दलीय हैं.
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