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कर्नाटक की राजनीति में बुकंकरे सिद्दालिंगप्पा येदियुरप्पा इतना मजबूत नाम है कि अनंत हेगड़े और प्रताप सिम्हा के ‘हिंदुत्व’ को नज़रंदाज़ कर पार्टी ने विधानसभा चुनावों से पहले ही सीएम कैंडिडेट के लिए उनके नाम की घोषणा कर दी गई. चावल मिल के क्लर्क से ज़मीनी किसान नेता और फिलहाल कर्नाटक में लिंगायतों के सबसे बड़े नेता येदियुरप्पा ही वो शख्स हैं, जिसने दक्षिण में पहली बार कमल खिलाकर बीजेपी का खाता खोला था. सरकार गिराई गई, घोटाले के आरोपों से घिरे और बीजेपी से लगा होकर ‘कर्नाटक जनता पक्ष’ नाम की पार्टी तक बना ली. 2014 में फिर बीजेपी में लौटे और कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष से लेकर सीएम कैंडिडेट घोषित होकर फिर मैदान में हैं.ज़मीनी नेता रहे हैं येदियुरप्पा
सिर्फ लिंगायत के नेता कहकर येदियुरप्पा को ख़ारिज करना आसान नहीं है. कर्नाटक के मांड्या जिले के बुकानाकेरे में सिद्धलिंगप्पा और पुत्तथयम्मा के घर 27 फरवरी 1943 को जन्मे येदियुरप्पा ने चार साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया था. उन्होंने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरुआत साल 1972 में शिकारीपुरा तालुका के जनसंघ अध्यक्ष के रूप में की थी. इमरजेंसी के दौरान वे बेल्लारी और शिमोगा की जेल में भी रहे. यहां से उन्हें इलाके के किसान नेता के रूप में जाना जाने लगा था. साल 1977 में जनता पार्टी के सचिव पद पर काबिज होने के साथ ही राजनीति में उनका कद और बढ़ गया.
कर्नाटक की राजनीति में उन्हें नज़रंदाज़ करना इसलिए नामुमकिन हो जाता है क्योंकि 1988 में ही उन्हें पहली बार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था. येदियुरप्पा 1983 में पहली बार शिकारपुर से विधायक चुने गए और फिर छह बार यहां से जीत हासिल की. 1994 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद येदियुरप्पा को असेम्बली में विपक्ष का नेता बना दिया गया. 1999 में जब वो चुनाव हार गए तो बीजेपी ने उन्हें MLC बना दिया. जिन दो महत्वपूर्ण जातियों के हाथों में राजनीति का भविष्य रहा है वो हैं लिंगायत और वोक्कालिगा. कर्नाटक में मुख्यमंत्री अमूमन इसी समुदाय से ही रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में हार के बाद बीजेपी को समझ आ गया कि बिना येदियुरप्पा के कर्नाटक में कमल खिलना बेहद मुश्किलों भरा साबित होगा.
कौन हैं लिंगायत
बारहवीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना (उन्हें भगवान बासवेश्वरा भी कहा जाता है) ने हिंदू जाति व्यवस्था में दमन के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ा था. उन्होंने वेदों को ख़ारिज किया और वे मूर्तिपूजा के ख़िलाफ़ थे. बता दें कि लिंगायत हिंदुओं के भगवान शिव की पूजा नहीं करते लेकिन अपने शरीर पर इष्टलिंग धारण करते हैं. ये अंडे के आकार की गेंदनुमा आकृति होती है जिसे वे धागे से अपने शरीर पर बांधते हैं.
हालांकि बासवन्ना ने जो अपने प्रवचनों के सहारे जो समाजिक मूल्य दिए, अब वे बदल गए हैं. हिंदू धर्म की जिस जाति व्यवस्था का विरोध किया गया था, वो लिंगायत समाज में पैदा हो गया. बासवन्ना का अनुयायी बनने के लिए जिन लोगों ने कन्वर्जन किया, वे बनजिगा लिंगायत कहे गए. वे पहले बनजिगा कहे जाते थे और ज़्यादातर कारोबार करते थे. लिंगायत उत्तरी कर्नाटक की प्रभावशाली जातियों में गिनी जाती है हालांकि राज्य के दक्षिणी हिस्से में भी लिंगायत लोग रहते हैं. सत्तर के दशक तक लिंगायत दूसरी खेतीहर जाति वोक्कालिगा लोगों के साथ सत्ता में बंटवारा करते रहे थे. वोक्कालिगा दक्षिणी कर्नाटक की एक प्रभावशाली जाति है.
जाति के खेल में भी सबसे आगे
एक वक़्त ऐसा भी था जब येदियुरप्पा कर्नाटक की राजनीति में सबसे दागदार नाम हो गया था. जगदीश शेट्टर के जरिए बीजेपी ने भी लिंगायत वोटों को नई राह दिखाने की खूब कोशिश की लेकिन येदियुरप्पा ने पकड़ ढीली नहीं होने दी. कर्नाटक की सबसे मजबूत जाति लिंगायत के हिस्से 21 प्रतिशत वोट हैं. कहा जाता है कि इसका बड़ा हिस्सा आज भी येदियुरप्पा के इशारों पर वोट करता है. जानकारों का मानना है कि एक अरसे तक येदियुरप्पा की छवि लिंगायत नेता से ज्यादा किसान नेता की थी लेकिन कांग्रेस ने ही उन्हें वक़्त के साथ लिंगायतों का नेता बना दिया.
साल 1969 तक लिंगायत कांग्रेस पार्टी के वोटबैंक हुआ करते थे. बाद में कांग्रेस पार्टी टूटी और इंदिरा की कांग्रेस (आई) और दूसरा धड़ा कांग्रेस (ओ) अस्तित्व में आए. कर्नाटक में कांग्रेस के बड़े लिंगायत नेता कांग्रेस-ओ में शामिल हो गए. बाद में दोनों बड़े नेता निजालिनगप्पा और रामकृष्ण हेगड़े जनता पार्टी में शामिल हो गए और ये वोट बैंक कांग्रेस से पूरी तरह दूर हो गया. वीरेंद्र पाटिल के साथ जो हुआ उसे भी लिंगायत समुदाय कांग्रेस के धोखे के रूप में याद करता है. कांग्रेस-ओ में चले गए वीरेंद्र साल 1989 में कांग्रेस में लौट आए थे. कांग्रेस ने भी पहले उन्हें सीएम बनाया लेकिन जैसे ही वो बीमार पड़े उन्हें राजीव गांधी ने हटा दिया. अफवाह फैली कि राजीव ने पाटिल से बात तक नहीं कि और हटाने का फैसला सिर्फ कुछ मिनटों में बेंगलुरु एयरपोर्ट पर ले लिया था. इसके बाद कांग्रेस-ओ के लिंगायत और एचडी देवागौड़ा के वोकालिग्गा वोटों के ज़रिए 1994 में राज्य में जनता दल की सरकार बनी.

बाद में जनता दल टूटी और जद-एस और जद-यू बनी. देवागौड़ा की बदौलत जद-एस के हिस्से 18 प्रतिशत आबादी वाली दूसरी बड़ी जाति वोकलिग्गा आई और रामकृष्ण हेगड़े, पाटिल के चलते जद-यू के हिस्से लिंगायत वोट आ गए. साल 2004 में बीजेपी और जद-यू का विलय हो गया. इसी दौरान पाटिल की मृत्यु हो गई और हेगड़े ने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी. उधर कांग्रेस का नेतृत्व वोकलिग्गा चीफ मिनिस्टर एसएम कृष्णा के हाथ में था. ऐसे में लिंगायतों ने येदियुरप्पा को अपना नेता चुन लिया और वो किसान नेता से लिंगायतों के सर्वमान्य नेता के रूप में सामने आए. बता दें कि अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग की तादाद कर्नाटक में सबसे ज्यादा है, ये पूरी आबादी का 32 प्रतिशत हैं. राज्य में 17 फीसदी अल्पसंख्यक भी हैं, जिसमें 13 फीसदी मुसलमान और चार फीसदी ईसाई हैं.
कर्नाटक के सबसे विवादित नेता भी हैं येदियुरप्पा
बता दें कि साल 2004 में उनकी पत्नी का निधन रहस्यमयी परिस्थिति में एक कुएं में गिरने से हो गया था. येदियुरप्पा पर जमीन घोटाले और अवैध खनन घोटाले के भी आरोप लगे थे. लोकायुक्त की रिपोर्ट के चलते बेरेजेपी आलाकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी से रुखसत होने को कह दिया था. नवम्बर 2010 में येदियुरप्पा पर आरोप लगा कि उन्होंने बेंगलुरु में प्रमुख जगहों पर अपने बेटों को भूमि आवंटित करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया जिससे वह विवादों के एक और घेरे में आ गए. पांच फरवरी 2011 को उन्होंने अपनी संपत्ति सार्वजनिक की और और कांग्रेस को चेतावनी दी कि वह उनके पास ‘काले धन’ की बात साबित करके दिखाए.

मई 2008 में उन्होंने बहुमत से कम के आंकड़े के साथ शासन की शुरुआत की लेकिन विपक्षी और निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में कर उन्होंने जबर्दस्त बहुमत जुटा लिया जो इस्तीफा देकर उपचुनाव में उतरे. उन्होंने अपने अभियान को ‘ऑपरेशन लोटस’ नाम दिया और 224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा बहुमत हासिल करने में सफल रही. लेकिन खनन क्षेत्र से जुड़े प्रभावशाली रेड्डी बंधु जनार्दन और करुणाकर उनके लिए परेशानी का सबब बने रहे. बाद में बीजेपी के ही 11 बागी विधायकों और पांच निर्दलीय विधायकों ने येदियुरप्पा सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्हें संकट में डाल दिया. वह बच गये और दो बार विश्वास मत में जीत हासिल की. पहला ध्वनि मत से जीता जिसे राज्यपाल एच आर भारद्वाज ने असंवैधानिक करार दिया. उसके बाद उन्हें एक और शक्ति परीक्षण करना पड़ा जिसमें वह 100 के मुकाबले 106 मतों से विजयी हुए.

भारद्वाज के साथ अकसर मतभेद रखने वाले येदियुरप्पा भारतीय विधायिका के इतिहास में पहले ऐसे मुख्यमंत्री साबित हुए, जिन्होंने एक ही सप्ताह में दो बार विश्वास मत जीता. बगावत करने वाले 11 विधायकों को उच्च न्यायालय द्वारा अयोग्य करार दिये जाने के फैसले से संकट टलता देख रहे येदियुरप्पा के सामने फिर से कठिनाई का दौरा शुरू हुआ जब जेडीएस ने उन पर तथा उनके परिवार पर भूमि घोटालों के अनेक आरोप लगाए. गौरतलब है कि कांग्रेस की धरम सिंह नीत गठबंधन सरकार को हटाने में जेडीएस नेता कुमारस्वामी की मदद करके येदियुरप्पा ऊंचाई पर पहुंचे थे. कुमारस्वामी ने बीजेपी की मदद से सरकार बनाई. जेडीएस और बीजेपी के बीच समझौता हुआ, जिसके मुताबिक कुमारस्वामी पहले 20 माह तक मुख्यमंत्री रहेंगे, जिसके बाद 20 महीनों के बाकी कार्यकाल में इस पद पर येदियुरप्पा काबिज होंगे.
कुमारस्वामी की सरकार में येदियुरप्पा को उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री मनोनीत किया गया. बहरहाल अक्तूबर, 2007 में जब येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो कुमारस्वामी ने अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया. इसके बाद येदियुरप्पा व उनकी पार्टी के सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया तथा पांच अक्तूबर को राज्यपाल से मिलकर सरकार से भाजपा का औपचारिक समर्थन वापस ले लिया. कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगाया गया, जिसे सात नवंबर को हटा दिया गया. राष्ट्रपति शासन की अवधि के दौरान जेडीएस और भाजपा ने अपने मतभेद दूर करने का फैसला किया और येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 12 नवंबर 2007 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. जेडीएस ने मंत्रालयों के प्रभार को लेकर उनकी सरकार को समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 19 नवंबर, 2007 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. घोटाले के आरोपों के बाद पार्टी से निकाल दिए गए 75 साल येदियुरप्पा ने 2011 में अपना अलग संगठन बनाया था लेकिन 2013 में इसका प्रदर्शन काफी खराब रहा था लेकिन वह बीजेपी के वोटबैंक का एक हिस्सा काटने में सफल रहे थे. इस वजह से बीजेपी को कर्नाटक में पराजय का मुंह देखना पड़ा था और 2014 में बीजेपी से उनका फिर से समझौता हो गया.
अभी मुश्किलें और भी हैं
बता दें कि फिलहाल येदियुरप्पा कर्नाटक में 75 दिन के चुनावी दौरे ‘परिवर्तन यात्रा’ पर निकले हैं. बीजेपी ने इससे पहले उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान 49 दिन की ऐसी ही यात्रा शुरू की थी. बीजेपी इस बार गुजरात वाली गलती को दोहराना नहीं चाहती इसलिए 224 में से 150 सीट का टार्गेट लेकर चल रही है. फिलहाल कर्नाटक में पार्टी के मुख्यमंत्री पद का चेहरा बीएस येदियुरप्पा और उनके शिष्य केएस ईश्वरप्पा के बीच एक बार फिर से जंग छिड़ गई है. कुछ महीने पहले पार्टी हाईकमान ने दोनों के बीच सुलह करवा दी थी. लेकिन एक बार फिर से दोनों नेता आमने-सामने आ गए हैं. येदियुरप्पा ने ही ईश्वरप्पा को राजनीति के गुर सिखाए. दोनों कर्नाटक के शिमोगा जिले से ही हैं. ईश्वरप्पा खुद कहते हैं कि येदियुरप्पा ने ही पहली बार 1989 में शिमोगा से उन्हें विधायक बनाया. इसके अलावा 1990 के शुरुआती दौर में येदियुरप्पा ने ही उन्हें कर्नाटक में भाजपा अध्यक्ष भी बनाया था. ईश्वरप्पा बीजेपी सरकार में एक ताकतवर मंत्री थे और कर्नाटक में दो बार पार्टी के अध्यक्ष भी बने थे. इस वक्त ईश्वरप्पा विधान परिषद में विपक्ष के नेता हैं.

‘गुरु-शिष्य’ के रिश्तों में खटास की शुरुआत 2011 में हुई जब येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया. ईश्वरप्पा 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ हार गए थे. साल 2014 में जब लोकसभा चुनाव के दौरान येदियुरप्पा की बीजेपी में वापसी हुई तो ईश्वरप्पा खुश नहीं थे. साल 2016 में जब एक बार फिर येदियुरप्पा को राज्य में बीजेपी का अध्यक्ष और मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया गया तो दोनों नेताओं के बीच घाव गहरे हो गए. ईश्वरप्पा ने दलितों और पिछड़े वर्गों के लिए ‘रायाना ब्रिगेड’ नामक एक राजनीतिक मंच तैयार कर लिया. सोंगोली रायना कुरुबा जाति से स्वतंत्रता सेनानी थे, उन्हीं के नाम पर ईश्वरप्पा ने चतुराई से अपनी पहचान बनानी शुरु कर दी.
ईश्वरप्पा के मुताबिक उन्होंने अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों को बीजेपी में लाने के लिए ‘रायाना ब्रिगेड’ की स्थापना की है.ईश्वरप्पा ने पूरे राज्य में अपने ब्रिगेड के साथ कई बैठके की. उनकी इस हरकत के बाद पार्टी के हाई कमान ने उन्हें चेतावनी दी और उनकी सारी गतिविधियों पर लोक लगा दी. बता दें कि ईश्वरप्पा शिमोगा सिटी से टिकट की मांग कर रहे हैं. लेकिन येदियुरप्पा इसके लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने ईश्वरप्पा से कहा है कि वो टिकट को लेकर कोई गारंटी नहीं देंगे. टिकट को लेकर पार्टी हाईकमान का फैसला आखिरी होगा. ईश्वरप्पा को लगता है कि येदियुरप्पा इस बात का बहाना बना कर उनका टिकट काट रहे हैं कि वो पहले से ही एमएलसी (MLC) हैं. गौरतलब है कि मैसूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैली में भी ईश्वरप्पा नहीं गए थे.
बता दें कि यूनियन केमिकल्स ऐंड फर्टिलाइजर्स मिनिस्टर अनंत कुमार भी फिलहाल येदियुरप्पा के एंटी माने जाते हैं. और अंदर की ख़बरों के मुताबिक वो सीएम पद का कैंडिडेट बनने के लिए रूचि ले रहे थे लेकिन उनका सपना इस बार भी पूरा नहीं हुआ. इसके अलावा मैसूर के सांसद प्रताप सिम्हा भी येदियुरप्पा को पसंद नहीं करते. बताया जाता है कि इन दोनों ने खासतौर पर हिंदुत्व के मोर्चे पर आगे बढ़कर कदम उठाए लेकिन फिर भी येदियुरप्पा के कद की बराबरी करने में पीछे ही रह गए.
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