Friday, 2 February 2018

लोकसभा के उपचुनावों में क्यों फेल हो जाती है बीजेपी


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एक फरवरी को आए उलुबेरिया (पश्चिम बंगाल) और अलवर-अजमेर (राजस्थान) लोकसभा उपचुनावों के नतीजें बीजेपी के लिए कोई चौंकने वाले नतीजे नहीं हैं. बीजेपी भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि उपचुनावों में उसकी जीत का प्रतिशत कम ही रहता है. पिछले चार साल में हुए लोकसभा उपचुनावों के नतीजे भी कुछ इसी ओर इशारा कर रहे हैं.अगर उपचुनावों के आंकड़ों पर निगाह डालें तो चार साल में 15 लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए हैं. जिसमें से बीजेपी सिर्फ 4 सीट पर ही जीत हासिल कर पाई है. बाकी की सीट पर उसे दूसरे-तीसरे और कई सीट पर तो चौथे-पांचवे स्थान पर ही संतोष करना पड़ा है.


वर्ष 2014 में बीजेपी को बहुमत मिला था. केन्द्र में सरकार बनाई थी. लेकिन इसी वर्ष कुछ कारणों के चलते देशभर में पांच लोकसभा सीट पर उपचुनाव कराने पड़े थे. लेकिन हैरत की बात ये है कि जिस वर्ष बीजेपी को बहुमत मिला उसी वर्ष पांच उपचुनावों में से दो पर ही बीजेपी को जीत मिली थी. बाकी तीन पर हार का सामना करना पड़ा था.


सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के प्रोफेसर एके वर्मा का कहना है कि ‘उपचुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर होता है. सत्तारूढ़ पार्टी भी उपचुनाव में खास ध्यान नहीं दे पाती है. दूसरी बात ये कि कुछ स्थानीय मुद्दों के चलते उपचुनावों में विपक्ष हावी हो जाता है. इसीलिए कुछ मामलों को छोड़ दें तो उपचुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को हार का ही सामना करना पड़ता है.’बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवीन बलूनी का कहना है कि ‘उपचुनाव हमेशा से प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के चुनावों से अलग होते हैं. उपचुनाव में स्थानीय मुद्दे शामिल हो जाते हैं. उपचुनावों को कभी भी उस तरह से नहीं देखना चाहिए. इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है. यूपी के उपचुनावों को देख लिजिए, जहां उपचुनाव में सपा को जीत मिली थी और जब आम चुनाव हुए तो सपा का जो हश्न हुआ वो सबके सामने है.’


इस बारे में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी का कहना है कि ‘उपचुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का इस मौके पर जनता सरकार के बारे में सीधा फैसला लेने में सक्षम होती है. जनता ये देख लेती है कि सत्ता में बैठी पार्टी ने जो वादे किए थे वो कितने पूरे किए या फिर पूरा करने की कितनी कोशिश हुई. ये ही वो बात होती है जिसे ध्यान में रखकर जनता वोट करती है.’


वो सीट जहां उपचुनावों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा


2014 में बीजेपी हारी-  


कंधामल (ओड़िशा) में बीजू जनता दल से करीब 3 लाख वोट से हारी.


मेडक (तेलंगाना) में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति से करीब 3 लाख वोट से हारी.


मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) में सपा से करीब 3 लाख वोट से हारी.


2014 में जहां बीजेपी जीती-


बीड (महाराष्ट्र) में 7 लाख वोट से बीजेपी जीती.


बड़ोदरा (गुजरात) में बीजेपी 3.25 लाख वोट से जीती.


2015 में हारी-  


बनगांव (पश्चिम बंगाल) में बीजेपी 2.25 लाख वोटों से हारी.


2016 में जीती-


लखीमपुर (असोम) में बीजेपी 4 हजार वोट से जीती.


शहडोल (मध्य प्रदेश) में बीजेपी 60 हजार वोट से जीती.


2016 में हारी-


तामलुक (पश्चिम बंगाल) में 6 लाख वोट से बीजेपी हारी.


कूचबिहार (पश्चिम बंगाल) में 4 लाख वोट से बीजेपी हारी.


तूरा (मेघालय) उपचुनाव में बीजेपी शामिल नहीं थी.


2017 में हारी-


गुरुदासपुर (पंजाब) में बीजेपी कांग्रेस से 2 लाख वोट से हारी.


झबुआ (मध्य प्रदेश) में बीजेपी कांग्रेस से 89 हजार वोट से हारी.


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