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सुप्रीम कोर्ट ने पुरुषों से ‘रेप’ संबंधी एक याचिका को ख़ारिज कर दिया है. याचिका में ‘रेप’ जैसे अपराध को जेंडर मुक्त करने की सिफारिश की गई थी. फिलहाल अगर पुरुष अपने ‘रेप’ संबंधी शिकायत करता भी है तो आरोपी को धारा 377 के तहत सजा दी जाती है. पुरुष से जुड़े ऐसे अपराध को ‘रेप’ नहीं अननेचुरल सेक्स की कैटेगरी में रखा जाता है.क्या है मामला
बता दें कि इस याचिका के ख़ारिज होने के बाद भी फिलहाल शीर्ष अदालत में ऐसी ही एक और याचिका लंबित है. इस याचिका में कहा गया है कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया जाए और दूसरा यह कि सभी यौन अपराधों को लैंगिक-तटस्थता के आधार पर देखा जाए.
दलील दी गई है कि यौन अपराध को लिंग के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए. ये पुरुषों के मूल अधिकारों का हनन भी है.
Supreme Court rejects petition seeking to make the crime of rape gender-neutral.
— ANI (@ANI) February 2, 2018
अभी क्या है स्थिति
अभी भारत में अगर एक पुरुष का रेप पुरुष करता है तो उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत सज़ा मिलती है. इसमें जब तक कोई शिकायत नहीं करता है, तब तक ऐसे मामले में कार्रवाई नहीं की जा सकती. धारा 377 का क़ानूनी इस्तेमाल बहुत सीमित है और इसका उपयोग कभी-कभार पुरुषों के साथ असहमति से हुए सेक्स के मामलों में किया जाता है. हालांकि इसके अंतर्गत अप्राकृतिक सेक्स में महिला और पुरुष के बीच सहमति से होने वाला ओरल सेक्स भी शामिल है.
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