Sunday, 25 February 2018

एक ही नाव पर सवार हैं राहुल गांधी और केजरीवाल, लेकिन दोंनो की मंजिलें अलग-अलग


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राहुल गांधी को अरविंद केजरीवाल के मुक़ाबले कम गुस्सा आता है. वो जल्दी परेशान नहीं होते. राहुल गांधी का ट्वीट भी आम लोगों की तरह नज़र आता है. वो ट्विटर के जरिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ का मज़ाक उड़ाते हैं. पिछले हफ्ते जब प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम मन की बात के लिए लोगों से सुझाव मांगे तो राहुल गांधी ने उन्हें नीरव मोदी और राफेल विमान घोटाले के बारे में बात करने की सलाह दे डाली.सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी को वास्तव में सुना जा रहा है या क्या उनकी बाते सिर्फ सोशल मीडिया और न्यूज़ की हेंडलाइंस तक ही सीमित है? या फिर क्या उनकी राजनीति अरविंद केजरीवाल की राह पर चल पड़ी है. साल 2015 से 2017 के बीच केजरीवाल असली मुद्दे से ज़्यादा जबरदस्ती का सोशल मीडिया पर हल्ला मचाते थे.


पहले अरविंद केजरीवाल हर मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सोशल मीडिया पर बार-बार सवाल पूछते थे और अब यही काम राहुल गांधी करते हैं. राहुल गांधी पहले आक्रामक ट्वीट किया करते थे लेकिन अब वो हल्के-फुल्के पोस्ट करने लगे हैं. राहुल के ऐसे पोस्ट में लोग काफी दिलचस्पी ले रहे हैं. लेकिन ये पोस्ट वोट में तब्दील नहीं हो रहे हैं. केजरीवाल को पंजाब में हार का सनमान करना पड़ा तो वहीं राहुल गांधी की पार्टी गुजरात में चारों खाने चित हो गई.


‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ के संजय कुमार का मानना है कि राहुल और केजरीवाल दोनों अलग-अलग तरके से सोशल मीडिया पर हंगामा कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “मुझे राहुल गांधी की राजनीति और अरविंद केजरीवाल की राजनीति में कोई समानता नहीं दिख रही है. केजरीवाल ने हमेशा बिना किसी सबूत के आरोप लगाकर हंगामा किया है. जबकि मेरा मानना है कि राहुल गांधी भी सोशल मीडिया पर माहौल बनाने की कोशिश करते हैं. लेकिन वो मुद्दों पर सावधानी से सवाल पूछते हैं. केजरीवाल हर समय जल्दबाजी में रहते हैं, लेकिन राहुल थोड़े अलग हैं.”राफेल सौदे पर उनके तीखे सवाल बीजेपी डरा देती है. केजरीवाल और राहुल गांधी दोनों अलग-अलग तरीके से अपने पार्टी का नेतृत्व करते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से राहुल गांधी ने पार्टी में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं लाए हैं. गुजरात में उन्होंने अशोक गहलोत और राजस्थान में अविनाश पांडे को चुनाव प्रभारी नियुक्त किया. महिला कांग्रेस में उन्होंने शोभा ओझा और सुष्मिता देव जैसे युवा चेहरे को मौके दिए. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल सोच समझ कर हर चाल चल रहे हैं. वो पुराने दिग्गज नेताओं को बार-बार ये कह रहे हैं कि वो पार्टी की जरूरत हैं जबकि वो नए चेहरे को भी साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं.


अरविंद केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने अपनी पार्टी के सह-संस्थापक योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर निकाल दिया.


अगले महीने ये देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी कांग्रेस वर्किंग कमेटी में क्या बदलाव ले कर आते हैं. 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद राहुल ने कहा था कि उनकी पार्टी को केजरीवाल से कुछ चीजें सीखने की जरूरत है.


इमेज गुरु दिलीप चेरियन भी मानते हैं कि दोनों नेता एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. उन्होंने कहा “राहुल की राजनीतिक छवि किसी ऐसे व्यक्ति की है जो राजनीतिक बदलाव पर केंद्रित नहीं है, बल्कि आंतरिक बदलाव पर है. वो तत्काल राजनीतिक परिणामों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. वो काफी धैर्य दिखा रहे हैं. जबकि केजरीवाल का दृष्टिकोण अलग है. वो तुरंत राजनीतिक बदलाव लाने पर ज़ोर देते हैं केजरीवाल बदलाव के तरीकों पर ध्यान नहीं देते हैं”.


राहुल गांधी ने गुजरात में नरेंद्र मोदी को चुनौती दी. वोटरों को लुभाने के लिए उन्होंने मंदिर का भी दौरा किया. लेकिन कांग्रेस को इसका ज्यादा फायदा नहीं हुआ.


कांग्रेस के एक नेता का कहना है ” राहुल गांधी में संगठन तैयार करने की क्षमता है ? एक संगठन के बिना, आप चुनाव नहीं जीत सकते”. कांग्रेस के इस नेता ने नाम न बताए जाने की शर्त पर ये भी कहा कि राहुल को अपनी दादी इंदिरा गांधी की तरह हर काम चुनाव को देखते हुए करना चाहिए.


राजनीति के जानकार एके वर्मा के मुताबिक राहुल गांधी, मोदी स्वभाविक प्रतिद्वंदी हैं. लेकिन उनका मानना है कि राहुल का कामकाज करने का तरीका ज़्यादा उम्मीदें नहीं जगाता. उन्होंने कहा “केजरीवाल की तरह राहुल गांधी हर चीज़ का मज़ाक नहीं उड़ाते हैं. केजरीवाल एक नकारात्मक राजनीति कर रहे हैं”


कांग्रेस आज सिर्फ दो बड़े राज्यों पर शासन कर रही है – पंजाब और कर्नाटक. कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं. यहां लगातार किसान आत्महत्या कर रहे हैं. 2014 में यहां 321 किसानों ने आत्महत्या की जबकि 2015 में ये बढ़कर 1,300 से ज्यादा हो गया. राजधानी बेंगलुरु में पानी की किल्लत है. राज्य में बुनियादी ढांचा खराब है और 8- 9 घंटे का बिजली कटौती सामान्य है. पंजाब में, कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नशीली दवाओं की लत और बेरोजगारी की समस्याओं के लिए अभी तक कुछ खास नहीं किया है.


ये वहीं मुद्दे हैं जिसका सामना केजरीवाल ने किया. इन मुद्दों को लेकर उन्होंने मोदी के खिलाफ ट्वीट कर हमला भी किया. लेकिन वाबजूद इसके वो पंजाब और गोवा में नहीं जीत सके. केजरीवाल के करीबी और आप के एक नेता ने कहा ”पंजाब के चुनाव के बाद, केजरीवाल को इस बात का एहसास हुआ की मोदी की बार-बार आलचोना करने से उनकी लोकप्रियता घटी है”


इसके बाद से केजरीवाल अब बहुत कम ट्वीट करते हैं. न्यूज़ एजेंसी आईएएनए के मुताबिक साल 2016 में केजरीवाल ने ‘मोदी’ का नाम अपने ट्वीट्स में 124 बार किय़ा. जबकि 2017 में सिर्फ 33 बार उन्होंने अपने ट्वीट में मोदी का ज़िक्र किया.


राहुल गांधी ट्विटर के जरिए लगातार मोदी पर हमले कर रहे हैं. लेकिन राहुल ने कामकाज के तरीकों के बारे में खुलासा नहीं किया है. सभी क्षेत्रीय नेताओं के पास एक मॉडल है- नीतीश कुमार एक कॉलेजिएलिअल मॉडल के बारे में बात करते हैं, मायावती मोदी की तरह नौकरशाही मॉडल पर काम करती है.


क्षेत्रीय नेताओं के मुकाबले राहुल कई मॉडल पर एक साथ काम कर रहे हैं. वो 2019 चुनाव के लिए खुद को अच्छी स्थिति में रख सकते हैं, लेकिन उनके सामने कई चुनौतियां हैं. एक बीजेपी ने कहा ” मौजूदा समय में कांग्रेस के पास लोकसभा में 44 सीटें हैं और सत्ता में आने के लिए उन्हें 201 9 में 200 से ज्यादा सीटें जीतनी होगी. अगर हमलोग 100 सीटें भी हार जाते हैं तो भी हम 2019 में सरकार बना लेंगे ”


मारया शकील


 

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