Sunday, 4 February 2018

Love story: फिरोज से लेकर मोरारजी तक थे तारकेश्वरी के अफेयर के किस्से


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बला की खूबसूरत. चेहरे पर एक चार्म. बॉब कट बाल, साड़ी और स्लिवलेस ब्लाउज. वह जहां खड़ी हो जाती थीं, वहां का माहौल ही बदल जाता था. सांसद क्या मंत्रियों के बीच भी उन्हें लेकर खास दीवानगी थी. उन्हें ग्लैमरस गर्ल ऑफ पार्लियामेंट कहा जाता था. वो तारकेश्वरी सिन्हा थीं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने 05 मार्च 1971 के अंक में उनकी आवाज को शहद सरीखी बताया. ये भी लिखा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उन्हें सख्त नापसंद करती थीं. इंदिरा को लगता था कि तारकेश्वरी उनके पति फिरोज से बहुत करीब हैं.इंदिरा के इस शक की तस्दीक बाद में कई लोगों ने कई तरह से की. इंदिरा पर जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रेंक ने अपनी किताब इंदिरा में लिखा, किसी जमाने में फिरोज गांधी का अफेयर खुलेआम तारकेश्वरी से चला था. इंदिरा ने कभी इसे पसंद नहीं किया, यही वजह थी कि जितना नापसंद एक ज़माने में उन्होंने तारकेश्वरी को किया, उतना शायद किसी महिला को किया हो.


इंदिरा को लगा वो तारकेश्वरी के कपड़े हैं
पिछले कई दशकों में दिल्ली की राजनीति के बदलते रंग देख चुके राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव क्रांति प्रकाश कहते हैं कि दिल्ली में रायसीना रोड पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया है. एक जमाने में वह फिरोज़ गांधी का सरकारी आवास था. तारकेश्वरी को अक्सर वहां देखा जाता था. एक बार रात नौ बजे के करीब इंदिरा वहां आईं और उन्होंने कमरे में किसी महिला के कपड़े देखे. इंदिरा का अंदाज़ा था कि ये कपड़े तारकेश्वरी के हैं.


खूबसूरती के साथ एग्रेसन भी
तारकेश्वरी के पिता पटना में सर्जन थे. वह उनकी अकेली लड़की थीं. कॉलेज में पढाई के दौरान ही वह छात्र राजनीति में कूद पड़ीं. देखते ही देखते बिहार की बड़ी छात्र नेता के रूप में उभरीं. उस समय उनकी उम्र बमुश्किल 19-20 साल रही होगी. इसके बाद 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. खूबसूरती के साथ उनमें ज़बरदस्त एग्रेशन भी था. हालांकि राजनीति में उनकी बढ़ती दिलचस्पी ने बाद में उनके परिवार को चिंतित भी किया. बहुत युवा उम्र में ही उनकी शादी छपरा के जाने- माने भूमिहार जमींदार परिवार में तय कर दी गई. पति निधिदेव सिंह तब बड़े वकील थे और राज्य सरकार के मुकदमों को लड़ते थे.


तारकेश्वरी के पिता को लगा कि अब उनकी बेटी राजनीति को भूलकर घर में मन लगाएगी. पति के साथ वह कोलकाता की शानदार पैतृक हवेली में रहने लगीं. लेकिन शायद राजनीति से दूर रहना उनका शगल नहीं था. वह फिर से स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में कूद पड़ीं. इस बीच लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से वो इकोनॉमिक्स में एमएससी करने चली गईं. वहां भी वह डिबेट में हिस्सा लेतीं और अपने तर्कों से लोगों पर जादू कर देतीं. हालांकि उन्हें पढाई बीच में ही छोड़कर लौटना पड़ा.


बहुत से सांसद केवल उन्हें देखने सुनने आते थे
बिहार के तो सारे नेता युवा तारकेश्वरी को जानते ही थे, लेकिन केंद्र में नेहरू और दूसरे नेता भी उनसे रू-ब-रू हो चुके थे. 1952 में उन्हें पटना से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने को कहा गया. वह जीतीं और महज 26 साल की उम्र में लोकसभा पहुंच गईं. तब वह बेबी ऑफ हाउस थीं तो ग्लैमर गर्ल ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स भी. कई लोगों ने उन्हें ब्यूटी विद ब्रेन कहा. कहा जाता था कि उस समय बहुत से सांसद लोकसभा में आते ही केवल इसलिए थे कि वह तारकेश्वरी को देख सकें या बोलते हुए सुन सकें.


बड़े बुजुर्ग कहते हैं, जब वह बोलती थीं तो लोकसभा रुक सी जाती थी. किसी ने उनको लोकसभा की बुलबुल कहा तो किसी ने हंटरवाली. भाषण ऐसा कि सुनाने वाला मंत्रमुग्ध हो जाए! जिस किसी ने इनका भाषण सुना वो हमेशा के लिए इनका दीवाना हो गया.


हजारों शेरों-शायरी ज़ुबान पर थी
तारकेश्वरी की भी खासियतों की लंबी फेहरिश्त थी. वो एक से एक साड़ियां पहनती थीं. जिनके बारे में कहा जाता था कि कभी वह उसे दोहराती नहीं थीं. वह अपने लुक के प्रति बहुत सचेत थीं. बहुत से नेता तो उनसे बातचीत हो जाने को ही अहोभाग्य मान लिया करते थे.



उन्हें उस जमाने में हजारों शेर याद थे. ये बखूबी मालूम होता था कि किस अवसर पर किस शेर का इस्तेमाल करना है. उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल कहते हैं, मैं बहुत छोटा था जब वह कोटद्वार आईं. मैने उनका ऑटोग्राफ लिया, जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है. वह बेइंतिहा खूबसूरत थीं. 1981 में जब वह हेमवती नंदन बहुगुणा के प्रचार में वहां आईं तो उन्होंने शेरो शायरी की झड़ी लगा दी.


आंधी की कहानी किस पर है
जाने-माने फिल्मकार और गीतकार गुलज़ार उन दिनों आंधी बना रहे थे. माना जाता है कि ये फिल्म इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित है. लेकिन गुलजार का कहना था कि ये फिल्म तारकेश्वरी के जीवन से भी रिसेंबल करती है. यानि अगर इंदिरा की जगह इसमें तारकेश्वरी का किरदार फिट कर दिया जाए तो कहीं कुछ बिगड़ने वाला नहीं.


हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी गुलज़ार की यादों के अनुसार उन्होंने 69 से 71 के बीच तारकेश्वरी को अपने शहर लुधियाना में देखा था, वह डॉ. निजलिंगप्पा और मोरारजी देसाई के साथ देशभर का दौरा कर रही थीं, वो उस कैंप में थीं, जो इंदिरा का विरोधी था. इसमें कुछ हैरानी की बात इसलिए थी क्योंकि ज्यादातर युवा नेता इंदिरा के साथ थे. ऐसे में युवा तारकेश्वरी का इन लोगों के साथ होना. इसीलिए क्योंकि उन्हें मालूम था कि इंदिरा एक क्षण के लिए भी उनका साथ पसंद नहीं करने वाली.


फिरोज और तारकेश्वरी
फिरोज़ की इमेज प्लेबॉय की थी. जब तारकेश्वरी उनके साथ देखी जाने लगीं तो सहज ही लोगों को विश्वास होने लगा कि दोनों के बीच कुछ चल रहा है. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध कवि नागार्जुन के बेटे सुकांत नागार्जुन कहते हैं, हो सकता है कि फिरोज से उनकी दोस्ती की बातें सच हों. हो सकता हो कि उनकी दोस्ती हो गई हो. उन्हें लेकर कई किस्से गढ़े गए लेकिन इस पर विश्वास करना कठिन है. वह कहते हैं कि तारकेश्वरी राजनीति में केवल ड्रॉइंगरूम गर्ल नहीं थीं बल्कि जबरदस्त सोशल थीं. उन्होंने बहुत काम किए.


सुकांत इस बात से साफ इनकार कर देते हैं कि तारकेश्वरी और मोरारजी भाई देसाई के बीच भी रिश्तों को लेकर जो कुछ कहा जाता है, उससे जरा सा भी कुछ सच होगा. वह कहते हैं कि दोनों की पर्सनालिटी में जबरदस्त अंतर था. मोरारजी बहुत नियंत्रित व्यक्ति थे. ये बात सही है कि दोनों वित्त मंत्रालय में मंत्री थे लेकिन ऐसा कुछ, ‘रिश्तों’ जैसा बिल्कुल नहीं रहा होगा. वह साथ में ये भी जोड़ देते हैं कि हमारे पुरुष वर्चस्व वाले समाज में यूं भी घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं को लेकर हमेशा एक खास चश्मे से देखा जाता रहा है.


मोरारजी के प्यार में आत्महत्या की कोशिश
हालांकि ये सही है कि तारकेश्वरी ने एक बार नहीं, बल्कि कई बार खुले तौर पर मोरारजी को लेकर अपनी निष्ठा जताई. जब लालबहादुर शास्त्री का निधन हुआ, तो प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में उन्होंने इंदिरा के मुकाबले मोरारजी के लिए कैंप चलाया. फिर जब कांग्रेस टूटी तो वह साफतौर पर उनके साथ रहीं. इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि क्या वाकई उन्होंने मोरारजी देसाई को लेकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी. उस पूरी रात मोरारजी अस्पताल में उनके साथ ठहरे थे. हालांकि मोरारजी के साथ रहने का उन्हें नुकसान जरूर हुआ. 52, 57 और 62 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उनका राजनीतिक करियर ठहर गया. फिर चुनावों में उनकी हार का सिलसिला जो शुरू हुआ तो रुका ही नहीं. नतीजतन 1978 में समस्तीपुर का चुनाव हारने के बाद उन्होंने सियासत को नमस्कार कह दिया.


हालांकि इंदिरा की नापंसदगी के बाद भी वह आपातकाल के दौरान कांग्रेस में लौटीं लेकिन ये गलत टाइमिंग थी. जब 1977 में जनता पार्टी ने चुनाव जीता. वह कांग्रेस के टिकट पर लड़ीं और हार गईं. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. लेकिन उसका शायद ही कोई फायदा तारकेश्वरी को मिला. पटना में लंबे समय तक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के एक स्थानीय संपादक कहते हैं कि उनके पति का आमतौर पर उनका वैसे सचिव माना जाता था, जैसा सफल महिला नेताओं के पतियों के साथ होता है.


तारकेश्वरी की सफाई
बाद में तारकेश्वरी ने बिहार में अपने भाई की याद में एक अस्पताल बनवाया तो एक परिचित वरिष्ठ पत्रकार को दिल्ली से वहां उसे देखने के लिए बुलाया. पत्रकार उनके नजदीकी थे लिहाजा उन्होंने ये पूछने की स्वतंत्रता ले ही ली कि क्या वाकई मोरारजी देसाई के प्रति उनका कोई झुकाव था. उनका जवाब था, हम लोग एक ही दिन केंद्रीय मंत्री बने थे. विभाग भी एक ही था. वह मुझ पर विश्वास करते थे और मैं उन पर. जब शास्त्रीजी का निधन हुआ तो मुझे लगा कि उन्हें पीएम बनना चाहिए. इससे ज्यादा हमारे रिश्तों में कुछ नहीं था.


तारकेश्वरी के बेटे बेटी
उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं. लेकिन उनमें से कोई राजनीति में नहीं आया. उनके बड़े बेटे डॉ. उदयन सिन्हा अमेरिका में एक कंपनी चलाते हैं. लेकिन कुछ-कुछ समय पर बिहार आते रहते हैं. वह यहां दस दिन रहकर बच्चों को पढ़ाते हैं. उनकी परीक्षा लेते हैं. बेहतर प्रदर्शन करने वालों को लैपटॉप या नकदी का इनाम देते हैं. डॉ. सिन्हा मैथमेटिक्स सिस्टम एजुकेशन फॉर रूरल और ए ग्रास रूटर्स एफर्ट एलईडी के अलावा ट्रेडमार्क, गणित, विज्ञान, रोबोट आदि का मुफ्त में प्रशिक्षण देते हैं.


मीडिया में खबर भी नहीं बनी उनकी मृत्यु
14 अगस्त 2007 को उनका देहांत हो गया. उनके निधन की खबर शायद ही दिल्ली के किसी अखबार में छपी हो. ये हैरानी की बात है कि जो महिला नेता अपनी खूबसूरती से लेकर तेज़-तर्रार राजनीति के लिए दिल्ली और वहां के मीडिया में खबरों में रहती थी, उसे तब सबने भुला दिया जब उसने आखिरी सांसें लीं.
वह बेहद संवेदनशील कवियत्री और अच्छी लेखिका भी थीं. उन्होंने अपनी यादों को सहेजकर कई संस्मरण भी लिखे.

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