Thursday, 27 September 2018

भीमा-कोरेगांव मामलाः 5 एक्टिविस्ट की नज़रबंदी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज


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महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई से संबंधित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को अपना फैसला सुनाएगा. ये सारे कार्यकर्ता अभी अपने घरों में नज़रबंद हैं. इस मामले में जानी-मानी इतिहासकार रोमिला थापर और कुछ अन्य लोगों ने इनकी रिहाई के लिए याचिका दायर की थी. बता दें कि 20 सितंबर को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने फैसले को सुरक्षित रख लिया था.ये भी पढ़ें: नोटबंदी को 21 महीने बाद RBI ने बताया- 99.3% पुराने नोट बैंकों में हुए जमा


रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाजशास्त्र के प्रोफेसर सतीश देशपांडे और मानवाधिकारों के लिए वकालत करने वाले माजा दारुवाला की ओर से दायर याचिका में इन गिरफ्तारियों के संबंध में एसआईटी जांच और रिहाई की मांग की गई है.


पीठ ने महाराष्ट्र पुलिस को मामले में चल रही जांच से संबंधित अपनी केस डायरी पेश करने के लिए कहा. पांचों कार्यकर्ता वरवर राव, अरुण फरेरा, वरनॉन गोंजाल्विस, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा 29 अगस्त से अपने-अपने घरों में नजरबंद हैं.पिछले साल 31 दिसंबर को ‘एल्गार परिषद’ के सम्मेलन के बाद राज्य के भीमा- कोरेगांव में हिंसा की घटना के बाद दर्ज एक एफआईआर के संबंध में महाराष्ट्र पुलिस ने इन्हें 28 अगस्त को गिरफ्तार किया था. सुप्रीम कोर्ट ने 19 सितंबर को कहा था कि वह मामले पर पैनी नजर बनाए रखेगा ,क्योंकि सिर्फ अनुमान के आधार पर किसी की आजादी नहीं छीनी जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर साक्ष्य ‘मनगढ़ंत’ पाए गए तो कोर्ट इस संदर्भ में एसआईटी जांच का आदेश दे सकता है.


क्या थी भीमा-कोरेगांव हिंसा?


भीम-कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है. इस छोटे से गांव से मराठा का इतिहास जुड़ा है. 200 साल पहले यानी 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था. पेशवा की सेना का नेतृत्व बाजीराव II कर रहे थे. बाद में इस लड़ाई को दलितों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. बीआर अम्बेडकर को फॉलो करने वाले दलित इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की लड़ाई नहीं कहते हैं. दलित इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक, इस लड़ाई में दलितों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.


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इस साल जनवरी में यहां क्या हुआ था और क्यों भिड़की थी हिंसा?


साल 2018 इस युद्ध का 200वां साल था. ऐसे में इस बार यहां भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे. जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इस दौरान इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई जबकि कई लोग घायल हो गए थे. इस बार यहां दलित और बहुजन समुदाय के लोगों ने ‘एल्गार परिषद’ के नाम से शनिवार वाड़ा में कई जनसभाएं की. शनिवार वाड़ा 1818 तक पेशवा की सीट रही है. जनसभा में मुद्दे हिन्दुत्व राजनीति के खिलाफ थे. इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए थे और इसी दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी.

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