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बहुचर्चित सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा. इस मामले में दायर की गई याचिका में 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने की मांग की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में प्रवेश वर्जित करने संबंधी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगस्त में सुनवाई पूरी करके फैसले को सुरक्षित रख लिया था. जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाने वाली है.
ये हैं सबरीमाला मंदिर से जुड़ी खास बातें-
कहां है ये मंदिर है और यह किस बात पर रोक लगाती हैयह केरल के पतनमथिट्टा जिले के पेरियार टाइगर रिज़र्व में स्थित भगवान अयप्पा की मंदिर है. मान्यता है कि भगवान अयप्पा का जन्म भगवान शिव और मोहिनी के मिलन से हुआ था. मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है क्योंकि इन सालों में माना जाता है कि महिलाओं में ‘मासिक धर्म’ होता है.इससे जुड़ा क्या कोई कानून है या यह मंदिर का अपना नियम है?
सबरीमाल मंदिर प्रशासन का कानूनी अधिकार ‘त्रावणकोर देवस्वम’ को है. बोर्ड मंदिर से जुड़े नियमों को तय करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 26 से मिला हुआ है जो कि किसी भी धार्मिक संस्थान को आंतरिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है. लेकिन सबरीमाल में महिलाओं के प्रवेश पर रोक ‘केरल हिंदू प्लेसेज़ ऑफ पब्लिक वर्शिप रूल्स 1965’ के तहत किया जाता है. इसी नियम के तहत परंपरा के आधार पर किसी को पूजा के स्थान पर जाने से रोका जा सकता है.
महिलाओं के प्रवेश पर रोक के खिलाफ कब शुरू हुई लड़ाई
मंदिर मे महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को पहली बार 1991 में केरल हाईकोर्ट में चैलेंज किया गया. लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि यह एक लंबी परंपरा पर आधारित है इसलिए यह संवैधानिक है.
दुबारा 2006 में इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल किया. उनका कहना था कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए समानता के अधिकार का हनन करता है. 7 मार्च 2008 को मामले मे फैसले के लिए तीन जजों की बेंच को भेज दिया गया. सात साल बाद 11 जनवरी 2016 को इस मामले में सुनवाई हुई. बाद में 20 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस संवैधानिक पीठ को भेज दिया.
क्या हैं मूल मुद्दे?
पहला ये कि क्या परंपरा के नाम पर लिंग को आधार बनाकर समानता के अधिकार का उल्लंघन किया जा सकता है. दूसरा क्या यह संविधान के अनुच्छेद 25 के अतर्गत किसी धर्म की मूलभूत भावना या प्रेक्टिस के अंतर्गत आता है. तीसरा, बायोलॉजिकल आधार पर मंदिर में घुसने से रोकना क्या ‘भेदभाव’ के अंतर्गत आता है.
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