Friday, 28 September 2018

एडल्टरी पर फैसले के दौरान जजों ने बताया कि भारत में कैसे बना यह अपराध?


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एडल्टरी से जुड़े दंडात्मक कानूनों को असंवैधानिक घोषित करते हुए उन्हें निरस्त करने का फैसला गुरुवार को पढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भारत में एडल्टरी को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखने संबंधी पुराकालीन कानून की शुरुआत के उद्भव और विकास के पूरे घटनाक्रम का जिक्र किया है. फैसला सुनाने वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ में शामिल जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अपने-अपने फैसलों में इसका जिक्र किया कि आखिरकार एडल्टरी भारत में अपराध कैसे बना?दोनों ही जजों ने 1860 के कानून के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में शामिल इस पुराकालीन कानून को निरस्त करने का फैसला दिया. जस्टिस नरीमन ने कहा कि प्रावधान का असल रूप तब सामने आता है, जब पति की सहमति या सहयोग से अगर कोई अन्य व्यक्ति विवाहित महिला के साथ यौन संबंध बनाता है तो वह एडल्टरी नहीं है.


यह रेखांकित करते हुए कि 1955 तक हिंदू जितनी महिलाओं से चाहें विवाह कर सकते थे, जस्टिस नरीमन ने कहा कि1860 में जब दंड संहिता लागू हुई, उस वक्त देश की बहुसंख्यक जनता हिंदुओं के लिए तलाक का कोई कानून नहीं था, क्योंकि विवाह को संस्कार का हिस्सा समझा जाता था.


पीठ में शामिल एकमात्र महिला जज मल्होत्रा ने भी अपने फैसले में यह रेखांकित किया कि भारत में मौजूद भारतीय-ब्राह्मण परंपरा के तहत महिलाओं के सतीत्व को उनका सबसे बड़ा धन मानते थे. पुरुषों के रक्त की पवित्रता बनाए रखने के लिए महिलाओं के सतीत्व की कड़ाई से सुरक्षा की जाती थी. जस्टिस मल्होत्रा ने कहा, ‘इसका मकसद सिर्फ महिलाओं के शरीर की पवित्रता की सुरक्षा करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि महिलाओं की यौन इच्छा पर पतियों का नियंत्रण बना रहे.’यह भी पढ़ें –  ‘एडल्टरी’ पर आए SC के फैसले से कुछ पतियों को राहत, कुछ की मुश्किल बढ़ी


जस्टिस नरीमन ने अपने फैसले में कहा कि ऐसी स्थिति में यह समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है कि एक विवाहित पुरुष द्वारा अविवाहित महिला के साथ यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं था. उस वक्त तलाक के संबंध में कोई कानून ही नहीं था, ऐसे में एडल्टरी को तलाक का आधार बनाना संभव नहीं था. उस दौरान हिंदू पुरुष कई महिलाओं से संबंध रख सकते थे, ऐसे में अविवाहित महिला के साथ यौन संबंध अपराध नहीं था, क्योंकि भविष्य में दोनों के विवाह करने की संभावना बनी रहती थी.


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उन्होंने कहा कि हिंदू कोड आने के साथ ही 1955-56 के बाद एक हिंदू व्यक्ति सिर्फ एक पत्नी से विवाह कर सकता था और हिंदू कानून में दूसरी महिलाओं के साथ संबंध बनाने को तलाक का एक आधार बनाया गया. जस्टिस मल्होत्रा ने अपने फैसले में इस तथ्य का जिक्र किया कि 1837 में भारत के विधि आयोग द्वारा जारी भारतीय दंड संहिता के पहले मसौदे में दूसरी महिलाओं के साथ संबंध को अपराध के रूप में शामिल नहीं किया गया था.


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Article source: https://www.jagran.com/news/national-an-encounter-between-security-forces-and-terrorists-in-baramulla-of-jk-18293234.html

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