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(आकाश हसन)हाल ही में जब एक पड़ोसी हज से वापस आए तो ज़ोहरा ने पूछा कि पापा कब वापस आएंगे? ज़ोहरा के पापा अब्दुल रशीद जम्मू कश्मीर पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर थे. पिछले साल 28 अगस्त को जम्मू कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में एक आतंकी हमले में उनकी मौत हो गई थी.
वह अपने क्लासरूम में थी जब उसका भाई दौड़ता हुआ आया और उसके पिता के मृत शरीर के पास लेकर गया. ज़ोहरा ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी. जब ज़ोहरा को किसी भी तरह से समझाना मुश्किल हो गया तो उसकी मां नसीमा ने बताया कि उसके पिता हज गए हुए हैं. उनकी पोस्टिंग वहीं है.
नसीमा बताती हैं, ‘सरकारी नौकर के रूप में उनकी गांव में अच्छी प्रतिष्ठा थी. आतंकी (आमतौर पर स्थानीय युवक) पहले भी गांव में आते थे. उनको पता था रशीद पुलिस में हैं लेकिन उन्होंने कभी हमला नहीं किया.’ये भी पढ़ेंः टेरर फंडिंग का नागौर कनेक्शन ! एनआईए ने दिल्ली से किया आरोपी को गिरफ्तार
जब अब्दुल रशीद ज़िंदा थे तो उनके दो बेटे इरशाद और फैज़ल ने भी स्पेशल पुलिस ऑफीसर (एलपीओ) के रूप में पुलिस फोर्स ज्वाइन किया था. हालांकि रशीद की मौत के बाद उसके बड़े बेटे फैज़ल ने एक स्थानीय मस्जिद से घोषणा की कि उसने पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया है. पिता की मौत के बाद छोटा बेटा इरशाद तब से घर पर है और अभी तक उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन नहीं किया है.
नसीमा कहती हैं, ‘मैं नहीं चाहती कि मेरे बेटे पुलिस में जाएं. मेरे पति एक अच्छे इंसान थे. वर्दी की वजह से उनकी जान गई.’
जम्मू कश्मीर में जिस तरह से पुलिस वालों पर हमले हो रहे हैं उसकी वजह से सिर्फ इस साल 30 पुलिस वाले मारे जा चुके हैं. यहां तक कि आतंकी एक पुलिस वाले के घर में घुस आए और उनके परिवार वालों का अपहरण कर लिया. पुलिस और स्थानीय आतंकियों के बीच लड़ाई गहरी होती जा रही है क्योंकि आतंकियों के परिवार वालों को लगता है कि पुलिस उन्हें परेशान करती है.
पुलिस वालों पर लगातार इसलिए भी हमले बढ़ रहे हैं क्योंकि आतंकवाद को रोकने के लिए उनकी भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है. कश्मीर में 2008 में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद से पुलिस वालों की छवि खराब हुई है. बाद में 2010 और 2016 के विरोध प्रदर्शन में पुलिस पर सामान्य नागरिकों को विरोध के दौरान मारने के आरोप लगे. यह भी आरोप लगा कि केंद्रीय बलों की तुलना में उनका रवैया ज्यादा सख्त था.
पुलिस वालों के सामाजिक संबंध कैसे प्रभावित हुए हैं?
इस वक्त पुलिस वालों के परिवार वाले काफी मुश्किल में हैं और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. हाल में हुए हमलों को देखते हुए इस वक्त दक्षिण दिल्ली में रहने वाले पुलिस वालों को घर न जाने की सलाह दी गई है.
पुलवामा के रहने वाले जम्मू कश्मीर पुलिस के एक जवान ने कहा कि हमारी नौकरी ने हमारे सामाजिक संबंधों पर गहरा असर डाला है. वह बताते हैं कि उनके परिवार में आठ लोग हैं और वह अकेले कमाने वाले हैं इसलिए नौकरी छोड़ने का कोई विकल्प उनके पास नहीं है. उन्होंने कहा, ‘मैं मुश्किल से अपने घर जा पाता हूं. मुझे नहीं पता कि मेरे रिश्तेदार कैसे हैं. मेरे काम की वजह से मैं समाज से पूरी तरह कट गया हूं. हमारे अधिकारी अपने घर जा पाते हैं और सुरक्षित तरीके से रहते हैं लेकिन हम सुरक्षित नहीं हैं.’
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रहमान भट्ट (बदला हुआ नाम) इस वक्त आतंक-निरोधी विंग के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप में काम कर रहे हैं. उन्होंने अपना गांव छोड़ दिया है और अपनी बीवी-बच्चों के साथ श्रीनगर के एक गांव में रह रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमें यहां बच्चों की ज़्यादा फीस देनी पड़ती है. हम सोच रहे हैं कि गांव वाला घर बेचकर हमेशा के लिए यहां बस जाएं.
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