Saturday, 29 September 2018

OPINION: मैं केरल की महिला हूं और इस कारण सबरीमाला पर फैसले के खिलाफ हूं?


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निरंजना जयकृष्णन
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केरल स्थित सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘मंदिर एक पब्लिक प्लेस है और इसे प्राइवेट न बनायें. वैसे भी हिंदू धर्म में महिलाओं को देवी की तरह सम्मानित स्थान प्राप्त है. भगवान अयप्पा के भक्त हिंदू हैं, ऐसे में एक अलग सम्प्रदाय न बनायें.’महिलाओं के लिए कोर्ट का यह फैसला बेशक जीत के तौर पर देखा जा सकता है, क्योंकि ये फैसला लैंगिक समानता का पक्षधर है. लेकिन क्या इस फैसले के बावजूद भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलायें प्रवेश करेंगी? यह एक अहम सवाल है. हर हिंदू की तरह मैं भी ईश्वर में विश्वास रखती हूं और केरल के ज्यादातर लोगों की तरह सबरीमाला मंदिर मेरे लिये भी एक पवित्र स्थान है.


यह भी पढ़ें: रिटायर हो रहे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 28 दिनों में करेंगे नौ बड़े फैसलेमेरे पिता, भाई और पति सालों से मंदिर जाने की परंपरा निभा रहे हैं. भगवान अयप्पा की यात्रा से 41 दिन पहले ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं, जिसे ‘मंडलव्रतम्’ कहा जाता है. ‘माला धारणम्’ और ‘व्रतम्’ 36 वें दिन का मुख्य रिवाज होता है. भक्त काले और नीले कपड़े पहनते हैं और सर में ‘इरुमुड़ी’ लेकर आते हैं.


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इरुमुड़ी कपड़े की होती है, जिसमें नारियल के गोले में घी होता है. इसके बिना पथिनेत्तम पेडी के 18 कदमों को नहीं चढ़ा जा सकता है. जब मैं बच्ची थी, तब मैं भी साथ में जाती थी. भगवान अयप्पा के मंदिर जाना मुझे हमेशा से पसंद था. भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं की पूजा और लंबे रास्तों से जाते हुए ‘अप्पम’ और ‘अरावन प्रसादम’ आज भी मेरी यादों में हैं.


लेकिन जैसे ही मैं बड़ी हुई, मेरा वहां जाना बंद हो गया. आज भी मुझे ऐसा नहीं महसूस होता कि मुझे अपने घरवालों के साथ वहां जाना ही चाहिये. न ही मुझे ऐसा लगता है कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की मनाही की पुरानी परंपरा को मानने में मुझे कोई दिक्कत है. मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को लोगों की धार्मिक मान्यताओं में दखल नहीं देना चाहिये, क्योंकि धार्मिक परंपरायें सम्माननीय होती हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिये.


मुझे ऐसा लगता है कि भगवान अयप्पा की सच्ची महिला भक्त इस फैसले के बावजूद मंदिर नहीं जाएंगी. हम केरलवासियों के लिये यह मंदिर कोई पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि वो जगह है जहां सदियों से परंपराओं का निर्वाह होता रहा है. ऐसी पुरानी परंपराओं को तोड़कर किसी को क्या हासिल होगा.


एक महिला के तौर पर मुझे ऐसा कभी भी नहीं लगा कि सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से मनाही मेरे लिये भेदभावपूर्ण था. मेरे लिये मंदिर और उसके रीति-रिवाजों के लिए सम्मान, लैंगिक समानता से कहीं अधिक है. मुझे ऐसा भी लगता है कि आज जीवन के बाकी पहलुओं पर आप लैंगिक समानता प्राप्त कर सकते हैं और इसमें धार्मिक दृष्टिकोण को जोड़ने की कोई जरूरत नहीं हैं.


उदाहरण के लिये अगर वर्कप्लेस में लैंगिक समानता मिले तो महिलाओं के लिये ज्यादा अच्छा होगा. लेकिन जब कानून धार्मिक मामलों को अपने हाथ में लेता है, तो चीजें थोड़ी खतरनाक हो जाती हैं. धार्मिक सद्भाव कायम रखना मुश्किल हो जाता है. पुरानी परंपराओं को तोड़ने का मतलब प्रगति नहीं है. ये परंपरायें किसी की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचातीं. ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला ऐतिहासिक और प्रशंसनीय था, क्योंकि यह धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप नहीं करता.


लेकिन सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति से जुड़ा ये फैसला न तो ऐतिहासिक है और न ही यह महिलाओं की जीत है. अगर मैं रात में पुरुषों द्वारा बिना परेशान हुये अपने घर सुरक्षित पहुंच जाऊं, यह मेरे लिये जीत है, जिस दिन पुरुषों ने महिलाओं को वस्तु समझना बंद कर दिया, वह मेरे लिये जीत होगी. 12 सदी पुराने पवित्र मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिलना मेरे लिये कोई जीत नहीं है और मेरे लिये यह मूल अधिकार भी नहीं है.


लेखिका त्रिवेंद्रम में गाइनोकोलॉजिस्ट हैं. इसके साथ ही उन्हें यात्रा और फोटोग्राफी का शौक है. लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं.


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