Friday, 28 September 2018

ANALYSIS: जोगी के बिना अधूरी है छत्तीसगढ़ की चुनावी बिसात


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बीती 31 मई को जब अजीत जोगी के निधन की एक झूठी खबर वायरल हुई, तो पूरे छत्तीसगढ़ और बाहर भी हलचल मच गई. पर अजीत जोगी ऐसी अच्छी किस्मत वाले शख्स हैं, जिन्होंने भारी से भारी चुनौती को अंगूठा दिखाया है. चाहे वह उनके नौकरशाह जीवन का हिस्सा हो या पारिवारिक जीवन में, राजनीति में या फिर निजी और सेहत वाले मामलों में.बीमारी की गंभीर हालत, सियासत की बिसात में हाशिये पर मौजूद, विवादों और फजीतों से दाग़दार दामन लिये अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ में कोई भी नहीं खारिज कर सकता है. इधर, बहुजन समाज पार्टी से करार करने और खुद बहन मायावती के मुंह से खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कहलवा कर उन्होंने फिर साबित कर दिया है वे रेस से बाहर नहीं है.


मुकाबला तिकोना बनाने का जोर
इस साल छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा चुनाव होंगे. बीजेपी की रमन सरकार छत्तीसगढ़ में 15 साल पूरे कर चुकी है. 15 साल पहले रमन सिंह ने अजीत जोगी की अगुवाई वाली कांग्रेस से कुर्सी हथियाई थी. अब कांग्रेस अलग है और जोगी अलग. जोगी के लिए यह निर्णायक दांव है. और उनके सार्वजनिक जीवन का सबसे बड़ा भी.हालांकि, जोगी ने न्यूज 18 हिंदी को अपनी बीमारी के दौरान एक लंबी बातचीत में अपनी पार्टी और उसके प्रदर्शन पर काफी भरोसा जताया था. उसका वीडियो यहां देखें.


नरेन्द्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी
2019 लोकसभा चुनाव को देखते हुए जिस महागठबंधन की विपक्ष तैयारी करता दिखाई दे रहा है, वो छत्तीसगढ़ में दिखाई नहीं पड़ता. क्योंकि, मायावती ने राहुल की कांग्रेस के बजाए जोगी की कांग्रेस का हाथ थामा है. साथ ही मायावती ने गठबंधन का ऐलान करते वक्त यह भी साफ कर दिया कि अगर चुनाव जीते तो जोगी ही सीएम होंगे. अब देखना है इस गठबंधन का कांग्रेस और जोगी की जनता कांग्रेस दोनों पर कितना असर पड़ेगा?



जोगी की सियासी अहमियत इस बात से तय होती है कि बहुजन समाज पार्टी के साथ, और मायावती के एन्डॉर्समेंट के बाद वे बीजेपी और कांग्रेस के बरक्स ऐसी कोई संख्या ले कर आ सकें जो अस्पष्ट जनादेश की स्थिति में उनकी भूमिका और महत्व को बढ़ा सके. ये परिदृश्य थोड़ा किन्तु परन्तु से भरा तो है, पर नामुमकिन नहीं.


टेप लीक के बाद क्या कमजोर हुई जोगी की राजनीतिक पकड़?
अंतागढ़ उपचुनाव के मीडिया में आए टेप ने जोगी के राजनीतिक कद को कमजोर और छोटा भी किया. अंतागढ़ का जो टेप आया था उसके अनुसार जोगी और उनके बेटे अमित जोगी ने रमन सिंह के साथ मिलकर कांग्रेस उम्मीदवार को ही किनारे लगा दिया था. पहले भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जोगी पर आरोप लगाए थे कि वो रमन सिंह के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. इस टेप के सामने आते ही उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. हालांकि, उनकी पत्नी रेणु अभी भी आधिकारिक तौर पर कांग्रेस के साथ हैं.



जोगी ने नई पार्टी बना तो ली, पर उनकी पुरानी पकड़ और रसूख जाता रहा. छत्तीसगढ़ी में जिसे जंका-मंका (जलवा) कहते हैं, कम हो गया.


कांग्रेसियों की घरवापसी
अगर बदलती हवा के सबसे बड़े पारखी भारत के नेता लोग होते हैं, तो इस बात पर गौर किये बिना नहीं रहा जा सकता कि जोगी के कई करीबी समझे जाने वाले नेता ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस में लौट रहे हैं. पहल तो महेश गागड़ा, वाणी राव और डमरूधर ने की है. ये तीनों ही नेता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं और इसके बाद जोगी के खास रहे उत्तम वासुदेव, डॉ.चंद्रिका साहू, विनोद तिवारी, कोरिया की जिला पंचायत अध्यक्ष कलावती मरकाम जैसे कई बड़े नेताओं की घर वापसी हो गई.


जोगी खुद कांग्रेस में लौटने की बात से इनकार करते हैं, और अब कांग्रेस में भी कम ही लोग हैं जो ऐसा चाहते होंगे, पर रुक रुक कर छत्तीसगढ़ में ऐसी अफवाहें उड़ रही होती हैं कि जोगी जी भी कांग्रेस में वापस आ रहे हैं कि उनके तार अभी भी सीधे सोनिया गांधी और राहुल के साथ जुड़े हैं. पर इस बीच पानी काफी बह गया है और ज़मीन की हकीकत बदल चुकी है.



कांग्रेस के आधार पर जोगी की सेंध!
छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी
कई तरह से पूर्व हो चुके हैं. उनका पूर्व सीएम होना घर की तख्ती पर लगा एक तमगा हो सकता है, लेकिन अपनी पार्टी को जिताने के लिए कांग्रेस के आधार को ही दरका सकते हैं, जिसका फायदा रमन सरकार आसानी से उठा सकती है. जोगी की सक्रियता से कांग्रेस के अंदर वोट खिसकने का डर तो होगा. इधर, मायावती ने अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया और टिकटों का हिसाब ऐसा बैठा है कि 35 सीटों पर बीएसपी तो 55 सीटों पर जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ चुनाव लड़ेगी. कांग्रेस कार्यकर्ता जोगी पर रमन सिंह के साथ खड़े होने का आरोप तो काफी समय से लगा रहे थे, लेकिन मायावती के साथ हुए गठबंधन के बाद कांग्रेस ने कहा कि जोगी एक बार फिर रमन सिंह से अपनी दोस्ती को लेकर एक्सपोज़ हुए हैं.



फिर उठेगी जाति और जनजाति का विवाद
जोगी ने मायावती के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ में चुनाव लड़ने का फैसला है, शायद इसकी बड़ी वजह जोगी की राजनीतिक पकड़ कमजोर होना है. जोगी इस बात को बखूबी समझ गए थे कि टेप लीक होना इस चुनाव में उनकी हार की बड़ी वजह हो सकती है, इसलिए उन्होंने मायावती के साथ अनुसूचित जातियों के वोटर्स को साधने का प्लान बनाया. लेकिन जोगी की जाति को लेकर विवाद आज भी है. वो अनुसूचित जाति से आते हैं लेकिन उनके पास जो प्रमाण-पत्र है उसके अनुसार वो अनुसूचित जनजाति से हैं. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में हैं और जांच के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के पास लंबित है, लेकिन इस पर कहा जाता है कि रमन सिंह से गहराती जोगी की दोस्ती के चलते इसका फैसला अभी तक नहीं आया.


सत्ता और भत्ता की सियासत
रायपुर में युवा रोजगार महासम्मेलन कर ‘तुम मुझे सत्ता दो, मैं तुम्हें भत्ता दूंगा’ के नारे का साथ हुए अजीत जोगी ने बड़ा ऐलान किया. उन्होंने कहा कि सरकार आने पर बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा.



बहरहाल, बेरोजगारी भत्ते का ऐलान कर जोगी ने युवाओं को अलग तरह से अपनी ओर खींचा है, लेकिन पार्टी की अस्थिरता बनी रही तो चुनाव में हार का सामना करना पड़ सकता है. ये चुनाव उनके लिए करो या मरो जैसा है, जहां वो मुख्यमंत्री बने या न बनें, लेकिन इतनी सीटों की जरूर जरूरत है, जो उनके राजनीतिक रुतबे को दोबारा मजबूत कर सके. अगर जोगी हारे तो वे राजनीतिक परिदृश्य से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे. पर ऐसा तो लोगों ने उनके बारे में पहले भी कई बार कहा है.

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