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सुप्रीम कोर्ट ने कोरेगांव-भीमा हिंसा प्रकरण के सिलसिले में गिरफ्तार पांच कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा करने की याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी. शीर्ष अदालत ने कहा कि यह असहमति के स्वर या राजनैतिक विचारधारा में भिन्नता की वजह से गिरफ्तारी का मामला नहीं है.शीर्ष अदालत ने 2:1 के बहुमत के फैसले में इन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की जांच के लिये विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आग्रह भी ठुकरा दिया. न्यायालय ने कहा कि आरोपी चार और सप्ताह के लिये घर में नजरबंद रहेंगे. इस दौरान उन्हें उचित अदालत में कानूनी राहत हासिल करने की स्वतंत्रता होगी, जो गुणदोष के आधार पर मामले पर विचार कर सकती है.
न्यायालय के फैसले को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने राज्य पुलिस की ‘जीत’ करार दिया. महाराष्ट्र पुलिस ने एक महीने राष्ट्रव्यापी छापे में पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. भाजपा ने इस अवसर का इस्तेमाल कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला करने के लिये किया. पार्टी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश करने वाले अर्बन नक्सल का समर्थन करने को लेकर उनका पर्दाफाश हो गया है.
कांग्रेस ने उम्मीद जताई कि पुलिस कानून के अनुसार जांच करेगी और भाजपा की मर्जी के हिसाब से जांच नहीं करेगी.पांचों कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं ने कहा कि न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की असहमति वाली राय में उनके रुख की पुष्टि हुई है.
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने बहुमत की राय से असहमति जताते हुए अपने अलग फैसले में कहा, ‘सत्ता में बैठे लोगों को रास नहीं आने वाले मुद्दों को उठाने वाले लोग भी संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता के हकदार हैं. असहमति सजीव लोकतंत्र का प्रतीक है. अलोकप्रिय मुद्दे उठाने वाले विपक्ष की आवाज को सताकर दबाया नहीं जा सकता है.’
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर के बहुमत के फैसले में कहा गया है, ‘हमारी सोची-समझी राय है कि यह महज नामजद आरोपियों द्वारा जाहिर की गई असहमति भरी राय या राजनैतिक विचारधारा में फर्क होने की वजह से गिरफ्तारी का मामला नहीं है बल्कि प्रतिबंधित संगठन के सदस्यों और उसकी गतिविधियों से उनके संबंधों से जुड़ा है.’
न्यायालय के इस फैसले से उन कार्यकर्ताओं को करारा झटका लगा है जो इन आरोपियों के समर्थन में आए थे और जांच अधिकारियों पर विभिन्न आरोप लगाए थे. शीर्ष अदालत ने कहा, ‘आरोपी जांच एजेंसी बदलने या अदालत की निगरानी में जांच समेत खास तरीके से जांच करने को नहीं कह सकते.’
तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और कहा कि उनके खिलाफ आगे की कार्यवाही पर फैसला न्यायालय की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना मामले के गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा.
न्यायालय ने यह भी कहा कि यह सामग्री की प्रभावकारिता या इसकी पर्याप्तता का मूल्यांकन करने का चरण नहीं है, न ही इस बात की जांच करना संभव है कि क्या यह सही या गढ़ी हुई है क्योंकि इससे पक्षकारों को नुकसान होगा. न्यायालय ने कहा कि अगर उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है तो उचित मौके पर वे आरोप मुक्त करने के विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं.
महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसबंर को ‘एलगार परिषद’ के आयोजन के बाद कोरेगांव-भीमा गांव में हुई हिंसा के मामले में दर्ज प्राथमिकी के सिलसिले में इन पांच कार्यकर्ताओं को 28 अगस्त को गिरफ्तार किया था.
गिरफ्तार किए गए पांच कार्यकर्ता वरवर राव, अरुण फरेरा, वर्नोन गोन्जाल्विस, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा शीर्ष अदालत के आदेश पर 29 अगस्त से अपने-अपने घरों में नजरबंद हैं. इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाज शास्त्र के प्रोफेसर सतीश देशपांडे और मानवाधिकार वकील माजा दारूवाला ने पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी.
पुणे पुलिस प्रमुख के वेंकटेशम ने कहा कि वे मामले में ‘पेशेवर’ तरीके से जांच जारी रखेंगे.
फड़णवीस ने कहा कि अदालत के फैसले ने साबित कर दिया कि असहमति को कुचला नहीं गया है या कार्रवाई के पीछे राज्य पुलिस की ओर से कोई साजिश नहीं थी.
फड़णवीस ने कहा, ‘यह पुणे पुलिस की जीत है जिसने फॉरेसिंक और आरोपों के समर्थन में साक्ष्य जुटाए. हम उचित अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे और गिरफ्तार लोगों की हिरासत लेंगे.’
उन्होंने कहा कि गिरफ्तार लोगों के प्रतिबंधित नक्सली समूहों के साथ संबंध थे और पुलिस ने किसी प्रछन्न इरादे से कार्रवाई नहीं की थी.
आरोपियों की ओर से उठाये गए मुद्दों पर विचार करने से बचते हुए न्यायमूर्ति खानविल्कर ने खुद के लिए और सीजेआई की तरफ से लिखे गए बहुमत के फैसले में उन्होंने कहा कि इस अदालत द्वारा की गई कोई भी टिप्पणी उन लोगों के लिए नुकसानदेह हो सकती है जो इस अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हैं. इससे गंभीर अन्याय हो सकता है.
न्यायमूर्ति खानविल्कर ने कहा, ‘हम इस बात का उल्लेख कर सकते हैं कि हमने प्रासंगिक दस्तावेज वाले रजिस्टर और महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश केस डायरी का अध्ययन किया है. हालांकि, हम उससे निकलने वाली तथ्यात्मक स्थिति पर आगे बढ़ने से बचे हैं क्योंकि उससे किसी आरोपी या अभियोजन के साथ किसी भी तरीके से पक्षपात हो सकता है.’
न्यायालय ने कहा, ‘इस फैसले में की गई टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना कार्यवाही पर फैसला उसके अपने गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा. इस फैसले की गई टिप्पणी सिर्फ रिट याचिका में जांच स्वतंत्र जांच एजेंसी या अदालत की निगरानी में जांच कराए जाने की मांग तक सीमित है. जांच अधिकारी कानून के अनुसार संबंधित आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने को स्वतंत्र हैं.’
न्यायमूर्ति खानविल्कर ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा कथित तौर पर दुर्भावनापूर्ण तरीके से अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने के बारे में याचिका में पांच आरोपियों की गिरफ्तारी के तरीके पर सवाल उठाने के लिये कुछ परिस्थितियों की ओर इशारा करने के अतिरिक्त कोई खास तथ्यात्मक सामग्री और ब्योरा नहीं मिला है.
उन्होंने कहा कि अस्पष्ट और अपुष्ट दावे पर्याप्त नहीं हैं और आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं होने की याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर जांच एजेंसी ने गंभीर एतराज जताया है.
उन्होंने कहा,‘वे जांच के दौरान के साथ-साथ मुकदमे के दौरान विभिन्न चरणों में विभिन्न अदालतों से कानून के तहत स्वीकृत राहत हासिल कर सकते हैं.’
न्यायमूर्ति खानविल्कर ने कहा, ‘जांच के दौरान जब उन्हें पुलिस द्वारा रिमांड हासिल करने या जमानत हासिल करने के लिये उन्हें अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा तो वे उचित चरण में आरोप मुक्त किये जाने या अगर कोई कानूनी साक्ष्य नहीं है तो वे फौजदारी मामले को निरस्त कराने की राहत का विकल्प भी चुन सकते हैं.’
न्यायालय ने राज्य सरकार की इस दलील से सहमति जताई कि जांच एजेंसी बदलने के अनुरोध पर हल्के में विचार नहीं किया जा सकता और न्यायालय को उस शक्ति का इस्तेमाल बेहद सावधानी से करना चाहिए.
न्यायालय ने कहा, ‘परिणामस्वरूप, हमें यह नजरिया अपनाने में कोई झिझक नहीं है कि आरोपी के मित्र की ओर से मामले की जांच स्वतंत्र जांच एजेंसी या अदालत की निगरानी में जांच कराने की रिट याचिका का जनहित याचिका के तौर पर समर्थन नहीं किया जा सकता.’
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