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सरदार वल्लभ भाई पटेल के बाद उनके बेटे और बेटी भी भारतीय राजनीति में रहे. वो कई बार लोकसभा तक भी पहुंचे. लेकिन धीरे धीरे उनका प्रभामंडल कम होता गया. कहा जा सकता है कि नेहरू परिवार ने वल्लभ भाई पटेल के बेटे और बेटी को सांसद तो बनाए रखा लेकिन वो महत्व नहीं दिया, जिसके वो हकदार थे.ये कहना भी सही नहीं होगा कि पटेल के बेटे और बेटी ने अपने पिता के नाम को भुनाने की कोशिश नहीं की. दोनों जब तक राजनीति में रहे, उनकी पहचान सरदार पटेल के ही नाम पर थी. लेकिन ये सही है कि नेहरू और फिर इंदिरा गांधी ने पटेल की संतानों को किनारे ही किए रखा
संतानों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया था
पटेल की बेटी मनिबेन सक्षम राजनीतिज्ञ थीं. उनके अच्छे संपर्क भी थे. बावजूद इसके उनका राजनीति में जगह नहीं बना पाना हैरान करता है. सत्तर के दशक में पटेल के बेटा और बेटी दोनों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया. उनका मानना था कि कांग्रेस को नेहरू परिवार ने हड़प लिया है. पटेल की बेटी मनिबेन पटेल ज्यादा प्रखर और सक्रिय थीं. बेहद ईमानदार. आजीवन अविवाहित रहीं. वर्ष 1988 में उनका निधन हुआ.

सरदार वल्लभभाई पटेल अपनी बेटी मनिबेन और आचार्य कृपलानी के साथ (फोटो सौजन्यः विकीमीडिया कामंस)
नेहरू का ठंडा व्यवहार
मनिबेन के बारे में अमूल के संस्थापक कूरियन वर्गीज ने अपनी किताब में जो जिक्र किया है, वो पढने लायक है. दरअसल कूरियन जब आणंद में थे, तब मनिबेन से उनकी अक्सर मुलाकातें होती थीं, वह सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहती थीं. उन्होंने किताब में लिखा कि मनिबेन ने उनसे बताया कि जब सरदार पटेल का निधन हुआ तो उन्होंने एक खाताबुक और एक बैग लिया. दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू से मिलने चली गईं. नेहरू को इसे सौंप दिया. पिता का निर्देश था कि उनके निधन के बाद इसे केवल नेहरू को सौंपा जाए. बैग में 35 लाख रुपए थे. खाताबुक कांग्रेस पार्टी की थी. नेहरू ने इसे लिया. मनिबेन को धन्यवाद कहा. इसके बाद वह इंतजार करती रहीं कि शायद नेहरू कुछ बोलें. जब ऐसा नहीं हुआ तो वह उठीं और चली आईं.

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ मंत्रणा करते वल्लभभाई पटेल (फोटो सौजन्यः विकीमीडिया कामंस)
कांग्रेस नेता कन्नी काटने लगे थे
कूरियन ने उनसे पूछा, “आप नेहरू से क्या सुनने की उम्मीद कर रही थीं,” जवाब था, “मैने सोचा शायद वह ये पूछेंगे कि मैं अब कैसे काम चला रही हूं या मुझको किसी मदद की जरूरत तो नहीं लेकिन ये उन्होंने कभी पूछा ही नहीं.” निःसंदेह वह आहत हुईं. हैरानी है कि उस दौर में कांग्रेस के ज्यादातर दिग्गज नेता भी उनसे कन्नी काटने लगे. इसमें ज्यादातर ऐसे नेता भी थे, जिनकी कभी न कभी सरदार पटेल ने मदद की थी.
मनिबेन पिता की मदद करती थीं
आखिरी सालों में मनिबेन कीआंख काफी कमजोर हो गई. अहमदाबाद की सड़कों पर वह पैदल अकेले चलती हुई दिख जाती थीं. अांखें कमजोर होने से उनके एक-दो बार लड़खड़ाकर गिरने की भी खबरें आईं. उन्होंने युवावय से ही खुद को कांग्रेस और महात्मा गांधी के प्रति समर्पित कर दिया था. वह लंबे समय तक उनके अहमदाबाद स्थित आश्रम में रहीं. बाद के बरसों में वह पटेल के साथ दिल्ली में रहने लगीं. पिता के रोजमर्रा के कामों को देखतीं. उनकी मदद करती थीं. लिहाजा कांग्रेस के तकरीबन सभी नेता उन्हें अच्छी तरह जानते थे. पटेल के निधन के बाद बिरला ने उनसे बिरला हाउस में रहने को कहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया. तब उनके पास ज्यादा धन भी नहीं था. वह अहमदाबाद में रिश्तेदारों के यहां चली गईं. वह बस या ट्रेन में तीसरे दर्जे में सफर करती थीं. बाद में कांग्रेसी नेता त्रिभुवनदास की मदद से सांसद बनीं.

सरदार पटेल और उनकी बेटी मनिबेन वाइसराय माउंटबेटन और एडविना के साथ
कई बार सांसद रहीं
मनिबेन गुजरात कांग्रेस में असरदार पदों पर रहीं. कई संस्थाओं में आखिरी समय तक ट्रस्टी या पदाधिकारी भी रहीं. मनिबेन लोकसभा के लिए गुजरात के दक्षिणी कैरा से सांसद चुनी गईं. फिर दूसरी बार आणंद से सांसद बनीं. वर्ष 1964 से लेकर 1970 तक राज्यसभा की सदस्य रहीं. जब कांग्रेस टूटी तो उन्होंने मोरारजी देसाई के साथ स्वतंत्र पार्टी की सदस्यता ले ली. हालांकि इसके बाद हालात ऐसे बने कि उन्हें फिर कांग्रेस में लौटना पड़ा. आपातकाल के विरोध में वह फिर इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) छोड़कर कांग्रेस (ओ) में चली गईं. 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर मेहसाणा से लोकसभा चुनाव लड़ा. निर्वाचित हुईं.
मोरारजी बहुत इंतजार कराते थे
सरदार पटेल ने एक जमाने में मोरारजी देसाई की बहुत मदद की थी. लिहाजा मनिबेन को मोरारजी से बहुत उम्मीदें भी थीं. न जाने क्यों वह उनके साथ हमेशा अजीबोगरीब व्यवहार करते थे. जब भी वह उनसे मिलने जाती थीं तो वह उन्हें घंटों बाहर बिठाकर इंतजार कराते थे. एक बार जब एक पत्रकार ने मोरारजी से इस बारे में पूछा तो उन्होंने इसका जिस तरह जवाब दिया, उससे लगा कि मोररजी जानबूझकर ये काम करते थे.

सरदार वल्लभभाई पटेल
पटेल के बेटे भी सांसद बने थे
पटेल के बेटे दहयाभाई पटेल का निधन 1973 में हुआ. वह पढाई के बाद मुंबई की एक इंश्योरेंस कंपनी में काम करने लगे थे. उनके दो बेटे थे-बिपिन और गौतम. बिपिन पहली पत्नी से और गौतम दूसरी पत्नी से. दरअसल उन्होंने पहली पत्नी यसोदा के निधन के बाद दूसरी शादी की थी. दहयाभाई आजादी की लड़ाई में भी कूदे. जेल गए. आजादी के बाद उन्होंने 1957 का लोकसभा चुनाव लड़ा. 1962 में राज्यसभा सदस्य चुने गए. दाहया के बड़े बेटे बिपिन का वर्ष 2004 में निधन हो गया. उनकी कोई संतान नहीं थी. दूसरे बेटे गौतम जिंदा हैं. कुछ साल तक वह अमेरिका में यूनिवर्सिटी में पढाते रहे फिर भारत लौट आए. अब वडोदरा में रह रहे हैं. पटेल के परिवार से जुड़े कुछ और लोग आणंद में रहते हैं, वो बिजनेस में हैं.
पटेल थे बच्चों के राजनीति में आने के खिलाफ
सरदार पटेल अक्सर अपने बच्चों से राजनीति से दूर रहने की सलाह देते थे. उन्हें लगता था कि लोग उनकी पोजिशन का बच्चों के जरिए गलत फायदा उठा सकते हैं. उन्हें लगता है कि इसे हर सियासी दल अपने अपने तरीके से भुनाने लगेगा.
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