Tuesday, 31 October 2017

इंदिरा की हत्‍या के दिन और उसके बाद वो श्‍ाहर बदल गया


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ये दोपहर के आसपास का समय था. आसमान में जगह जगह धुएं के गुबार उठते नजर आ रहे थे. काले गुबार. दूर से पास आती कुछ आवाजें. कुछ मिनट बाद बहुत से लोग अपने सिर और कंधों के ऊपर टीवी, आलमारियां और गठरी में बंधे तमाम सामान लिए भागते हुए दिखने लगे.मैं उस समय मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे मनेंद्रगढ़ में पिता के साथ रहकर पढ़ रहा था. उम्र किशोरवय की थी. सरगुजा जिले का ये कस्बा आर्थिक तौर पर संपन्न कस्बा था. ठीक-ठाक व्यापारिक केंद्र. व्यवसाय में सिखों का अच्छा-खासा दखल था. बड़ी बड़ी दुकानें उनकी थीं. गुरुद्वारे में रविवार के दिन काफी भीड़ दिखती थी. कहा जा सकता है कि वहां की सामाजिक व्यवस्था में उनकी खास जगह और खास रूतबा था.


बदला हुआ था वो दिन
ये एक खुशनुमा कस्बा था. जहां आमतौर पर झगड़े फसाद नहीं होते थे.  कर्फ्यू क्या होता है, वो यहां के लोगों ने शायद अखबारों में ही पढ़ा था. 31 अक्टूबर 1984 का दिन बदला हुआ था. दिन की शुरुआत आम दिनों की तरह हुई. बदलते हुए मौसम में थोड़ी गुलाबी ठंडी वाली सुबह. दीवाली गुजरे कुछ ही दिन बीते थे. स्कूल और दफ्तर आमदिनों की तरह खुले. उन दिनों न तो आज की तरह मोबाइल फोन थे. न ही लैंडलाइन फोनों का संजाल था. बहुत कम जगहों पर लैंडलाइन फोन होते थे. दूर बात करने के लिए एसटीडी सुविधा नहीं होती थीं. टेलीफोन एक्सचेंज को फोन कर ट्रंककॉल मिलवाना पड़ता था. कंप्यूटर और इंटरनेट तब दूर की कौड़ी थे.शहर धड़ाधड़ बंद हो रहा था
एेसे में सुबह दस बजे के आसपास उस छोटे से कस्बे में भी न जाने कैसे खुसफुसाहट शुरू हो चुकी थी कि इंदिरा जी पर उनके सुरक्षागार्डों ने गोलियां चलाई हैं. हालत गंभीर है. मैं उस दिन स्कूल नहीं गया था. पड़ोस के एक अंकल को किसी दूसरे से ये कहते सुना. 11-12 बजे तक तक तो तूफान ही आ चुका था. पिताजी ऑफिस बंद करके घर लौट आए थे.


शहर धड़ाधड़ बंद हो रहा था. आशंकाएं और अनिष्ट की बू तेजी से फैल रही थी. अब तक ये खबर बहुत साफ तरीके से फैल चुकी थी कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सिख सुरक्षागार्डों ने हत्या कर दी. हालांकि आकाशवाणी और टीवी पर ऐसी कोई खबर नहीं थी. आकाशवाणी ने तो इसे बहुत बाद में दिया. ज्यादातर लोगों को ये खबर बीबीसी रेडियो के विशेष बुलेटिन से मिली, जिस पर उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था.


समझ में नहीं रहा था क्या करें
कुछ लोग रो रहे थे. कुछ की आंखों में आंसू थे. एक ऐसी घड़ी थी, जब किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया और अब क्या किया जाए. प्रशासनिक अफसरों और पुलिस के हाथपांव फूल गए थे. वो खुद किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में थे.


लूटमार शुरू हो गई
जिनके पास फोन थे और जिनके परिचित दिल्ली में थे. वो फोन एक्सचेंज से दिल्ली ट्रंक कॉल करने के लिए कह रहे थे. कुछ लोगों ने दिल्ली में अपने परिचितों को फोन करने के बाद खबर दी कि दिल्ली में बलवा शुरू हो गया है. जगह जगह आग लगाई जा रही है, दुकानें लूटी जा रही हैं. सिखों को निशाना बनाया जा रहा है.


इस खबर ने किसी पर असर किया हो या नहीं किया हो, लेकिन उपद्रवियों के लिए मानो एक संदेश जैसा था. कुछ ही देर बाद उस कस्बे में भी सिखों की दुकानें और घरों में लूटमार शुरू हो गई. जिसे जो हाथ लग रहा था, वो दुकानों से लूटकर ले जा रहा था. इसमें सभी ने हाथ साफ किया. जिसने नहीं किया, वो कुछ हासिल करने के लिए भाग रहा था.


दोपहर दो बजे तक कर्फ्यू
दोपहर दो बजे तक कर्फ्यू लगाया जा चुका था. सड़कें सूनी पड़ गईं थीं. हालांकि, उस कस्बे में नाममात्र की पुलिस और एक थाना था, जिसे इस हालत से पार पाना था. उनके लिए ये सब बहुत मुश्किल था. इस जगह के लिए तो कर्फ्यू एकदम नई बात थी. लोगों का कहना था कि आजादी के बाद से यहां पहली बार कर्फ्यू लगा है. शहर में आशंकाई शांति पसरी हुई थी. पुलिस के पास जो एक खटारा जीप थी, उसी पर लाउडस्पीकर के जरिए कर्फ्यू के बारे में बताया जा रहा था.


शटर गिरे हुए थे, कुछ दुकानें जली हुईं
मेरे जैसे किशोर को ये तो मालूम था कि कर्फ्यू गंभीर स्थिति होती है. लेकिन इसके बाद भी हम तीन साथी कौतुहलवश शहर की हालत देखने निकल पड़े. घर से बाजार वाला इलाका बमुश्किल डेढ़ दो किलोमीटर दूर था. बाजार से पहले तो लोग इक्का दुक्का नजर आ भी रहे थे. जब मुख्य इलाके में पहुंचे तो वहां वाकई जबरदस्त सन्नाटा पसरा था. हर शटर गिरे हुए. कुछ जली और टूटी दुकानें नजर आ रही थीं. हम कुछ और आगे बढ़ पाते कि पुलिस की जीप राउंड लगाते हुए बगल से गुजरी.


थाना तक सूना पड़ा था
पहले तो पुलिसवालों ने कसकर डांटा. फिर हमें जीप में बिठाकर थाने ले गए. अब तक हमें बताया जा चुका था कि तुम लोगों ने कानून तोड़ा है. अब जेल की हवा खाओगे. समझ क्या रखा है. थाना सूना पड़ा था. वहां बमुश्किल एक दो सिपाही रहे होंगे, क्योंकि बाकी तो जीप पर बैठकर गश्त पर निकले थे. कुछ देर तक हमें वहीं बिठाया गया. फिर सभी से पिताओं और घरों के बारे में पूछा गया. एक पिता कॉलेज में टीचर थे. शायद पुलिस वाले उन्हें जानते थे. ये हमारे लिए राहत की बात थी. हमें चेतावनी और कर्फ्यू क्या होता है-ये बताकर छोड़ा गया. घर पहुंचने पर जो गत बनी सो अलग.


रात चूल्हे नहीं जले
वो शाम वाकई भयावह थी. उदासी की चादर अंधेरे से कहीं ज्यादा मोटी हो जा रही थी. आकाशवाणी ने शाम के समय विस्तार से खबर देनी शुरू की. टीवी दिनभर शोकधुन बजाता रहा. इंदिरा जी के निधन के बाद उस शाम बहुत कम लोगों के यहां चूल्हे जले होंगे.


Article source: https://hindi.news18.com/videos/hum-to-puchenge-46-1142854.html

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