Monday, 30 October 2017

बीजेपी का मास्टरप्लान- ठाकरे Vs ठाकरे की लड़ाई से खिलेगा ‘कमल’


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महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना को पटखनी देने के लिये बीजेपी ने मास्टरप्लान बनाया है. बीजेपी का ये मास्टरप्लान पिछली कांग्रेस-एनसीपी की सरकार के दौरान आजमाया गया वो सफल फॉर्मूला है जिसे अपनाकर कांग्रेस ने 2009 में मुंबई में अपना परचम लहराया था और सभी दलों को चारों खाने चित कर दिया था. क्या है ये मास्टरप्लान ये बताने से पहले आपको बताते हैं कि आखिर कैसे राज ठाकरे के गुंडों ने मुंबई में कोहराम मचा रखा है.एमएनएस के मार-पीट का वीडियो
मुंबई और आसपास के महानगरों में मारपीट के ये दृश्य अब आम होते जा रहे हैं. एमएनएस के गुंडे जब चाहे जिस फेरीवालों की पिटाई कर रहे हैं. उसके सामान को सड़कों पर फेंक रहे हैं. इस मारपीट के बहाने एमएनएस अपने आपको फिर एक बार पुर्नजीवित करना चाहती है ये तो सब जानते हैं, लेकिन सवाल ये है कि आखिर महाराष्ट्र सरकार राज ठाकरे और उनके गुंडों पर अंकुश क्यों नहीं लगा रही है?


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सूत्रों की मानें तो एमएनएस के बढ़ते कदमों में ही बीजेपी को आने वाले चुनावों में सफलता का रास्ता दिखाई दे रहा है क्योंकि एमएनएस का कद जितना बढ़ेगा उतनी ही चोट शिवसेना के परंपरागत मराठी बैंक में लगेगी.बीजेपी जानती है कि शिवसेना और एमएनएस में अगर मराठी वोटबैंक का बंटवारा हुआ तो इसका सीधे-सीधे फायदा बीजेपी को होगा. विपक्ष भी बीजेपी की इस चाल से परिचित है इसलिये कांग्रेस एनसीपी ने आरोप लगाया कि बीजेपी के आश्रय पर ही राज ठाकरे के गुंडे बेखौफ हो गये. 


मराठी वर्सेस उत्तर भारतीय की लड़ाई में कैसे जीती थी कांग्रेस?
गौरतलब है कि कांग्रेस एनसीपी की सरकार ने भी इसी तरह राज ठाकरे को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर मराठी लोगों का मसीहा बनकर उभरने में मदद की और मराठी मानुष के मुद्दे पर संघर्ष करने वाले शिवसेना के कोर वोटबैंक में जबरदस्त सेंध लगाई.


2009 के लोकसभा चुनाव में इसका फायदा ये हुआ कि सभी उत्तर भारतीय मतदाता कांग्रेस एनसीपी के खेमे में आ गये. शिवसेना एमएनएस के बीच मराठी वोटों में बंटवारा हो गया और कांग्रेस-एनसीपी ने मुंबई में लोकसभा की सभी 6 सीटों पर फतह हासिल कर ली. इसी चाल को बीजेपी फिर एक बार चलने की कोशिश कर रही है.


आखिर क्यों चुप हैं शिवसेना?
राज ठाकरे के फेरीवालों के खिलाफ शुरू आंदोलन के बाद से ही मुंबई में मराठी अस्मिता वर्सेस उत्तर भारतीय का माहौल बन गया है. उत्तर भारतीय खौफ में हैं. वहीं एमएनएस मराठी मतदाताओं के मन में फिर एक बार उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर भरने की कोशिश कर रही है. ऐसे में इस मुद्दे पर शिवसेना की खामोशी काफी मायने रखती है.


दरअसल, शिवसेना के सामने दुविधा की स्थिति हैं. क्योंकि अगर शिवसेना उत्तर भारतीयों का साथ देती है तो मराठी लोग नाराज़ हो जायेंगे और अगर मराठी लोगों का साथ देती हैं तो जो उत्तर भारतीय मतदाता हिंदुत्व के नाम पर शिवसेना का साथ देते हैं वो बिछड़ जायेंगे. इसके इतर अगर वो राज ठाकरे का समर्थन करते हैं तो शिवसैनिकों और शिवसेना के मतदाताओं में संभ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है.


ऐसे में फिलहाल इस मुद्दे पर कुछ ना कहकर इस मुद्दे के ठंडे होने की रणनीति पर शिवसेना चल रही है. और वैसे भी मुंबई में शुरू हुई मराठी वर्सेस फेरीवालों की इस लड़ाई के लिये काफी हद तक शिवसेना ही जिम्मेदार है क्योंकि बीएमसी पर राज करने के नाते शहर से अवैध फेरीवालों को हटाना शिवसेना का ही काम है. जो उन्होंने नहीं किया और अब एमएनएस उसे मुद्दा बना रही है.


बीजेपी का सपोर्ट नहीं मिला
वहीं एमएनएस दावा कर रही है कि उनके पीछे बीजेपी का सपोर्ट नहीं हैं बल्कि वो अपने दम पर इस पूरे आंदोलन को चला रही है. एमएनएस प्रवक्ता संदीप देशपांडे ने दावा किया है कि अगर बीजेपी का सपोर्ट होता तो हमारे कार्यकर्ता जेल में नहीं जाते. हमें सिर्फ मराठी लोग और राज ठाकरे का सपोर्ट है.


झूठे हैं आरोप
वहीं भाजपा ने एमएनएस की हिंसा को बढ़ावा देने के सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है. बीजेपी प्रवक्ता केशव उपाध्याय ने कहा कि कानून अपना काम कर रहा है. हम किसी को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं. कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जा रही है.


बेबस है आम आदमी
बीजेपी और एमएनएस भले ही इन आरोपों से इनकार कर रही हो लेकिन जिस तरह एमएनएस के गुंडे बेखौफ हो चुके हैं, ऐसे में इन दांवों पर यकीन करना मुश्किल है. बहरहाल सत्ता हासिल करने की इस सियासत के बीच हर बार की तरह इस बार भी आम आदमी पिस रहा है.


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Article source: https://hindi.news18.com/videos/sau-baat-ki-ek-baat-154-1108965.html

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