Monday, 30 October 2017

REVIEW: क्‍या वाकई विवादित है नवाज की किताब


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जब नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी की किताब मेरे घर आई तो मेरे माता पिता का पहला रिएक्शन हैरानी का था, ”अरे, इसकी इतनी जल्दी किताब आ गई ?”मैंने उनकी तरफ़ देखा और फिर किताब की तरफ़ बने नवाज़ के चेहरे को, हां, इस कलाकार की यही दिक्कत रही. लोगों को लगता है कि वो बेहद नए हैं, कल ही तो आए हैं. लेकिन वो 1999 से बॉलीवुड में काम कर रहे हैं और यही लंबी जर्नी उनकी किताब ‘एन ऑर्डिनरी लाइफ़’ में नज़र आती है.


निहारिका सिंह के साथ उनके अंतरंग संबंधों के विवरण और सुनीता राजावर के साथ उनके प्रेम प्रसंग पर सुनीता के कड़े विरोध के बाद किताब चर्चा में आ गई है, लेकिन इस किताब में नवाज़ के प्रेम प्रसंगों के अलावा भी बहुत कुछ है.


ये किताब दरअसल नवाज़ की ज़िंदगी का डॉक्यूमेंट है और उनके सफल दिनों से ज्यादा उनके बचपन, परिवार और उनके स्ट्रगल के दिनों पर फ़ोकस करती है.नवाज़ुद्दीन उत्तरप्रदेश के बुढ़ाना ज़िले से आते हैं और उनके दादा एक बेहद रईस ज़मींदार थे लेकिन उनकी चार पत्नियों में से सबसी छोटी पत्नी के बेटे और नवाज़ के पिता नवाब सिद्दिकी के हिस्से में इस दौलत का बड़ा हिस्सा नहीं आया.


नवाज़ के पिता गरीबी में रहे और आजीविका के लिए उन्होनें कई काम किए लेकिन कोई भी काम सिरे नहीं चढ़ पाया और जैसा कि किताब में लिखी कुछ बातों से पता चलता है कि वसीयत में मिली ज़मीन-जायदाद या तो बिक गई या फिर नवाज़ के ताऊ ने हड़प ली.


इस किताब की ख़ास बात है इसका किस्सागोई वाला अंदाज़. नवाज़ के साथ इस किताब को पूर्व पत्रकार और लेखिका रितुपर्णा चटर्जी ने भी लिखा है लेकिन वो कहीं भी इस किताब पर हावी नहीं रही.


उनका रोल इस पूरे प्रोजेक्ट में लोगों को चीज़ें याद दिलाना, लंबा इंटरव्यू लेना और नवाज़ की फ़्लो ऑफ़ इवेंट्स बनाने में मदद करने तक ही सीमित रहा है क्योंकि किताब की भाषा से ही लगता है कि नवाज़ खुद बात कर रहे हैं और जहां जहां शब्द चयन मुश्किल हुआ है, नवाज़ की आम ज़िंदगी की फ़िलॉसफ़ी को सुंदर शब्दों में बयान किया गया है, पता चल जाता है कि कलम किसी और के हाथ में है.


नवाज़ की दादी एक अनुसूचित जाति से आती थी ऐसे में जातिगत भेदभाव उनके परिवार ने झेला है और इस बात को नवाज़ ने किताब में खुल कर कहा है.


भारतीय लोगों के गोरे रंग से लगाव और अपने ही देश में होने वाले रंगभेद पर भी नवाज़ खुल कर टिप्पणी करते हैं.


बचपन में पहलवानी और फिर मुहर्रम के जूलूस में पट्टाबाज़ी के खिलाड़ी रह चुके नवाज़ुद्दीन इस किताब में अपनी परवरिश और इस परवरिश में अपने मां बाप को आई कठिनाईयों को खुल कर बयां करते हैं.


अगर आप बॉलीवुड गॉसिप ढूंढने के लिए इस किताब को खोलना चाहते हैं तो सिवाय निहारिका सिंह के किस्से और एकाध फ़िल्म रोल के मिलने की कहानी के अलावा आपको इस किताब में कुछ नहीं मिलेगा.


शाहरुख ख़ान के साथ रईस फ़िल्म के दौरान का एक छोटा सा किस्सा, फ्रीकी अली में अरबाज़ ख़ान का एक मज़ाक, अभिनेता विजय राज और राजपाल यादव के साथ कुछ नोंक झोंक और बेटी शोरा की सलमान ख़ान से नफ़रत के अलावा बॉलीवुड गॉसिप में आपको कुछ नहीं मिलेगा.


उन्होनें इस किताब से बॉलीवुड को उतना ही दूर रखा है, जितना वो बॉलीवुड को अपने घर से दूर रखते हैं.


नवाज़ किताब में कहते हैं कि वो चाहते हैं कि उनके बच्चे फ़िल्मी माहौल से दूर रहें और पहले अपनी पढ़ाई पूरी करें, दुनिया को जाने समझें और फिर अगर उनका टेस्ट बॉलीवुड में डवलप हो तो वो इस ओर कदम रखें.


किताब में एक चैप्टर अनुराग कश्यप के लिए लिखा गया है और बॉलीवुड से अकेले वही हैं जिन्हें इतनी जगह मिली है. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर से लेकर, देव डी के आइटम सॉन्ग तक और गुलाल में आखिरी वक़्त तक निकाले जाने के किस्से नवाज़ ने साझा किए हैं.


अनुराग को वो बॉलीवुड का गेम चेंजर मानते हैं और डार्क फ़िल्मों को मेनस्ट्रीम में लाने का असली श्रेय वो अनुराग को देते हैं, “निर्माता ऐसी फ़िल्मों में पैसे नहीं लगाते जिनमें स्टार्स ना हों. लेकिन अनुराग की ज़िद रहती है कि वो रिएलिस्टिक लोकेशन्स पर ही शूट करेगा, जैसे उसने गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के लिए किया. रियल लोकेशन पर शूट करना बहुत मुश्किल काम होता है, ख़ासतौर पर किसी स्टार के साथ ऐसे में अनुराग ने सब नए लोगों को ले लिया. इस बात से परेशान होकर फ़िल्म का निर्माता UTV पीछे हट गया लेकिन अनुराग नहीं माना. आज लोग मानते हैं कि अगर वो मेरे (नवाज़) जैसे को हीरो बना सकता है तो किसी को भी हीरो बना सकता है.”


इस किताब से नवाज़ुद्दीन के अंदर का फ़िलॉसफ़र और कमाल का ऑबजर्वर भी सामने आता है.


नवाज़ के शब्दों में, “मैंने अपनी ज़िंदगी में लोगों को देख कर ही सब सीखा है. मैं लोगों को महसूस करता हूं और फिर पर्दे पर उन्हें ढाल देता हूं. हमारे यहां की मीडिया मुझसे अक्सर पूछती है कि मैं किससे इंस्पायर्ड हूं, लेकिन सच ये है कि मेरे आसपास के किरदारों को ही मैंने देखा है और पर्दे पर ढाल दिया है जैसे लंचबॉक्स का शेख, जो दरअसल और कोई नहीं मेरा रूममेट मुकेश था. वो हर बार मिलता तो पूछता था, अपनी तुतलाती आवाज़ में, कैसे हैं सर? मैंने उसी किरदार को फ़िल्म में उतार दिया लेकिन मेरी यह गलती भारी पड़ी. मुकेश भी एक एक्टर था और जब लंचबॉक्स रिलीज़ हुई तो उसके बाद मुकेश को काम मिलना मुश्किल हो गया. निर्देशक उसे मेरी नकल उतारने से मना करते. उसे काम मिलना बंद हो गया. मैंने उससे इस बारे में बात भी की लेकिन शायद वो मुझे माफ़ नहीं कर पाएगा.”


इस किताब में नवाज़ ने अपनी पहली विवादित शादी का भी ज़िक्र किया है और खुल कर अपना पक्ष रखा है. नवाज़ ने बताया है कि किस तरह से उनकी पहली बीवी के परिवारजनों ने तलाक़ लेने के लिए उनसे उगाही की हालांकि यह एक तरह से अपनी सफ़ाई देना लगता है और यह नवाज़ के हिस्से का सच है सो वो इसे किताब में लिख भी देते हैं.


यह पूरी किताब नवाज़ के परिवार और उनके नज़रिए से दुनिया कैसी है इसके इर्द गिर्द घूमती है लेकिन…


लेकिन ये खलता है कि इस किताब में वो दुनियाभर की बातें करते हैं, बुढ़ाना के लोगों की पिछड़ी सोच, जातिवाद, रिलेशनशिप और संभ्रांत वर्ग पर कड़ी टिप्पणियां करते हैं पर बॉलीवुड की परंपरा को फ़ॉलो करते हुए अपने साथी कलाकारों के बारे में कुछ नहीं कहते.


सभी जानते हैं कि लंचबॉक्स के बाद से अभिनेता इरफ़ान ने उनके साथ काम नहीं किया है लेकिन इरफ़ान के साथ अपने संबंधों के बारे में वो कोई बात नहीं करते. लंचबॉक्स के बारे में कई बार ज़िक्र आता है लेकिन वो इरफ़ान का सिर्फ़ नाम लेते हैं और निकल जाते हैं.


वो स्टारडम के भरोसे अपनी दुकान चला रहे बॉलीवुड के सुपरस्टार्स की कड़ी आलोचना करते हैं लेकिन किसी बड़े सितारे का नाम नहीं लेते. वो कहते हैं कि बॉलीवुड के बड़े बड़े स्टार्स एक ही जैसा काम और एक ही जैसे रोल कर के ज़िंदा है, वो इसमें हॉलीवुड से मार्लन ब्रैंडो और अल पचीनो का नाम तक ले देते हैं लेकिन बॉलीवुड के किसी सुपरस्टार का वो ज़िक्र भी नहीं करते.


यहां साफ़ होता है कि नवाज़ किसी पर भी सीधी टिप्पणी करने से साफ़ बच गए और उन्होनें बॉलीवुड का ‘ब्रो कोड’ निभाया है, हां अगर उन्होंने किसी का नाम लिया तो वो या तो अपने प्रियजनों का, या फिर उन अभिनेत्रियों/ महिलाओं का जिनके साथ वो कभी संबंध में रहे और जो आज उतना बड़ा नाम नहीं है जितना कि नवाज़ खुद.


नवाज़ की इस किताब कि आलोचना इसलिए भी की जा सकती है कि इस किताब में वो बहुत जगह खुद को साफ़ करते भी नज़र आते हैं, वो सुनीता राजावर के धोखे को तो जगह देते हैं लेकिन चित्रांगदा के साथ हुई कंट्रोवर्सी का ज़िक्र तक नहीं करते.


वो निहारिका सिंह का नाम खुल कर लेते हैं लेकिन वो अपने पहले प्यार का नाम बदल देते हैं. वो अपने भाई शमास के उपर एक पूरा चैप्टर लिख देते हैं, कंगना रनौत की बात भी करते हैं लेकिन नेपोटिज़्म पर होंठ नहीं खोलते.


फिर नवाज़ थिएटर से मन उठ जाने की बात भी कहते हैं और इसे मुश्किल माध्यम कहते हैं.


हालांकि वो यह बात पूरे अधिकार से कह सकते हैं क्योंकि उन्होनें अपने हिस्से की ज़िंदगी जी है, उन्होनें सालोंसाल थिएटर और नुक्कड़ किया है, पैसा कमाने के लिए चौकीदार की नौकरी की है, पारले जी बिस्कुट और चाय पर पूरा दिन काटा है, तीन दिन तक भूखा रहने के बाद दोस्त से 50 रुपए उधार लेकर खाना भी खाया है, सो अपने हिस्से की जंग उन्होनें लड़ी है ऐसे में वो बहुत सी बातें अधिकार से कह सकते हैं.


लेकिन इस किताब में आपको कमियां दिखेंगी, ऐसा लगेगा कि कुछ विवादित बातों में अपने पक्ष को बेहतर ढंग से रखने की भी नवाज़ कोशिश कर रहे हैं और कहीं कहीं वो बहुत प्रीची हो जाते हैं जिसे हिंदी में ज्ञान देना कहते हैं.


अगर आप नवाज़ की फ़िल्मों की ही तरह उनकी इस किताब में थ्रिल तलाशने आए हैं तो आपको निराशा हो सकती है लेकिन आज वो जो कुछ भी हैं, जैसे भी हैं – कैसे बने हैं – इसके लिए इस किताब से अच्छा डॉक्यूमेंट नहीं है.


बस एक शिकायत है कि किताब छोटी है और नवाज़ का करियर अभी बहुत दूर जाना है, बहुत से किस्से हैं जो उन्होनें अमिताभ बच्चन, सलमान ख़ान, ओम पुरी, संजय दत्त, रणबीर कपूर जैसे कलाकारों के साथ काम के दौरान साझा किए होंगे. उनकी भी एक अलग किताब लिखी जा सकती है शायद इस किताब के एक सीक्वल के तौर पर. तब बात में कुछ और मज़ा आएगा.

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