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क्रिकेट की पिच पर स्कोर के रिकॉर्ड बनाने वाले सचिन तेंदुलकर राज्यसभा में बतौर राज्यसभा सदस्य शून्य पर आउट हो गए. 27 अप्रैल 2012 को राज्यसभा के लिए मनोनीत हुए सचिन 27 मार्च 2018 तक सदन में रहे. लेकिन इस पूरे कार्यकाल में बिना बोले विदा हो गए.वहीं अपनी आवाज और अभिनय से सिनेमा जगत पर राज करने वाली अभिनेत्री रेखा फिल्म में किसी अतिथि भूमिका की तरह संसद में बेहद कम मौकों पर मौजूद रहीं. यही वजह रही कि जब भी वे संसद में आईं तो उन्हें निहारते हुए कई सांसदों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं.
रेखा और सचिन जैसे मशहूर सेलिब्रिटी और युवाओं के आयकन जब राज्यसभा में मनोनीत किए जाते हैं तो देश के आम नागरिक की आंखों में उम्मीद और उत्साह की रंगत उतर आती है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन दोनों के साथ ही और भी कई हस्तियां रही हैं जिन्हें अपने क्षेत्र में बेहतर काम के चलते राज्यसभा में मनोनीत किया गया, लेकिन अपने 6 साल के लंबे कार्यकाल में न तो वे संसद में उपस्थित रहे और न ही बतौर सांसद कोई सार्थक पहल या मुद्दा उठा सके.

संसद से बाहर आतीं अभिनेत्री रेखा
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक निर्मल पाठक कहते हैं कि रेखा और सचिन की तरह ही गायिका लता मंगेशकर को भी राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया, लेकिन शायद ही उन्होंने कभी राज्यसभा में कदम रखा हो. हालांकि सेलिब्रिटी या सिने-अभिनेता और अभिनेत्रियों के मामले में ऐसा अक्सर होता है. मनोनीत सदस्य ही नहीं लोकसभा के लिए चुने गए अभिनेताओं की उपस्थिति और जिम्मेदारी भी संसद के प्रति शून्य ही रही है. इस मामले में अभिनेता धर्मेंद्र और गोविंदा का उदाहरण ले सकते हैं.

संसद में सचिन तेंदुलकर और रेखा. (PTI)
राज्यसभा के लिए मनोनीत सदस्यों की बात करें तो मनोनयन के नियम और परंपरा से इतर इन्हें संसद में लाने की कुछ और भी वजहें हैं. मसलन सेलिब्रिटी और अभिनेता-अभिनेत्रियों की फैन-फालोइंग ज्यादा होती है. राजनीतिक पार्टियों की रणनीति होती है कि चुनाव के आसपास ऐसे लोगों को संसद में लाया जाए तो इसका लाभ चुनाव के दौरान उनके हिस्से में आ सकता है और असल में इसका फायदा मिलता भी है. वहीं मनोनीत सदस्यों को भी लगता है कि यह कुछ अलग है और उनके क्षेत्र से हटकर है तो वे मनोनयन के लिए तैयार हो जाते हैं.

शत्रुघ्न सिन्हा और रेखा
निर्मल पाठक आगे कहते हैं कि उद्योगपतियों को लाने के पीछे उद्योगपतियों और पार्टियों के हित होते हैं. उद्योगपति संसद में आकर कुछ बोलेंगे इसकी उम्मीद कम ही होती है. लेकिन संसद में रहकर उद्योग धंधों के विस्तार से लेकर लाभ और संभावनाओं को तलाशने में मदद मिलती है. हालांकि अभी तक का रिकॉर्ड बताता है कि श्याम बेनेगल, जावेद अख्तर, शबाना आजमी जैसे लोग जो एक्टिविस्ट रहे हैं, इन्होंने संसद में कम ही सही लेकिन चर्चाओं में शामिल होने से लेकर सवाल पूछने में योगदान दिया है.

संदन में सचिन रमेश तेंदुलकर और रेखा .
सचिन की 6 साल की पारी को निराशाजनक बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार देव प्रिय अवस्थी का कहना है कि खेलों के विकास के लिए सचिन तेंदुलकर से कुछ सकारात्मक कदमों की उम्मीद थी, लेकिन पूरे कार्यकाल के दौरान दिसंबर 2017 में सिर्फ एक बार सचिन ने बोलने की कोशिश की थी, वह भी सफल नहीं हो सकी. ये लोग अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं. लेकिन संसद में आने के बाद ये अपने क्षेत्र, संस्कृति, कला पर भी बात नहीं करते हैं. सचिन सिर्फ क्रिकेट के मैदान तक सीमित रहे, संसद में आने के बाद भी देशभर के युवा खिलाड़ियों के लिए उन्होंने कोई पहल नहीं की.

सचिन तेंदुलकर संसद सत्र के दौरान
ऐसे में मनोनयन के समय ही इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिन लोगों का मनोनयन कर रहे हैं उनसे कुछ नतीजे मिलेंगे या ये सिर्फ शोपीस बनकर आएंगे और चले जाएंगे. रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकार भी मनोनीत हुए थे, जो संसद में किसी भी अन्य सांसद से ज्यादा सक्रिय रहे और विभिन्न मुद्दों पर आवाजें उठाईं. मनोनीत सदस्यों की सीट भरकर इसे उदासीन बनाने से अच्छा है कि मनोनयन की परंपरा ही खत्म हो.

parliament
राजनीतिक पत्रकार निर्मल यादव बताते हैं कि इस बार मनोनीत सदस्यों में रेखा और सचिन के साथ ही इंडस्ट्रियलिस्ट अनु आगा का भी कार्यकाल खत्म हुआ है. वहीं जून में वकील के पारासरन का भी कार्यकाल पूरा होने जा रहा है. इस दौरान सचिन की ओर से करीब 22 सवाल सदन में रखे जरूर गए लेकिन कोई सवाल उन्होंने पूछा नहीं और न ही उन्होंने किसी संसदीय चर्चा में कभी हिस्सा लिया. यहां तक कि उनकी उपस्थिति भी सदन में कम रही.

रेखा
जबकि रेखा की ओर से कभी कोई सवाल सदन में नहीं आया. वे कभी-कभी संसद में दिखाई दीं. अनु आगा और के पारासरन ने भी कोई सवाल सदन में नहीं पूछा और चर्चाओं में हिस्सा नहीं लिया. हालांकि ये आधे से ज्यादा वक्त सदन की कार्यवाही में शामिल हुए. मनोनीत सदस्यों का यह नजरिया निराशाजनक है. जबकि इनकी विशेषज्ञता देश के काम आ सकती है. लेकिन संसदीय कार्यवाही के प्रति उदासीनता से अक्सर ही सुधार की गुंजाइशें खत्म हो जाती हैं.
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