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कुछ समय पहले तक बीजेपी के युवा नेता अर्जित शाश्वत को कोई नहीं जानता था लेकिन आज वह बिहार सीएम नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं. बिहार के 38 में से 7 जिलों में साम्प्रदायिक तनाव फैला हुआ है.भागलपुर की स्थानीय अदालत ने अर्जित के खिलाप वॉरंट जारी किया है जिसके बाद से वह फरार हैं. वह केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे हैं. अर्जित को बचाने के लिए कई बीजेपी नेताओं ने नीतीश से मिन्नतें की. नीतीश ने सीधा जवाब दिया कि कानून अपना काम करेगी.
नीतीश की परेशानी यहां खत्म नहीं हूई. जिस दिन पटना में भगवान राम की शोभा यात्रा में नीतीश ने बीजेपी नेताओं के साथ हिस्सा लिया उसी दिन अर्जित ने भी पटना में एक इंटरव्यू दे दिया. इस मौके का फायदा विपक्ष में बैठी आरजेडी और कांग्रेस ने जमकर उठाया.
लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने कहा, “नीतीश कुमार बीजेपी के स्पेयर टायर हो गए हैं. पार्टी अपनी जरूरत के हिसाब से नीतीश का इस्तेमाल करती है.”उपचुनाव नतीजे आने के बाद से ही माहौल तनावपूर्ण हो गया था. अररिया में एक वीडियो वायरल हो गया था जिसमें कुछ युवा एंटी-नेशनल नारे लगा रहे थे, वहीं दरभंगा में एक चाय बेचने वाले का सिर काटने की घटना का वीडियो भी वायरल हुआ था.
इसके बाद राम नवमीं से महज एक दिन पहले भागलपुर से साम्प्रदायिक झड़प की खबरें आई. सामने आया कि अर्जित ने राम नवमीं के मौके पर अल्पसंख्यक बहुल इलाके में बाइक रैली निकाली. इस दौरान अल्पसंख्यकों के लिए अपमानजनक नारे भी लगाए गए जिसका स्थानीय नागरिकों ने विरोध किया. कुछ देर में यह घटना झड़प में तब्दील हो गई.
इसके बाद औरंगाबाद, नालंदा, मुंगेर, आरा और समस्तिपुर में माहौल तनावपूर्ण बने हुए हैं. नीतीश कुमार ने प्रभावित जिलों में भारी सुरक्षाबल की तैनाती करवाई है और वह खुद स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं.
अर्जित को लेकर विपक्ष की कड़ी आलोचना झेलने के बाद पुलिस ने गुरुवार को समस्तिपुर में हिंसा भड़काने के आरोप में दो प्रमुख बीजेपी नेताओं को गिरफ्तार किया है. यह गिरफ्तारी बीजेपी को रास नहीं आ रही है.
बीजेपी की कोर कमिटी की गुरुवार को बैठक बुलाई गई और इसमें एक साफ मैसेज दिया गया- ग्राउंड लेवल पर पार्टी के किसी कार्यकर्ता को ठगा हुआ महसूस नहीं कराया जाना चाहिए. डिप्टी सीएम सुशील मोदी, बिहार बीजेपी प्रमुख भूपेंद्र यादव और अन्य वरिष्ठ नेता इस बैठक में शामिल हुए. मिली जानकारी के अनुसार सुशील मोदी से साफ कहा गया कि ग्राउंड लेवल पर पार्टी को मजबूत बनाने की दिशा में कोई कॉम्प्रोमाइज नहीं किया जाएगा.
मीटिंग के दौरान बीजेपी उपाध्यक्ष देवेश कुमार ने न्यूज 18 को बताया, “हम नीतीश के साथ यह गठबंधन जारी रखना चाहते हैं और इसे लेकर किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए. लेकिन इसके साथ ही बीजेपी अपनी पार्टी को मजबूत बनाने की दिशा में काम करती रहेगी. हम अपनी विचारधारा को लेकर कोई समझौता नहीं करेंगे.”
शुरुआत में हां-न करते हुए बीजेपी अब खुले तौर पर अर्जित का समर्थन कर रही है और पुलिस के एक्शन को गलत बता रही है. गिरिराज सिंह के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री राम कृपाल यादव ने कहा कि अर्जित को फ्रेम किया गया है और उसे न्याय मिलेगा.
अब नीतीश कुमार के पास बहुत कम ऑप्शन हैं. भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता से सामान्य दूरी बनाकर चलने की बात नीतीश के लिए कहना भले ही आसान हो पर करना काफी मुश्किल है. पिछले साल 27 जुलाई को आरजेडी-कांग्रेस से गठबंधन तोड़ बीजेपी से हाथ मिला नीतीश कुमार अपनी थोड़ी चमक पहले ही खो चुके हैं.
एनडीए में नीतीश की वापसी ने यह तो सुनिश्चित कर दिया कि अब आगे वह बीजेपी के साथ ही रहेंगे लेकिन अपनी शर्तों पर नहीं. साल 2013 से पहले जब नीतीश कुमार ने आठ सालों तक बीजेपी के साथ गठबंधन में सरकार चलाई तब वह बीजेपी से अपनी शर्तों पर जुड़े थे. 2013 में नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज होकर वह बीजेपी से अलग हुए थे, उन्होंने इसके लिए बीजेपी की बंटवारे की राजनीति को दोष दिया था.
हालांकि, अपने पुराने विरोध लालू प्रसाद यादव के साथ वह केवल 17 महीनों तक सरकार चला सके. इसके बाद ‘दमघोंटू’ अनुभव और लालू परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का हवाला देते हुए उन्होंने अपना पाला बदल लिया. नीतीश ने लालू को छोड़ा तो MY (मुस्लिम-यादव) समुदायों ने भी नीतीश को छोड़ दिया.
ऐसे में उनके पास लालू के पास वापस जाने का ऑप्शन नहीं है और कई जेडीयू नेताओं ने भी यह बात स्वीकार की है. लेकिन दबकर रहना और कुछ नहीं करना नीतीश का नेचर नहीं है. तो वह एनडीए में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि गठबंधन की जिन पार्टियों को अब तक वह इग्नोर कर रहे थे उन्हें अपने साथ ला सकें.
इसी दिशा में वह 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के मौके पर लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) नेता राम विलास पासवान के साथ मंच साझा करेंगे. दिल्ली में जेडीयू का चेहरा कहे जाने वाले केसी त्यागी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक इवेंट होगा.
पासवान के करीब आना नीतीश के लिए एक नया अनुभव होगा. साल 2005 में नीतीश ने सरकार बनाने की कोशिश की थी लेकिन एलजेपी के 12 विधायकों ने उनका समर्थन करने से इनकार कर दिया था तब से नीतीश और पासवान अलग-अलग ही रहे.
बिहार का राजनीतिक इतिहास ऐसे बदलावों से भरा हुआ है. पासवान से नजदीकी बढ़ाकर वह बीजेपी के खिलाफ एक प्रेशर ग्रुप तैयार कर अपनी पार्टी के लिए वोटबैंक तैयार करना चाहते हैं. संभवतः एक दलित और गैर यादव ओबीसी/ईबीसी वोटर्स जिनका वोट शेयर करीब 38 प्रतिशत है.
अपने अगले कदम में उपेंद्र कुशवाह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से संपर्क कर सकते हैं. पासवान की तरह ही कुशवाह ने बंटवारे की राजनीति के खिलाफ नीतीश का खुलकर समर्थन किया है.
कुशवाह दो बार जेडीयू से जुड़े और अलग हो गए. साल 2013 में उनके जेडीयू से अलग होने के बाद पुलिस ने उनका सरकारी मकान जबरदस्ती खाली करवाया था. पहले नीतीश को लव-कुश (कुर्मी और कोरी) समाज का एकमात्र प्रतिनिधि माना जाता था लेकिन कुशवाह ने कोरी वोट अपनी तरफ खींच लिए. राज्य में इनका वोट शेयर करीब 6 प्रतिशत है. उनके साथ आने से नीतीश को फायदा मिलेगा.
एनडीए में रहते हुए यह ग्रुप मुस्लिम वोटरों को भी अपने फेवर में ला सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश का सेक्युलर स्टैंड और पासमांडा मुस्लिमों को पासवान का लंबे समय से मिल रहा सहयोग उनके काम आ सकता है.
पासवान के पास 2005 में 29 विधायक थे, उन्होंने घोषणा की थी जो पार्टी मुस्लिम उम्मीदवार को अपना सीएम बनाएगी वह उसे अपना समर्थन देंगे.
नीतीश के करीबियों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और ओडिशा में नवीन पटनायक की तरह नीतीश अपनी पार्टी की कोई निर्णायक पहचान नहीं बना पाए हैं.
फिलहाल सत्ता में बने रहने के लिए नीतीश को एनडीए में रहते हुए बीजेपी का समर्थन चाहिए लेकिन इसके साथ ही सेक्युलरिज्म की अपनी सौगंध को बैलेंस करने का एक बड़ा टास्क उनके सामने है. उन्हें यह भी मालूम है कि चुनाव में बेहतर परफॉर्म करने के लिए जेडीयू को एक सहयोगी की आवश्यकता है.
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