Tuesday, 27 March 2018

कैदियों की भीड़ से जेलों का घुट रहा दम


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जेल शब्‍द कानों में पड़ते ही आंखों के सामने सलाखें और उसके पीछे बंद कैदियों की तस्‍वीर घूमने लगती है. लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है. भारत की जेल आज बदहाली, अव्‍यवस्‍था और भीड़ का पर्याय बन गई है. यही वजह है कि जेलों में बंद कैदियों का नहीं, बल्कि कैदियों की भारी भीड़ के चलते जेलों का दम घुट रहा है.देशभर में बढ़ते अपराध और अपराधियों के साथ-साथ जेलों में बढ़ती भीड़ भी सिरदर्द बनती जा रही है. यही कारण है कि देश के सर्वोच्‍च न्‍यायालय को इस मामले में दखल देना पड़ा है. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कैदियों के मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों की बात कही है.


सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों के भी कुछ मूल अधिकार और मानवाधिकार हैं, लेकिन राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ध्यान नहीं दे रहे हैं. यह दुखद है


सुप्रीम कोर्ट


नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो की रिपोर्ट 2015 के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय जेलों में क्षमता के मुकाबले 114.4 फीसदी ज्‍यादा कैदी बंद हैं. जहां 1401 जेलों की क्षमता 3, 66, 782 कैदियों को एक साथ बंद करने की है. वहीं इन जेलों में 4, 19, 623 से ज्‍यादा कैदी बंद हैं.



2015 के इन आंकड़ों के मुकाबले 2016, 17 और 2018 में कैदियों की संख्‍या में लगातार बढ़ोत्‍तरी हो रही है. जबकि जेलों की संख्‍या सीमित है. ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जेलों में बंद सजा भोग रहे कैदियों की हालत कितनी बदहाल है. राज्‍यों की बात करें तो दादरा और नगर हवेली में 276.7 फीसदी ज्‍यादा कैदी जेलों में बंद हैं. वहीं छत्‍तीसगढ़ में यह आंकड़ा 233.9 फीसदी और देश की राजधानी दिल्‍ली में 226.9 फीसदी है.


जेल सुधार कार्यकर्ता डॉ. वर्तिका नंदा का कहना है कि कुछ राज्‍यों में 600 फीसदी से भी ज्‍यादा कैदी बंद हैं. केरल एेसा ही राज्‍य है. पूरे देश की 149 जेलों में हालात सबसे ज्‍यादा बदतर हैं. इनमें राजधानी सहित उत्‍तर प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ आदि राज्‍यों की जेलें शामिल हैं.



प्रतीकात्मक तस्वीर.

नंदा कहती हैं कि जेलों पर ध्‍यान न देने के चलते आज ये स्थिति पैदा हुई है. कई ऐसे कैदी हैं, जिन्‍हें जमानत मिल चुकी है, लेकिन उनके पास पैसे नहीं हैं और वे जेलों में पड़े हैं.


वहीं राष्‍ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के अंडर सेक्रेटरी कमल सिंह कहते हैं कि नालसा लगातार कैदियों को कानूनी मदद उपलब्‍ध कराता है. ये उन कैदियों के लिए है जो जेल से बा‍हर आना चाहते हैं. गृह मंत्रालय के अंतर्गत इसपर काम भी चल रहा है. नालसा के कॉर्डिनेशन में एक साफ्टवेयर तैयार कराया जा रहा है, जिसमें कैदियों का, उनकी सजा और उनके अपराध का पूरा डाटा हो. ताकि सजा काटकर बाहर जाने की कोशिश कर रहे इन कैदियों को कानूनी मदद पहुंचाने में इसका सहयोग लिया जा सके.



demo pic

हालांकि इस साॅफ्टवेयर से अभी तक करीब 700 जेलों को ही जोड़ा जा सका है. इससे ज्‍यादा जेलें अभी बाकी हैं. जेलों को कंप्‍यूटराइज्‍ड भी किया जा रहा है. 436 ए में जिनकी सजा आधी हो गई है, उनके लिए काम चल रहा है, हालांकि उन्‍हें कोर्ट ही छोड़ेगा. नालसा ने रिपोर्ट भी सौंपी है. राज्‍यों को जेलों में भीड़ कम करने के लिए जेलों की संख्‍या बढ़ानी होगी.


वहीं वर्तिका कहती हैं कि जेलों के प्रति संवेदनशीलता की जरूरत है. अपराध की सजा देना अलग बात है, लेकिन असंवेदनशील होना और मानवाधिकारों का उल्‍लंघन होना दूसरी बात है. इस सोच को खत्‍म करने की जरूरत है कि अपराधी जेल के अंदर है, काम खत्‍म, किसी का क्‍या जा रहा है?



File Photo

आज जेलों पर तेजी से काम होने की जरूरत है. खुली जेलें बननी चाहिए. सभी राज्‍यों को इसके लिए आगे आना चाहिए.


महिला और पुरुष कैदियो के लिए अलग जेल होनी चाहिए. जो मां हैं और उनके बच्‍चे जेलों में साथ हैं, उनके लिए अगल व्‍यवस्‍था हो. देशभर में जितने भी एनजीओ जेल सुधार पर काम कर रहे हैं वे सभी जुड़कर काम करें. अकेली महिलाओं को जेल से बाहर निकलने पर सुरक्षा और समाज के दवाब से बचाने के लिए कोशिश होनी चाहिए. इन कैदियों से जेलों में सिर्फ पापड़ और अगरबत्‍ती बनवाने के बजाय अन्‍य काम भी कराए. इनका पुनर्वास और सुधार के लिए कदम उठाए.



सांकेतिक फोटो

एक साल में जेलों में 1584 कैदियों ने तोड़ा दम
जेलों में अव्‍यवस्‍थाओं के कारण अकेले 2015 में 1584 कैदी मौत के मुंह में समा गए. इन मौतों में 1469 प्राकृतिक मौतें हैं, जबकि 115 अप्राकृतिक मौतें हैं. महिला कैदियों की 51 मौतों में से 48 प्राकृतिक रूप से मरीं. जबकि तीन महिलाओं की मौत अप्राकृतिक रूप से होने की बात सामने आई है.


22 कैदियों पर है एक स्‍टाफ
देशभर की जेलों में स्‍टाफ भी कम है. झारखंड में एक स्‍टाफ पर सबसे ज्‍यादा कैदियों का बोझ है. यहां 22 कैदियों पर एक स्‍टाफ है. वहीं उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में 13 कैदियों पर एक स्‍टाफ काम करता है. बिहार और पंजाब में 11 जबकि दिल्‍ली, असम और छत्‍तीसगढ़ में एक स्‍टाफ 10 कैदियों को संभालता है. गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में जेलों से कैदियों से भागने की घटनाएं भी बढ़ी हैं. 2015 में ही 89 कैदी जेलों के अंदर से भाग गए.


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