Thursday, 1 March 2018

MP उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद क्या महाराजा को मिलेगा राजा का साथ?


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जय श्री पिंगलेमध्य प्रदेश कांग्रेस में पिछले एक दशक से दो ही फैक्टर हैं एक राजा और दूसरा महाराजा. ये जीत का मंत्र भी है तो सत्ता से कोसों दूर रहने का सबब भी. मुंगावली और कोलारस के उपचुनाव में कांग्रेस की जीत ने एक बार फिर इस फैक्टर को आमने-सामने ला दिया है. क्या इस जीत के बाद महाराजा यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के सीएम चेहरे के नजदीक पहुंच गए हैं? क्या राजा यानी दिग्विजय सिंह की राजनीतिक ताकत पर ये जीत एक दबाव बनकर उभरेगी? कांग्रेस हलकों में इस गर्माहट का एहसास तब और महसूस किया जा सकता है जब इस जीत के बाद कांग्रेस के सीनियर लीडर कमलनाथ खुल कर कहते हैं कि सिंधिया को सीएम प्रोजेक्ट किया जाए तो वे इसका स्वागत करेंगे.


इंतजार सिर्फ दिग्विजय सिंह का
तो इसका मतलब क्या ये है कि अब इंतजार सिर्फ दिग्विजय सिंह का है. मध्य प्रदेश में चुनाव को सिर्फ आठ महीने बाकी हैं और अब तक ऐसी कोई कवायद नज़र नहीं आ रही है जिससे पार्टी वर्कर को ये महसूस हो कि राजा-महाराजा एक हो चुके हैं. कार्यकर्ता बिखरे हुए हैं क्योंकि उनके नेता दिग्विजय सिंह हैं. दूसरी और सिंधिया को चुनाव जीतने वाला चेहरा बताकर कई बड़े नेता हाईकमान तक लॉबिंग कर रहे हैं.कद ऊंचा किया
कांग्रेस का एक खेमा मानता है कि मुंगावली और कोलारस की जीत ने सिंधिया के कद को ऊंचा किया है. जब पूरी शिवराज सरकार लगी हुई हो तब सिंधिया एक वनमैन आर्मी की तरह भिड़ते नजर आए. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चालीस से ज्यादा रैलियां 18 से ज्यादा मंत्रियों की तैनाती और अकेले भिड़ते सिंधिया. इस चुनाव ने साबित कर दिया कि वह जनता की पसंद बनकर उभरे हैं. उन्होंने जिस तरह चुनाव का सामना किया वो उन्हें एक कुशल संगठक की तरह साबित कर रहा है.


सिंह के नजदीकी नेता पक्ष में नहीं
क्या अब सिंधिया आने वाले चुनाव में सीएम का चेहरा बनकर उभरेंगे ? दिग्विजय सिंह के नजदीकी नेता इसके सीधे पक्ष में नहीं दिखते. वे मानते हैं कि ये इलाका पूरी तरह से सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र का है इसलिए इस जीत के कोई बड़े मायने नहीं है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, जो सीधे तौर पर दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाते हैं, ने अपनी नपी तुली प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कांग्रेस सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ती है और ये चुनाव सभी नेताओं के बेहतरीन तालमेल का परिणाम है. सीएम का चेहरा कौन होगा ये पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी तय करेंगे.


कांग्रेस की वापसी चाहते हैं
सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच की कड़ी के बतौर अपनी पहचान रखने वाले पूर्व मंत्री महेश जोशी मानते हैं कि इस जीत ने कांग्रेस हाईकमान को यकीन दिलवाया है. उनका दावा कि उनके साथ व्यक्तिगत चर्चाओं में दिग्विजय सिंह कह चुके हैं कि पार्टी किसे भी लीडर बनाकर पेश करे वह प्रदेश में कांग्रेस की वापसी चाहते हैं. प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा का कहना है कि कांग्रेस में सीएम प्रोजेक्ट कर चुनाव नहीं होते.


अपने प्रभाव क्षेत्र में ही नहीं जितवा पाए
दिग्विजय समर्थक एक नेता का तो यहां तक कहना है कि 2013 के चुनाव में चुनाव अभियान समिति का प्रभारी बनाकर सिंधिया को मैदान में उतरा था वे सिंधिया रियासत के इलाके जैसे ग्वालियर, भिंड,मुरैना, विदिशा, उज्जैन नहीं जितवा पाए. आज भी राजा को साधे बगैर चुनाव जीतना मुश्किल है.


बीजेपी का वोट बैंक भी साथ
सिंधिया समर्थक वरिष्ठ नेता प्रमोद टंडन का कहना है कि एक ईमानदार और बेदाग छवि और चुनाव जीतवाने वाला चेहरा तो महाराज का ही है. सिंधिया का युवा नेतृत्व उन लोगों को भी आकर्षित करता है जो बीजेपी का वोटबैंक है.


चुनाव के बाद भूल जाते हैं
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि चुनाव सिर्फ चेहरे से नहीं जीते जाते. दिग्विजय सिंह इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं इसलिए आज तक वे अपने कार्यकर्ता के साथ जीवंत संपर्क में रहते हैं. सिंधिया को लेकर कई नेताओं की शिकायत है कि वे चुनाव के बाद भूल जाते हैं. दिग्विजय जहां हर कार्यकर्ता को बराबरी का दर्जा देकर दिल जीत लेते हैं, वही सिंधिया इस मामले में कमजोर साबित होते हैं.


बहरहाल, दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बावजूद माना जा रहा है कि सिंधिया का भविष्य तभी तय होगा जब कमलनाथ की तरह दिग्विजय सिंह भी राजी हो.


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Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/manoranjan/pyar-ka-punchnama-2-review-by-rajeev-masand-418271.html

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