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पूर्वोत्तर में बीजेपी की शानदार जीत को महज संयोग या करिश्मा नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके पीछे बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति और प्रयास को देखना जरूरी है. कुछ लोगों को यह जीत सत्ता के खिलाफ लहर लग सकती है, लेकिन सच सिर्फ यही नहीं है.वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने पूर्वोत्तर में बीजेपी, संघ और सरकार का काम बताते हुए कहते हैं “यह जीत बीजेपी के हार्डवर्क का नतीजा है. सुनील देवधर नार्थ ईस्ट में बीजेपी के फुल टाइम कार्यकर्ता हैं. बीजेपी ने वहां दो साल पहले ही बूथ लेवल पर अपने इंचार्ज बना लिए थे. जब पार्टी 10 करोड़ सदस्य बनाने का अभियान चला रही थी तो पूर्वोत्तर में लोगों का रुझान देखने को मिला.”
उपासने के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता संघ की स्थापना के एक दशक बाद से ही इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. संघ और बीजेपी में समन्वय का काम देखने वाले सह सरकार्यवाहक डॉ. कृष्ण गोपाल नॉर्थ-ईस्ट में लंबे समय तक रहे हैं. वहां आरएसएस की शाखाएं चल रही हैं. वनवासी कल्याण आश्रम लंबे समय से जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर काम कर रहा है. चुनाव से ठीक पहले गुवाहाटी में आरएसएस का बड़ा कार्यक्रम हुआ था.”
शून्य से शिखर तक, ऐसे कामयाब हुई रणनीतिसियासी जानकारों का कहना है कि हिंदी पट्टी के प्रदेशों में सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की नजर पूर्वोत्तर पर लगी हुई थी. दोनों नेताओं को पूर्वोत्तर में सफलता का स्वाद चखने की संभावना दिखी और उन्होंने यहां पर सियासी जमीन तैयार करना शुरू कर दिया.
यूं ही नहीं चला पूर्वोत्तर में बीजेपी का जादू
गैर हिंदीभाषी क्षेत्र की वजह से पूर्वोत्तर में बीजेपी बहुत मजबूत नहीं रही है. त्रिपुरा की बात करें तो 2013 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 50 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी. उसे सिर्फ 1.54 फीसदी वोट मिले थे.
मेघालय की 60 में से 13 सीटों पर पार्टी ने चुनाव लड़ा और सभी पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी. सिर्फ 1.27 फीसदी वोट हासिल हुए थे. नगालैंड में 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसमें उसने 1 सीट के साथ खाता खोला था. जबकि आठ सीटों पर उसकी जमानत जब्त थी. लेकिन असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में सरकार बनने के बाद उसके हौसले बुलंद जरूर थे.
कांग्रेस, लेफ्ट के मुकाबले ज्यादा आक्रामक रही बीजेपी
सबसे पहले आरएसएस प्रचारक से चुनाव रणनीतिकार बने सुनील देवधर को नॉर्थ ईस्ट का प्रभारी बनाया गया. देवधर ने तीन साल पहले सत्ताधारी वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ बीजेपी का चुनाव अभियान संभालने के लिए त्रिपुरा का रुख किया. अमित शाह ने राहुल गांधी और लेफ्ट के केंद्रीय नेताओं से पहले त्रिपुरा में कैंप किया.
पार्टी ने हर ब्लॉक और बूथ स्तर पर संगठन की स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण कर उसे खड़ा किया. छोटी पार्टियों से समझौता किया. दूसरे दलों के नेताओं को बीजेपी में शामिल करने का जोखिम उठाया.
आरएसएस का मिशन पूर्वोत्तर बहुत पुराना है. इसका भी बीजेपी को फायदा मिला
पार्टी ने माणिक सरकार गवर्नमेंट के खिलाफ जनता के गुस्से को भाजपा के वोट में बदलने के लिए ‘मोदी लाओ’ की जगह ‘माणिक हटाओ’ के नारे पर जोर दिया. ‘माणिक सरकार दृश्यम और सत्यम’ नामक एक किताब के सहारे सरकार के कामकाज का कच्चा-चिट्ठा खोला और बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में सफलता पाई.
सरकार का पूर्वोत्तर प्रेम
मोदी सरकार ने चुनाव से पहले पूर्वोत्तर प्रेम दिखाना शुरू कर दिया था. पार्टी ने यह दावा किया कि 2014-15 के मुकाबले 2016-17 में पूर्वोत्तर के लिए दोगुनी परियोजनाएं दी गईं हैं. जानकारों का कहना है कि उज्जवला योजना की वजह से वहां काफी लोगों ने लकड़ी जलाना बंद कर गैस से खाना बनाना शुरू किया है. मेघालय को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर में रेल नेटवर्क पहुंच गया है.
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