Tuesday, 28 November 2017

क्या आम आदमी पार्टी को है ‘अपने-आप’ से खतरा!


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“आज हम इस देश की वो उम्मीद बनकर उभरे हैं जिसे हमें और आगे लेकर जाना है. आज यह पार्टी देश के आम आदमी की आवाज है…यह आवाज संसद में भी पहुंच चुकी है, विधानसभाओं में पहुंच चुकी है, नगर निगमों में भी पहुंच चुकी है. देश की उन सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए सड़क पर भी पूरी धमक के साथ मौजूद है जो देशहित और जनहित को दरकिनार करते हुए देश की जनता को लूट रही हैं…”आम आदमी पार्टी की स्थापना के पांच साल पूरे होने पर यह बात दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कही. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह पार्टी और कितना आगे जाएगी, जबकि पार्टी के अंदर चल रही खींचतान और कलह थमने का नाम नहीं ले रही है.


पार्टी जब से बनी है तब से उसके अंदर और बाहर दोनों तरफ चुनौतियां ही चुनौतियां हैं. कुमार विश्वास पार्टी के अंदर रहकर ही व्यंग्य बाण चला रहे हैं तो दूसरी ओर पंजाब जैसे राज्य मेें जहां जीत की उम्मीद थी, वहां हार का मुंह देखना पड़ा. निसंदेह आम आदमी पार्टी का सक्सेस रेट अन्य पार्टियों से अधिक है, लेकिन भविष्य में उसके सामने कठिनाइयां भी कम नहीं दिख रही हैं.


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हितों का टकराव जारी


इसका गठन सामाजिक कार्यकर्ता अन्‍ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के लोकपाल आंदोलन से जुड़े सहयोगियों ने 26 नवंबर 2012 को किया था.


इस दौरान पार्टी से कई नामी लोग जुड़े, लेकिन चुनाव में अपनी बड़ी जीत दर्ज करवाने के बाद से ही पार्टी में अंदरूनी सत्ता संघर्ष बढ़ता गया.


या खुद निकल गए या निकाल दिए गए


विनोद कुमार बिन्‍नी, शाजिया इल्‍मी, कैप्टन जीआर गोपीनाथ, सुच्चा सिंह छोटेपुर, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और कपिल मिश्रा समेत कई दिग्गज किसी न किसी वजह से या तो पार्टी छोड़ गए या फिर उन्हें पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने तो ‘स्वराज इंडिया’ नाम से अपनी पार्टी बना ली.


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पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रोफेसर आनंद कुमार ने भी पार्टी से तौबा कर ली. इस समय ओखला के विधायक अमानतुल्ला और पार्टी नेता कुमार विश्वास के बीच खुलकर जंग जारी है. पार्टी के कोटे में आने वाली राज्यसभा सीटों को लेकर भी अंदरूनी खींचतान बताई जाती है.


आजकल दो-चार माह में ही बदल जाता है माहौल


आम आदमी पार्टी ने बीजेपी और कांग्रेस के विकल्प के तौर पर अपने आपको प्रस्तुत किया. उसके साथ कुछ अच्छे लोग जुड़े थे. लेकिन बाद में यह अन्य पार्टियों की तरह व्यक्तिपरक राजनीति में फंस गई.


भदौरिया के मुताबिक “पंजाब चुनाव में हार के बाद अब गुजरात चुनाव में भी पार्टी की पकड़ से इसकी दिशा तय होगी. आजकल दो-चार माह में ही किसी भी पार्टी के खिलाफ माहौल बदल जाता है. इसलिए पार्टी को वादों पर खरा उतरना होगा और पीड़ित दिखाने की राजनीति से बचने की कोशिश करनी होगी तभी यह लंबा सफर तय करेगी.”


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क्या है भविष्य?


‘आप’ का भविष्य कैसा है? इस सवाल का जवाब हमने सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक प्रोफेसर एके वर्मा से तलाशने की कोशिश की. उन्होंने कहा “आम आदमी पार्टी का उभार कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर अन्ना आंदोलन के भावावेश में हुआ था. लेकिन ‘आप’ अपने आपको विकल्प के तौर पर पेश नहीं कर पाई. पार्टी ने दिल्ली में कुछ अच्छे काम किए हैं, उसका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इसमें गंभीरता नहीं आई. इसलिए एक-एक कर इसका थिंक टैंक अलग हो गया.”


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वर्मा कहते हैं कि “अब कोई पार्टी यदि सिर्फ अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पर केंद्रित रहेगी तो फिर वह दूसरों से अलग कैसे होगी और कैसे आगे बढ़ेगी. अपवाद स्वरूप इसने दिल्ली में 70 में से 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी, ऐसा अवसर शायद ही दोबारा आएगा. क्योंकि अब जनता किसी पार्टी को समझने में देर नहीं लगाती.”


Article source: https://hindi.news18.com/videos/bhaiyaji-kahin-61-1168268.html

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