Monday, 26 March 2018

क्या ममता बनर्जी 2019 के चुनाव को दिलचस्प बना देंगी ?


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तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली के दौरे पर हैं तो स्वाभाविक है की राजनीतिक गलियारों में उथल-पुथल होगी ही. राजनीतिक विशेषज्ञ दीदी की इस दिल्ली-यात्रा का विश्लेषण कर ये मान रहे हैं की तीसरे-मोर्चे की तैयारी हो रही है जिसमें कांग्रेस शामिल नहीं है.तृणमूल कांग्रेस पार्टी का अध्यन करने वाले एक विशेषज्ञ ने कुछ और ही अनुमान लगाए हैं. वो कहते हैं कि ममता बीजेपी के खिलाफ गठबंधन खड़ा करने में एक कैटेलिस्ट का काम करेंगी. दक्षिण की पार्टियां और उत्तर में भी ऐसे दल हैं जिसे कांग्रेस का नेतृत्व मंजूर नहीं है. ऐसे में ममता ही एक ऐसी मंत्री हैं जो सबको एक साथ एक प्लैटफॉर्म पर ला सकती हैं.


गौरतलब है के दीदी और कांग्रेस की रिश्तों में खटास ज़रूर आई है. लेकिन ये रिश्ते कमज़ोर नहीं पड़े हैं. हाल ही में बंगाल के राज्यसभा की पांच सीटों में से जहां चार तृणमूल के उम्मीदवार चुने गए वही पांचवीं सीट पर तृणमूल की मदद से कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी को जीत मिली.


ममता इस समय एक हाथ कांग्रेस और दूसरी ओर गैर-बीजेपी, गैर-कांग्रेस दलों के साथ संपर्क में हैं. वो अरविन्द केजरीवाल और शरद पवार से मिल रही हैं. इसका अर्थ क्या ये है कि कांग्रेस का राजनीतिक महत्त्व कम हो गया है? शायद नहीं…तीसरे मोर्चे के निर्माण में एक और दिलचस्प पहलु है जो इस बार के किसी भी गठबंधन को मजेदार बनाता है. अब तक तीसरा मोर्चे में लेफ्ट पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. इस बार लेफ्ट के लिए दो बड़े सवाल हैं. किसी भी गठबंधन में कांग्रेस के साथ क्या वह रहेंगे या नहीं. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में इस बात पर दो अलग-अलग राय हैं. पार्टी अब अपनी आगामी बैठक में इस बात पर निर्णय लेगी.


अगर तीसरे मोर्चे की अगवाई तृणमूल करेगी तो क्या वो थर्ड फ्रंट में शामिल होंगे? इस सवाल का जवाब लेफ्ट नेतृत्व में कोई देने को तैयार नहीं है. संसद में तो विपक्ष में सब एक हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में जिस पार्टी से उसकी हार हुई उसके साथ कैसा गठबंधन? वही दूसरी ओर बंगाल में कमज़ोर विपक्ष देख कर बीजेपी खाली मैदान में जम कर बैटिंग करने में लगी है.


ऐसे माहौल में दीदी कौन सा गणित सामने रखती हैं जिससे बीजेपी को टक्कर दी जा सकेगी? उत्तर प्रदेश के उप-चुनावों में मायावती-अखिलेश के ताल-मेल से एक बात तो साफ है की चुनावों को पुराने तरीके से लड़ा नहीं जा सकता. बिखरते वोटों से अब कोई चुनाव जीता नहीं जा सकता. ममता भी इस बात को बखूबी समझती हैं. वो जितना कांग्रेस को जानती हैं उतना ही बीजेपी को भी. एनडीए के साथ काम करने का भी उनको आभास है. लड़ाई तो बीजेपी-बनाम विपक्ष की ही. अगर विपक्ष एक साथ नहीं हुआ तो 2019 में बीजेपी की जीत तय है.


Article source: http://khabar.ibnlive.com/news/desh/4g-vodafone-india-mumbai-service-technology-416702.html

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