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त्रिपुरा का चुनाव परिणाम संसदीय वामपंथी दलों, खासकर सीपीएम के लिए साफ और अहम संदेश लेकर आया है. यह संदेश है कि अब वाम राजनीति करने के लिए कांग्रेस के कंधे के सहारे की जरूरत नहीं है. इन नतीजों ने सीपीएम के भीतर और बाहर येचुरी-करात डिबेट में करात की लाइन को मजबूत करने का काम किया है. केरल के वाम बनाम कांग्रेस के समीकरण को सही ठहराया है.पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों का लगातार कमजोर होना पहले ही इंगित कर चुका था कि संसदीय वामपंथ को अपने राजनीतिक कार्यक्रम पर मंथन करने की जरूरत है, मगर इसके बजाए संसदीय वामपंथी इस बहस में उलझे हैं कि वह सांप्रदायिक राजनीति को हराने के लिए कांग्रेस के साथ राजनीतिक मंच शेयर करे या नहीं. देशभर में हो रहे सामाजिक आंदोलनों में वह कांग्रेस से मदद ले या नहीं.
पिछली बार यानी 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार सीपीएम के वोटों में पांच फीसदी की गिरावट आई है- 48 से घटकर 43 फीसदी. त्रिपुरा में भाजपा को 2013 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 1.5 फीसदी वोट मिले थे और 50 में 49 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी.
स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के अनुसार , “वाम मोर्चे को 2013 के चुनाव में कुल 50 सीटें मिली थीं कांग्रेस के मामले में सबसे बड़ा उलटफेर हुआ है- पिछली बार 36 फीसदी वोट लाने वाली कांग्रेस इस बार डेढ़ फीसदी पर सिमट गई है. मतलब ये कि भाजपा को साफ तौर पर 40 फीसदी वोटों की बढ़त त्रिपुरा में लगभग मुफ्त में मिली मानी जाएगी. डेढ़ फीसदी वोट उसके पिछली बार थे. कुल हुए 41.5 फीसदी जबकि अभी चुनाव आयोग की साइट भाजपा के 42.4 फीसदी वोट दिखा रही है. यानी संघ की कुल मेहनत 0.7 फीसदी सकारात्मक वोट हासिल करने में गई. बाकी सब नकारात्मक वोट है यानि भाजपा की कांग्रेसमुक्त परियोजना वाला वोट.”
वाम की राजनीति पर करीबी से नजर रखने वाले अभिषेक का मानना है कि , “त्रिपुरा के मौजूदा जनादेश और पश्चिम बंगाल में दो चुनाव पहले के जनादेश की तुलना करें, तो एक दिलचस्प संदेश निकलेगा. ममता बनर्जी के पहली बार विजयी होने के वक्त शायद सीपीएम इस बात को न समझ पाई हो कि कांग्रेस के साथ रहकर जीतना अब मुश्किल होता जा रहा है, लेकिन इस बार उसके नेताओं को यह बात समझ में आनी चाहिए. सवाल उठता है कि फिर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मोर्चे का क्या होगा? ये सवाल तभी तक है जब तक वाम दल कांग्रेस के कंधे पर सिर रखकर सपने देखेंगे. कंधा झटककर अपना काम दिखाने और अपनी पहचान वापस पाने की किसी योजना के बगैर यह उहापोह बना रहेगा कि कांग्रेस को छोड़ें या पकड़ें.”
दूसरे माणिक सरकार अपने पूर्ववर्ती नृपेन भट्टाचार्य की तरह नितांत ईमानदार व्यक्ति हैं, लेकिन उनकी पार्टी वैचारिक दिवालिएपन की शिकार है. 32 साल में बंगाल में क्रांतिकारी चेतना को और क्रांतिकारी दिशा देने की बजाय कुंद किया उसी तरह तमाम ईमानदारी के बावजूद त्रिपुरा में पार्टी ने को बचाने में असफल रहे.
अभिषेक के अनुसार कुल मिलाकर निष्कर्ष एक ही है- बीजेपी देश को कांग्रेसमुक्त कर पाए या नहीं, पर कांग्रेस ज़रूर डूबते-डूबते देश को वाममुक्त कर जाएगी. एक बार राजनीति वाममुक्त हो गई, फिर यह कहना तो मुश्किल होगा कि बीजेपी और कांग्रेस दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? तो आखिरी सबक ये है कि वाम राजनीति को न्यूनतम इसलिए बचे रहना होगा ताकि वह कांग्रेस और बीजेपी की नूराकुश्ती पर लगातार जनचेतना को जागृत रखे. आज की स्थिति में वाम से यह भी नहीं हो रहा है. यही भारत में वामपंथ सबसे बड़ा संकट है.

(प्रतीकात्मक तस्वीर)
पिछले लगभग छह दशकों के संसदीय अनुभव के साथ सीपीआई और सीपीएम जैसी वाम पार्टियों ने जुमलेबाजी में कुछ महारत तो हासिल की है पर अभी भी ये पार्टियां मुख्यधारा की पार्टियों वाला कलेवर न तो हासिल कर पाई हैं और न करना चाहती हैं. इस नज़र से देखें तो त्रिपुरा के चुनावी परिणाम कोई अनोखी बात नहीं. ये परिणाम भी पश्चिम बंगाल की तरह संसदीय वाम पार्टियों के सिमटती पॉलिटिकल स्पेस का संदेश लेकर आए हैं.
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