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इसी साल अगस्त में राज्यसभा चुनाव में गुजरात से जीत हासिल कर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को झटका देने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसी ही कामयाबी दोहराना चाहते हैं.वह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मिलकर दक्षिणी गुजरात में सत्ताधारी भाजपा को मात देना चाहते हैं. यह इलाका भाजपा का गढ़ माना जाता है.
भरूच में कांग्रेस की नवसृजन यात्रा के दौरान पूरे समय तक राहुल गांधी के साथ खड़े दिख रहे अहमद पटेल इस इलाके के दिग्गज नेता माने जाते हैं. उन्होंने आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में जीत हासिल कर दिल्ली के सत्ता के गलियारे में अपनी जगह बनाई थी. वह शंकरसिंह वाघेला के साथ दिल्ली पहुंचे थे. उन्होंने 1984 से 1989 के बीच राजीव गांधी के साथ काम किया.
लंबे समय से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे अहमद पटेल हमेशा से ‘लो प्रोफाइल’ रहते हैं. राजनेताओं के बीच वह अहमद भाई के नाम से जाने जाते हैं.हाल ही में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अहमद पटेल का नाम उस अस्पताल से जोड़ने की कोशिश की जहां से एक संदिग्ध आईएस आतंकी को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद भरूच में उन्होंने अपने चुनावी भाषण में भाजपा को चुनौती दी.
उन्होंने कहा कि उन्हें भाजपा से राष्ट्रवाद सीखने की जरूरत नहीं है. आतंकवाद से लड़ते हुए सैकड़ों कांग्रेस नेताओं ने अपनी जान गंवाई है. उन्होंने परोक्ष तौर पर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों ने आतंकियों को सुरक्षित कंधार पहुंचाया वे लोग उनसे इस्तीफा मांग रहे हैं.
इसके बाद उन्होंने कहा कि अंकलेश्वर के सरदार पटेल अस्पताल में काम करने वाले कथित आईएस ऑपरेटिव ने इससे पहले केयर हॉस्पिटल में काम किया था जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है.
भरूच और अंकलेश्वर के शहरी इलाकों में राहुल गांधी नोटबंदी और जीएसटी के क्रियान्वयन में गड़बड़ी का मुद्दा उठा रहे हैं. उनका टारगेट छोटे और मझौले व्यापारी हैं. एक रैली में राहुल ने कहा कि भाजपा आठ नवंबर की तारीख का उत्सव मनाना चाहती है जबकि पूरा देश रो रहा है.
उन्होंने पूछा कि काला धन कहां है. उन्होंने कहा कि छोटे कारोबारी हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और वे ही सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.
दक्षिणी गुजरात को भाजपा का गढ़ माना जाता है. इकाले के बड़े शहरों और बड़े कस्बों की करीब 90 फीसदी सीटों पर भाजपा का कब्जा है. करीब दो दशक से कांग्रेस के सत्ता से बाहर रहने के कारण उसका संगठन भी मजबूत नहीं है.
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(मेघदूत शैरॉन)
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